Yajurveda / 15 / 61
इन्द्रं॒ विश्वा॑ऽअवीवृधन्त्समु॒द्रव्य॑चसं॒ गिरः॑। र॒थीत॑मꣳ र॒थीनां॒ वाजा॑ना॒ सत्प॑तिं॒ पति॑म्॥६१॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 15 | Mantra No : 61
Seer : madhuchChandaaH | Devta : indraH | Metre : nichRRidanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : indra.m vishvaa.aaviivRRidhantsamudravyachasa.m giraH. rathiitama.n rathiinaa.m vaajaanaa.n satpati.m patim .61 .
Component Words : indram. vishvaaH. aviivRRidhan. samudravyachasamiti.m samudra.avyachasam. giraH. rathiitamam. rathitamamiti rathi.atamam. rathiinaam. rathinaamiti.m rathi.anaam. vaajaanaam. satpatimiti sat.apatim. patim .61 .
In Hindi:
ऋषि : मधुच्छन्दाः | देवता : इन्द्रः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर वही विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदपाठ : इन्द्र॑म्। विश्वाः॑। अ॒वी॒वृ॒ध॒न्। स॒मु॒द्रव्य॑चस॒मितिं॑ समु॒द्रऽव्य॑चसम्। गिरः॑। र॒थीत॑मम्। र॒थित॑म॒मिति॑ र॒थिऽत॑मम्। र॒थीना॑म्। र॒थिना॒मितिं॑ र॒थिऽना॑म्। वाजा॑नाम्। सत्प॑ति॒मिति॒ सत्ऽप॑तिम्। पति॑म्॥६१॥
पदार्थ : (विश्वाः) सब (गिरः) विद्या और शिक्षा से युक्त वाणी (समुद्रव्यचसम्) आकाश के तुल्य व्याप्तिवाले (रथीनाम्) शूरवीरों में (रथीतमम्) उत्तम शूरवीर (वाजानाम्) विज्ञानी पुरुषों के (सत्पतिम्) सत्यव्यवहारों और विद्वानों के रक्षक तथा प्रजाओं के (पतिम्) स्वामी (इन्द्रम्) परमसम्पत्तियुक्त सभापति राजा को (अवीवृधन्) बढ़ावें॥
भावार्थ : राजा और प्रजा के जन राजधर्म से युक्त ईश्वर के समान वर्त्तमान न्यायाधीश सभापति को निरन्तर उत्साह देवें, ऐसे ही सभापति इन प्रजा और राजा के पुरुषों को भी उत्साही करें॥६१॥
In Sanskrit:
ऋषि : मधुच्छन्दाः | देवता : इन्द्रः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह॥
पदपाठ : इन्द्र॑म्। विश्वाः॑। अ॒वी॒वृ॒ध॒न्। स॒मु॒द्रव्य॑चस॒मितिं॑ समु॒द्रऽव्य॑चसम्। गिरः॑। र॒थीत॑मम्। र॒थित॑म॒मिति॑ र॒थिऽत॑मम्। र॒थीना॑म्। र॒थिना॒मितिं॑ र॒थिऽना॑म्। वाजा॑नाम्। सत्प॑ति॒मिति॒ सत्ऽप॑तिम्। पति॑म्॥६१॥
पदार्थ : (इन्द्रम्) परमैश्वर्ययुक्तं सभेशम् (विश्वाः) अखिलाः (अवीवृधन्) वर्धयन्तु (समुद्रव्यचसम्) समुद्रस्यान्तरिक्षस्य व्यचो व्याप्तिर्यस्य तम् (गिरः) विद्यासुशिक्षान्विता वाण्यः (रथीतमम्) अतिशयितो रथी। अत्र ईद्रथिनः॥ (अष्टा॰८।२।१७) इति वार्तिकेन ईकारादेशः (रथीनाम्) शूरवीराणां मध्ये अत्र अन्येषामपि॰ [अ॰६.३.१३७] इति दीर्घः (वाजानाम्) विज्ञानवताम् (सत्पतिम्) सतां व्यवहाराणां विदुषां वा पालकम् (पतिम्) स्वामिनम्। [अयं मन्त्रः शत॰८.७.३.७ व्याख्यातः]॥६१॥
अन्वय : विश्वा गिरः समुद्रव्यचसं रथीनां रथीतमं वाजानां सत्पतिं प्रजानां पतिमिन्द्रमवीवृधन्॥६१॥
भावार्थ : राजप्रजाजना राजधर्मयुक्तमीश्वरमिव वर्त्तमानं न्यायाधीशं सभापतिं सततं प्रोत्साहयन्तु। एवं सभापतिरेताँश्च॥६१॥