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Yog

            योगदर्शन अध्यात्म जगत में साधना का आधार है। महर्षि पतञ्जलि ने वेदों में उपलब्ध योगविद्या को मानवमात्र के कल्याणार्थ सूत्र रूप में निबद्ध किया था। आर्ष मान्यता के अनुसार संसार की समस्त विद्याओं का मूल वेद में उपलब्ध है। अतः योग, जो कि मानव मात्र को आन्तरिक साधना के मार्ग पर अग्रसर करता है, का उपदेश भी परमात्मा द्वारा वेद में दिया गया है। महर्षि पतञ्जलि ने उसी ज्ञान को सूत्र रूप में मानव मात्र के उपकारार्थ संकलित किया था। महर्षि पतञ्जलि के योगसूत्रों पर महर्षि व्यास कृत एक प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध है, जो महर्षि पतञ्जलि के आशय को स्पष्ट करने में परम सहायक तथा योगविद्या को समझने तथा आत्मसात् करने के लिए परम आवश्यक है। महर्षि व्यास के अतिरिक्त भी कई विद्वानों ने योगसूत्रों पर वृत्ति लिखी है जिनमें से निम्न उपलब्ध होते हैं —

            १.         भोजदेव कृत                                            राजमार्तण्डवृत्ति   

            २.         भावगणेश विरचित                                    प्रदीपवृत्ति

            ३.         नागोजी भट्ट विरचित                                 नागोजीभट्टवृत्ति   

            ४.         रामानन्द विरचित                                      मणिप्रभा

            ५.         सदाशिवेन्द्र सरस्वती कृत                           योगसुधाकर        

            ६.         अनन्तदेव कृत                                          चन्द्रिका

            इनके अतिरिक्त राघवानन्द सरस्वती कृत पातञ्जल रहस्य तथा नारायणतीर्थ कृत सूत्रार्थबोधिनी का वर्णन भी मिलता है। योगदर्शन के व्यासभाष्य पर, वर्त्तमान काल में, कई भाष्य संस्कृत और हिन्दी = प्राकृत भाषा में उपलब्ध हैं;  जिनमें से निम्न भाष्य संस्कृत में हैं —

            १.         वाचस्पति मिश्र विरचित                              तत्त्ववैशारदी

            २.         विज्ञानभिक्षु विरचित                                  योगवार्त्तिक

            ३.         हरिहरानन्द आरण्य कृत                            भास्वती टीका (हिन्दी में भी उपलब्ध)

            प्राकृत = हिन्दी भाषा में निम्न भाष्यकारों की कृतियाँ हैं —

            (पौराणिक विद्वानों द्वारा)                                        (आर्यजगत् के विद्वानों द्वारा)

१.         ब्रह्मलीन मुनि जी                                       १.         स्वामी विज्ञानाश्रम जी

२.         रमाशंकर त्रिपाठी                                      २.         स्वामी ब्रह्ममुनि जी

३.         सुरेशचन्द्र श्रीवास्तव                                   ३.         आचार्य राजवीर शास्त्री

                                                                        ४.         स्वामी सत्यपति परिव्राजक

            इनके अतिरिक्त स्वामी ओमानन्द जी, स्वामी रामस्वरूप जी, तथा आचार्य उदयवीर शास्त्री ने व्यासभाष्य का आधार बना कर भाष्य लिखें हैं, परन्तु इन्होंने व्यासभाष्य का अनुवाद नहीं किया। इसी प्रकार से आर्यमुनि जी तथा स्वामी रामदेव जी का भी संक्षिप्त भाष्य उपलब्ध होता है। इसी प्रकार से डा॰ विमला कर्णाटक ने तत्त्ववैशारदी तथा योगवार्त्तिक का हिन्दी अनुवाद किया है, जोकि चार भागों में उपलब्ध है;  तथा श्री राम प्रसादजी ने व्यासभाष्य और वाचस्पतिमिश्र की टीका का अंग्रेजी अनुवाद किया है।

            पौराणिक जगत् के विद्वानों ने व्यासभाष्य को पूर्णतया प्रामाणिक मानते हुए, उस पर भाष्य करते हुए पौराणिक जगत् में प्रचलित ईश्वर, जीव और प्रकृति सम्बन्धित वेद-विरुद्ध मान्यताओं को भी इसमें सम्मिलित कर दिया है, जिससे ये मान्यताएँ भी महर्षि व्यास के अनुकूल ज्ञात हों;  और इस प्रकार से ऐसी वेदविरुद्ध मान्यताएँ, जो व्यासभाष्य और योगसूत्रों में हैं ही नहीं, भी इन भाष्यों के माध्यम से जनमानस में स्थान पा गयीं। इन भाष्यकारों में वाचस्पति मिश्र, विज्ञानभिक्षु, स्वामी ब्रह्मलीनमुनि, स्वामी ओमानन्द, स्वामी हरिहरानन्द आरण्य, श्री रमाशंकर त्रिपाठी, तथा श्री सुरेशचन्द्र श्रीवास्तव हैं। बाद के भाष्यकारों ने व्यासभाष्य के अनुवाद में वाचस्पतिमिश्रविरचित तत्त्ववैशारदी तथा विज्ञानभिक्षुविरचित योगवार्त्तिक का भी सहयोग लिया है।

            आर्य जगत् के भाष्यकारों में स्वामी विज्ञानाश्रम जी ने व्यासभाष्य के साथ-साथ भोजवृत्ति पर भी अनुवाद किया है;  स्वामी ब्रह्ममुनि जी का भाष्य “आर्ष योग प्रदीपिका” नाम से उपलब्ध होता है;  इन दोनों विद्वानों ने व्यासभाष्य का अनुवादमात्र ही किया है, परन्तु अपनी ओर से कुछ विशेष नहीं लिखा;  परन्तु स्वामी विज्ञानाश्रम जी ने व्यासभाष्य और भोजवृत्ति के कई स्थलों को प्रक्षिप्त कहकर उनका अनुवाद भी नहीं किया। आचार्य राजवीर शास्त्री ने व्यासभाष्य के अनुवाद के साथ-साथ, जिन सूत्रों पर महर्षि दयानन्द का भाष्य उपलब्ध होता है, उसे भी देकर प्रत्येक सूत्र पर “भावार्थ” के अन्तर्गत सूत्रों के भावों को यथासम्भव स्पष्ट भी किया है, और संदिग्ध स्थलों पर विभिन्न प्रश्नों को उठा कर उन्हें प्रक्षिप्त सिद्ध किया है। इस श्रंखला में स्वामी सत्यपति परिव्राजक जी ने योगसूत्रों पर भाष्य के साथ-साथ अपने जीवनकाल की योगसाधना के अनुभवों को भी दिया है जिससे योग के जिज्ञासुओं को आगे बढ़ने में सहायता मिल सके। आर्य जगत् के विद्वानों में स्वामी ब्रह्ममुनि जी को छोड़कर उपर्युक्त सभी विद्वान् व्यासभाष्य में प्रक्षेप मानते हैं। ये विद्वान् विभूतिपाद की कई सिद्धियों को या तो असम्भव आदि कोटियों में मानते है, या फिर बाद के काल का प्रक्षेप मानकर उसे अस्वीकार करते हैं। स्वामी ब्रह्ममुनि जी ने केवल व्यासभाष्य का आर्य भाषा में अनुवाद ही किया है, अपना कोई मत इन सिद्धियों पर नहीं दर्शाया।

            दूसरी ओर महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती योग दर्शन पर व्यास भाष्य को पूर्णतया प्रामाणिक मानते हुए इसे पठन-पाठन में सम्मलित करते हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती योगदर्शन पर व्यासभाष्य में किसी प्रकार के प्रक्षेप का कोई उल्लेख ही नहीं करते। यहाँ पर स्वामी दयानन्द सरस्वती की जीवनी के दो स्थल पठनीय हैं —

१.         स्वामी जी ने लाहौर प्रवास के दौरान प्रसंगानुसार अपने प्रवचन में कहा था — “योग शास्त्र का सारा वर्णन सत्य है।” (चौथा सर्ग, संगठन काण्ड, पृष्ठ २२४, श्रीमद्दयानन्द प्रकाश — स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, जनज्ञानप्रकाशन।)

२.         प्रश्न — “भगवन्! पाजञ्जल शास्त्र का विभूतिपाद क्या सच्चा है ?”

            उत्तर — “आप यों ही सन्देह करते हैं। योगशास्त्र तो अक्षरशः सत्य है। वह कोई पुराणों की कल्पना नहीं है, किन्तु क्रियात्मक और अनुभवसिद्ध शास्त्र है। ” (दूसरा सर्ग, राजस्थानकाण्ड, पृष्ठ ३४३, श्रीमद्दयानन्द प्रकाश — स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, जनज्ञानप्रकाशन।)

            उन्होंने योगदर्शन के विभिन्न सूत्रों को, अपने ग्रन्थों में, प्रमाणपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने भोजवृत्ति को प्रामाणिक नहीं माना। उनकी आस्था ऋषि प्रणीत ग्रन्थों में थी, वे मनुष्यों (=अन्य विद्वानों) द्वारा रचित ग्रन्थों को ऋषियों के ग्रन्थों की तुलना में स्वीकार नहीं करते थे। अतः भोजवृत्ति का उन्होंने कोई उल्लेख तक भी नहीं किया।

            हमारा मानना है कि योगदर्शन पर उपलब्ध व्यासभाष्य पूरी तरह प्रामाणिक है। परन्तु विभिन्न विद्वानों ने उस भाष्य के कुछ स्थलों का वास्तविक अभिप्राय न समझ कर उसे प्रक्षेप, परीक्षा कोटि, असम्भव कोटि या विकल्प कोटि आदि में रखा है।

            महर्षि पतञ्जलि के योगसूत्रों पर व्यासभाष्य को स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि व्यासभाष्य समग्र वैदिक साहित्य का ही एक अंग है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो अन्य ऋषियों द्वारा प्रतिपादित वेदानुकूल सिद्धान्तों से विरुद्ध हो। महर्षि व्यास के भाष्य द्वारा प्रतिपादित कोई भी सिद्धान्त न तो आर्ष एवं वेदानुकूल ग्रन्थों के प्रतिकूल ही है, और न ही उनके द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रों = वेदान्तदर्शन में प्रतिपादित सिद्धान्तों से प्रतिकूल ही हो सकता है। अतः महर्षि व्यास जब वेदान्तदर्शन में मुक्त जीवों के लिए जगत्-रचना व्यापार को निषिद्ध कहते हैं,[1] तो ऐसे में वे योगसूत्र ४.४ के भाष्य में किसी योगी द्वारा अंहकार नामक प्रकृति के विकार से बहुचित्त निर्माण की मान्यता, जैसा कि विभिन्न पौराणिक भाष्यकारों ने मानी है, को कैसे कह सकते हैं ? इस सूत्र का वास्तविक अभिप्राय यथास्थान देखें। अतः व्यासभाष्य को सम्पूर्ण आर्ष साहित्य में प्रतिपादित वेदानुकूल सिद्धान्तों के सन्दर्भ में ही समझना चाहिए। हमनें व्यासभाष्य के इसी रूप को इस भाष्य में रखने का प्रयास किया है।

            वेद ईश्वरीय ज्ञान होने से अपौरुषेय है, और स्वतः प्रमाण की श्रेणी में आते हैं। जबकि अन्य ग्रन्थ पौरुषेय होने के कारण वेद के प्रमाण की अपेक्षा से, परतः प्रमाण की श्रेणी में आते हैं। जो भी ग्रन्थ ऋषियों द्वारा रचित है, उन्हें प्रामाणिक तो माना गया है, परन्तु वे भी परतः प्रमाण की श्रेणी में ही आते हैं। इस श्रेणी में उपवेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, छः अंग, उपनिषद् तथा छः उपांग (दर्शन) आते हैं।[2] योग दर्शन, ऋषिप्रणीत एक प्रामाणिक ग्रन्थ होते हुए भी परतः प्रमाण की श्रेणी में ही आता है। परन्तु इसमें प्रतिपादित किसी भी सिद्धान्त को मात्र तर्क के आधार पर प्रक्षिप्त नहीं कहा जा सकता। अगर किसी प्रकार की सिद्धान्तहीनता अथवा प्रक्षेप आदि हैं तो उसको निम्न प्रकार से सिद्ध करना चाहिए :—

१.         उस सिद्धान्त का विरोध वेद में प्रतिपादित सिद्धान्त से दिखा कर;  या

२.         तर्क के आधार पर तथा दूसरे प्रामाणिक शास्त्रों में प्रतिपादित सिद्धान्तों से विरोध दिखा कर ॥

            मात्र तर्क के आधार पर ही किसी ऋषि प्रणीत ग्रन्थ में प्रतिपादित सिद्धान्त का विरोध करना या उसे प्रक्षिप्त कहना उचित नहीं हो सकता। यह सम्भव है कि हम किसी प्रतिपादित सिद्धान्त या सन्दर्भ को अपनी अल्पज्ञता के कारण उस प्रकार न समझ रहे हों, जिस प्रकार से शास्त्रकार ने प्रतिपादित किया है। अगर उपर्युक्त दोनों कसौटियों में से प्रथम कसौटी से किसी शास्त्र में सिद्धान्तविरोध सिद्ध होता है तो वह सर्वथा मान्य होगा, क्योंकि वेद से आगे, किसी भी अन्य प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं है;  और अगर दूसरी कसौटी से किसी भी शास्त्र में कोई सिद्धान्तहीनता सामने आती है तो वह मान्य हो सकती है;  अन्यथा मात्र तर्क के आधार पर विरोध उचित नहीं है। 

            इसी प्रकार कई सूत्रों के व्यासभाष्य पर विभिन्न भाष्यकारों द्वारा किया गया व्याख्यान भी कई स्थलों पर व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी के भी प्रतिकूल है। यथा योगसूत्र १.१७ में सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेदों पर उपलब्ध व्याख्यान मुुख्यतया भोजवृत्ति से ही प्रभावित है, जो कि व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी से सर्वथा विरुद्ध है, और इसके प्रभाव से आगे के सूत्रों के व्याख्यान में अनेक स्थलों पर त्रुटियाँ आ गई हैं। इस सूत्र पर व्यासभाष्य के अनुकूल वास्तविक व्याख्यान इसी ग्रन्थ में यथास्थान देखें।

            पूर्वोक्त कमियों को देखते हुए यह विचार किया कि व्यासभाष्य, जो कि पूर्णतया प्रमाणिक है, इसमें प्रक्षेपों का आक्षेप दूर होना चाहिए तथा विभिन्न उपलब्ध भाष्यों में व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी से विरुद्ध व्याख्यान का भी निराकरण तथा समाधान होना चाहिए। इसी प्रकार पौराणिक विद्वानों द्वारा व्यासभाष्य के तथाकथित विवादित स्थलों की जो अप्रसांगिक तथा सिद्धान्तविरुद्ध व्याख्या की गई है, उन स्थलों का दिग्दर्शन इस भाष्य में कराया जायेगा।

            अतः इस विचार के बाद, व्यासभाष्य की वेदानुकूलता प्रतिपादित करने हेतु, वेद और वेदानुकूल ग्रन्थों के योगविषयक प्रमाणों के सन्दर्भ में, व्यासभाष्य का स्वाध्याय फिर से आरम्भ किया, तथा भोजवृत्ति को भी देखना आरम्भ किया। भोजवृत्ति, कुछ स्थलों पर महर्षि व्यास के भाष्य के प्रतिकूल होते हुए भी, बहुत से स्थलों पर व्यासभाष्य की पूरक है, और उसे स्पष्ट भी करती है। वैसे यह एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है और इसमें सिद्धान्तविरुद्ध भी उपलब्ध होता है। विभूति पाद की व्याख्या करते हुए भोज ने सिद्धियों के सम्बन्ध में बहुत सा भाष्य महर्षि पतञ्जलि और व्यास की मान्यताओं के विपरीत एवं अन्यथा भाष्य किया है। यहाँ तक कि आधुनिक भाष्यकारों ने जो विभिन्न सूत्रों (विशेषतया विभूति पाद में) की व्याख्या में सिद्धान्तविरुद्ध मान्यताएँ प्रतिपादित की हैं, उनमें से बहुत सी मान्यताएँ भोजवृत्ति के आधार पर ही प्रचलित हुई हैं। भोजवृत्ति के इन सिद्धान्त-विरुद्ध स्थलों का निर्णय हमने वेदादि सत्यशास्त्रों में उपलब्ध प्रमाणों और व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी के आधार पर ही किया है। व्यासभाष्य में यदि किसी पद का अर्थ स्पष्ट नहीं हुआ, और ना ही वेदादि सत्यशास्त्रों में उस पर विशेष उल्लेख मिला, तथा उस पर विशेष व्याख्यान की आवश्यकता हुई तो हमने दूसरे भाष्यकारों की अपेक्षा भोजवृत्ति को ही प्राथमिकता दी है, जैसे सूत्र १.१९ में विदेह और प्रकृतिलय का अर्थ हमने भोज के अनुसार ही किया है।

 


[1] जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च॥ वेदान्त ४.४.१७॥

 

[2] इन ग्रन्थों का संक्षिप्त परिचय हमारी “वैदिक धर्म ग्रन्थ परिचय” नामक लघु पुस्तिका में दिया गया है।

Philosophy of Yoga is the base of comunion with GOD. Seer Patanjali had described the principles of Yoga, which were available in Vedas, for the well-being of Human beings. As per principles of ancient saints, Vedas includes all type of knowledge of world. So the knowledge of Yoga, which helps the human beings to move on the path of realization of self and GOD, was also given by the GOD in Vedas.

            Seer Vyaasa had given the authentic commentary of Yoga aphorisms, which clarifies and explains the principles of Yoga, and it is helpful to understand their meaning in true spirits. Some other commentators like Bhoja (Bhoja-Vritti), Bhava Ganesha (Pradeep-vritti), Naagoji Bhatt (Naagojibhat-Vritti), Ramananda (Maniprabha), Sadashivendra (Yoga-sudhakara) and Anant Deva (Chandrika-vritti) had also written independent commentary (in Sanskrit) on Yoga aphorisms, and these are available. In addition to above many others had written the explanations on Vyaasa commentary, in Hindi and Sanskrit, which are listed as below :

1.         Vaachaspati Mishra (Tattva-Vaishardi);

2.         Vijyaana-Bhikshu (Yoga-Vaartika);

3.         Hari-Haranand Aaranya (Bhaasvati Tika);

4.         Brahmaleena Muni;

5.         Ramashankar Tripathi;

6.         Suresh Chandra Srivastva;

7.         Swami Vijyaanashram;

8.         Brahma-Muni;

9.         Rajavir Shastri;

10.       Satyapati Praivrajaka.

            Commentators from S. No 1 to 3 had written their commentaries in Sanskrit, and from S. No 4 to 10 had written commentary in Hindi. In addition to above, writer of this book had written commentary on Yoga aphorisms in Hindi also. This work is the translation of our Hindi version.

            Apart from the above, many have written explanations on Yoga aphorisms without giving Vyaasa commentary. Dr. Rama Prashad had also translated the work of Vaachaspati Mishra (along with Vyaasa Commentary) in English; and some of the explanation of Yoga aphorisms in English are also available on internet; but these are based on one's personal knowledge and understanding of subject without any reference to Vyaasa commentary.

            Some of the explainators (from S. No 1-6 above) while writing on Vyaasa commentary, had explained the Yoga philosophy in the light of Puranas, which are said to be written by seer Vyaasa. These explainators had included many concepts which were not there in the Vedic Scriptures, but were available in Puranas. On seeing the contradictions of such conceptions with the Vedic Scriptures, others commentators (from S No 7-10) had declared some parts of Vyaasa commentary as post-age mixtures.

            On the other hand, Swami Dayanand Saraswati, founder of Arya Samaj, who practiced Yoga principles, had declared the Vyaasa commentary as fully authentic and includes it for study and teaching as one of six authentic philosophies. He had not referred any post-age mixtures = interpolation in Vyaasa commentary.

            I accept that Vyaasa commentary on Yoga aphorisms is fully authentic. Any explainator who had not understood Vyaasa commentary in true meaning, had declared some of its contexts as post-age mixtures or impossible and even categorised some parts as yet to be proved.

            In order to understand Yoga Philosophy, Vyaasa commentary is must. Any explanation which does not contain Vyaasa commentary, will not be helpful to understand the meanings of Yoga aphorisms in true sense.

            Philosophy of Yoga, as given by Seer Patanjali is not to be seen as independent scripture, but it is a part of Vedic Scriptures. There is no such principle in it, which is in contradiction with principles of other Vedic seers. Principles given by seer Vyaasa, are neither against principles of Vedas and Vedic Scriptures, nor in contradiction with Vedanta Philosophy (his other work). Hence when seer Vyaasa had declared that Souls are not capable of creation of universe, then how can he advise creation of mind from the atoms of Egoism in aphorism 4.4, as is described by the various commentators? The real meaning of this aphorism is to be seen in this commentary. So we have to understand the Vyaasa commentary with reference to total Vedic Scriptures. I have tried to adhere to this principle in this commentary.

            Vedas are the knowledge of GOD, and hence are treated as self authentic. On the other hand, other scriptures which are created by human-beings, need authentication. The scriptures created by our ancient seers are treated as authentic, but these too are subject to conformity of Vedas. These authentic scriptures include Upvedas, Braahmans, upaniShadas, Six Angas and Six philosophies (in the vedic system. The details of these scriptures are given in our booklet “Vedic Dharam Grantha Parichaya” in Hindi). Philosophy of Yoga, written by seer Patanjali along with the Vyaasa commentary, is an authentic scripture, however is required to be in conformity with Vedas. But we cannot deny the principles explained in this Philosophy, simply on the basis of logic. If there is something which is against the principles, then it is required to be proved in either way—

1.         By showing contradiction with the principles explained in Vedas; or

2.         By giving logic and showing contradictions with the principles explained in other Vedic Scriptures.

            Merely on the basis of logic, any principle explained by our ancient seers cannot be denied, nor can be said as post-age mixture. It is quite possible that we are not able to understand such principles, as explained by our ancient seers, due to lack of our knowledge or ignorance. If anything, given in Vedic scriptures, is proved wrong on the basis of first principle as above, then it will be acceptable, since there is no need of any other proof, as Vedas are the final authority; if any contradiction is proved on the basis of second principle as above, then also it will be acceptable; but such denials, merely on the basis of logic are not acceptable in Vedic scriptures.

            In the same way, explanations given by various commentators on Vyaasa commentary are against the inner-testimony of seer Vyaasa. As their explanation of four types of Cognitive Trance, in aphorism 1.17, are in the shadow of Bhoja commentary, and is totally against the inner-testimony of seer Vyaasa, with the result explanation of various other aphorisms had gone wrong. Readers will see the real form of four Cognitive trances, as per the principles of seer Vyaasa, in our Vedic Commentary to aphorism 1.17 in this book.

            On seeing such type of contradictions, I had decided that Vyaasa commentary which totally authentic, should explained on the basis of testimonies of Vedas, Vedic Scriptures and also in tune with the inner-testimony of Seer Vyaasa.

            आर्यजगत् के कुछ विद्वानों का मानना है कि व्यासभाष्य में प्रक्षेप हैं। सर्वप्रथम स्वामी विज्ञानाश्रम जी ने भाष्य करते हुए ११ सूत्रों में प्रक्षेप को माना है, जोकि इस प्रकार हैं —

सूत्र संख्या                                   प्रक्षेप

१.९                                तथाऽनुत्पत्तिधर्मा पुरुष ................ पुरुषान्वयी धर्मः।

१.४३                              तथा च व्याख्यात्म् तस्या ........... से लेकर अन्त तक।

२.५                               तस्याऽचामित्र ................. एव ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम्।

२.१७                             तथा चोक्तम् तत्संयोगहेतु .............. से लेकर अन्त तक।

२.२३                             किं चेइमदर्शनं नाम ...................... से लेकर अन्त तक।

२.२८                             योगाङ्गानुष्ठानमशुद्धेर्वियोगकारणं .......... से लेकर अन्त तक।

३.१४                              अथाव्यपदेश्याः के .................. से लेकर अन्त तक।

३.२२                             तथाऽधिभौतिकं ..................  से लेकर अन्त तक।

३.२६                              पञ्चविधो ........................  से लेकर अन्त तक।

३.५१                              कमनीयोऽयं भोगः .................. देवानां प्रियमिति।

४.१०                             दण्डकारण्यं च ........................ से लेकर अन्त तक।

            इसी प्रकार स्वामी सत्यपति जी ने अपने योगभाष्य में सूत्र २.१९ में सिद्धान्तिक भूल को कहा है तथा ३.२६, ४.४ में प्रक्षेप माना है। स्वामी जी ने विभूति पाद की व्याख्या में महर्षि पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित तथा महर्षि व्यास द्वारा व्याख्यात विभिन्न विभूतियों में मतभेद को माना है। वे कुछ विभूतियों को विकल्पात्मक, कुछ को परीक्षणीय, कुछ को आंशिक रूप से सम्भव एवं कुछ को असंभव भी मानते हैं। कौन सी विभूति किस श्रेणी में आती है इसके लिए स्वामी सत्यपति जी का भाष्य द्रष्टव्य है। स्वामी जी ने इन विभूतियों को, महर्षि दयानन्द द्वारा रचित सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों से विभिन्न प्रमाणों के आधार पर और विभिन्न तर्कों के आधार पर ही उपर्युक्त प्रकार से माना और वैसा ही व्याख्यान भी किया है।  आचार्य राजवीर शास्त्री ने भी योगसूत्र ३.२६, ३.५१, ४.४ तथा ४.१० में प्रक्षेप को माना है। आचार्य जी ने प्रक्षेप को सिद्ध करने के लिए बहुत से तर्क एवं प्रमाण भी दिए हैं।

             इस विषय में हमारा मानना है कि व्यास भाष्य में कुछ भी प्रक्षिप्त नहीं है। इन भाष्यकारों ने १८ पुराणों में उपलब्ध काल्पनिक इतिहास एवं सिद्धान्तविरोध से साम्यता मिलने के कारण भी व्यासभाष्य के कुछ स्थलों को प्रक्षिप्त माना है।  यदि लोक में प्रसिद्ध स्थलों एवं व्यक्तियों के नामों को देखकर, कोई वेदों में इतिहास को सिद्ध करने लगे, तो उसे मान्य नहीं किया जा सकता। क्योंकि वेद आदि सृष्टि में परमात्मा द्वारा ऋषियों के हृदय में दिया गया उपदेश है, और इससे विभिन्न संज्ञाओ को लेकर ही लोक में स्थलों और व्यक्तियों का नामकरण हुआ, नाकि इन लोकप्रसिद्ध स्थलों एवं व्यक्तियों के नाम एवं इतिहास का वर्णन वेद में है;  अतः उन स्थलों और व्यक्तियों के इतिहास को आदि सृष्टि से उपलब्ध वेद में आरोपित करना मान्य नहीं है।

            इसी प्रकार महर्षि व्यास ने अपने भाष्य में बहुत से उदाहरण भी दिए है, और बहुत से लौकिक उल्लेख भी किए हैं। महर्षि व्यास के नाम से प्रचलित १८ पुराणों में उन नामों से बहुत सा इतिहास भी उपलब्ध होता है, और इस इतिहास का सम्बन्ध योगदर्शन पर व्यासभाष्य से जोड़ा जाता है। यह इतिहास तर्कसंगत न होने से ही विभिन्न भाष्यकारों ने व्यासभाष्य के कुछ स्थलों को बाद के काल का प्रक्षेप मान लिया। परन्तु इन पुराणों में उपलब्ध अत्यधिक अन्तःविरोध और वेदविरुद्ध मान्यताओं के कारण, महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थप्रकाश के एकादश समुल्लास में स्पष्ट रूप से कहा है कि अठारह पुराणों के रचयिता महर्षि व्यास नहीं है, बल्कि अन्य व्यक्तियों ने इन्हें रचकर महर्षि व्यास के नाम से प्रचारित किया;  परन्तु पौराणिक जगत् में ये पुराण महर्षिव्यास की रचना के नाम से ही जाने जाते हैं। इन व्यक्तियों ने ही महर्षिव्यास के ग्रन्थों में प्रयुक्त इतिहास विषयक एवं अन्य संज्ञाओं और स्थलों का मनमाना अर्थ करके और उनका मनमाना इतिहास कल्पित कर इन अठारह पुराणों में भर दिया है। अतः वर्त्तमान काल में, लोक में प्रचलित इस प्रक्षिप्त एवं कल्पित पौराणिक इतिहास के कारण, व्यासभाष्य के कुछ स्थल भी प्रक्षिप्त ही प्रतीत होते हैं। इन स्थलों के प्रक्षिप्त प्रतीत होने का एक मुख्य कारण व्यासभाष्य पर वाचस्पति मिश्र की रचना “तत्त्ववैशारदी” तथा विज्ञानभिक्षु की रचना “योगवार्त्तिक” भी पौराणिक काल की मान्यताओं के अनुकूल ही हैं। वर्त्तमान में उपलब्ध लगभग सभी भाष्यों पर इन दोनों भाष्यकारों की कृत्तियों का प्रभाव स्पष्ट रूप से उपलब्ध होता है। वस्तुतः हमें व्यासभाष्य की सत्यता को समझने हेतु इन १८ पुराणों में प्रचलित कल्पित इतिहास के सन्दर्भों को भूलना होगा। वर्त्तमान काल में, यह कहना बहुत ही कठिन है कि महर्षिव्यास के काल में इन सन्दर्भों का वास्तविक इतिहास क्या था ? अथवा महर्षि व्यास के काल में विभिन्न सन्दर्भों के बारे में क्या-क्या इतिहास प्रचलित था ? वर्त्तमान में तो हमारे पास ऋषियों द्वारा प्रतिपादित मात्र कुछ ही ग्रन्थ उपलब्ध है। और फिर वर्त्तमान काल में कोई भी भाष्यकार योग के उस स्तर तक नहीं पहुँच पाया जो स्वयं की अनुभूति के आधार पर सत्यासत्य का निर्णय कर सके।

शंका — यह आप निश्चय से कैसे कह सकते हैं कि व्यासभाष्य की संज्ञाओं के आधार पर अन्य लोगों ने मिथ्या इतिहास रचा है ? पुराणों में दिया गया इतिहास सत्य क्यों न माना जाए ?

समाधान — देखो, महाभारत काल के बाद वेदादि सत्यशास्त्रों का पठन-पाठन न रहने से, ब्राह्मणों ने अपने प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए, अपनी मनमानी मान्यताओं को प्रचारित करने के लिए, वेद-विरुद्ध सिद्धान्तों को ही बढ़ावा दिया। क्षत्रियादि वर्णों में वेदाभ्यास न रहने से इन ब्राह्मणों ने मनमाने ग्रन्थ रचे, वेद विरुद्ध मान्यताओं का प्रचार-प्रसार किया;  जिसके परिणामस्वरूप जन-सामान्य सत्यविद्या से दूर हो गया। ऐसे लोगों ने जब वेदों के आलङ्कारिक वर्णनों तथा संज्ञाओं का आश्रय लेकर मिथ्या इतिहास रच डाला — जैसे गौतम-अहिल्या-इन्द्र की कथा, इन्द्र और वृत्रासुर की कथा, ब्रह्मा का पुत्री से समागम की कथा, देवासुर संग्राम की कथा, कश्यप और गया-पुष्करतीर्थादि कथा आदि;[1]  तब व्यासभाष्य की संज्ञाओं और प्रकरणों के आधार पर मिथ्या इतिहास रचना कौन सी बड़ी बात है! जब इन लोगों ने महर्षि व्यास के नाम से १८ पुराणों की रचना कर दी, तो ऐसे में उपर्युक्त ऐतिहासिक अनाचार तो सर्वथा सम्भव है। महर्षिव्यास जैसे विद्वान्, जिसने योगभाष्य और ब्रह्मसूत्रों की रचना की, से किन्हीं वेद-विरुद्ध सिद्धान्तों के प्रतिपादन तथा असम्भव वार्त्ता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अतः व्यासभाष्य के सम्बन्ध में, हमारी उपर्युक्त मान्यता के आधार पर ही सत्य को जाना जा सकता है।

            हमारे लिए यह एक परम सौभाग्य का विषय है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती, जो एक महान् योगी थे और व्यासभाष्य को पूर्णतया प्रामाणिक मानते थे, ने न केवल अपने विभिन्न ग्रन्थों में योगसूत्रों को देते हुए उनके अर्थों को किया है;  बल्कि विभिन्न शास्त्रार्थों में पातञ्जल सूत्रों को प्रमाण पक्ष में प्रस्तुत कर उनके गूढ़ रहस्यों को खोला है। इन अर्थों से महर्षि व्यास के भाष्य की विभिन्न गुत्थियों को खोलने में परम सहायता मिलती है। महर्षि दयानन्द, योगसूत्र १.३५ का प्रमाण देते हुए, हुगली शास्त्रार्थ में कहते हैं “इससे प्रतिमा पूजन कभी नहीं आ सकता। क्योंकि इन में देव बुद्धि करना नहीं लिखा। किन्तु जैसे वे जड़ हैं, वैसे ही योगी लोग उनको जानते हैं। और बाह्य मुख वृत्ति, उसको भीतर मुख करने के वास्ते योग शास्त्र की प्रवृत्ति है। बाहर के पदार्थ का ध्यान करना योगी लोगों को नहीं लिखा। क्योंकि जितने सावयव पदार्थ हैं, उनमें कभी चित्त की स्थिरता नहीं होती। और, जो होवे, तो मूत्तिमान् धन, पुत्र, दारादि के ध्यान में सब संसार लगा ही है। परन्तु चित्त की स्थिरता किसी की भी नहीं होती।” इस सिद्धान्त के आधार पर योगसूत्र ३.२६-२८ में “सूर्य”, “चन्द्र” और “ध्रुव” को यदि बाह्य पदार्थ न माना जाए तो इनका अर्थ क्या हो, तथा इनसे होने वाले भुवनज्ञान आदि का तात्पर्य क्या है, यह मनन और निदिध्यासन का प्रमुख विषय बन जाता है। इस रहस्य को हमने यथासम्भव, वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणों के आधार पर ही खोलने का प्रयास किया है। हमने अपने इस विशद् एवं महत्त्वपूर्ण कार्य में, वेद तथा वेदानुकूल सत्यशास्त्रों में प्रतिपादित सिद्धान्तों तथा महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रतिपादित योगविषयक सिद्धान्तों को  मुख्य आधार बना कर ही व्यासभाष्य के रहस्यों को समझने एवं खोलने का प्रयास किया है।

            महर्षि दयानन्द ने जिन योगसूत्रों को अपने ग्रन्थों में प्रमाण रूप में देकर उनके अर्थों को कहा है, वे अर्थ परमात्मा की प्राप्ति हेतु साधक के लिए विशेष रूप से मार्गदर्शक हैं। स्वामी जी ने इन सूत्रों का प्रमाण, मुख्य रूप से, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना और मुक्ति विषय में दिया है, अतः इन का अर्थ और व्याख्यान, परमात्मा की प्राप्ति हेतु किसी भी साधक के परम उपयोगी है।

            महर्षि दयानन्द का प्रथम लक्ष्य वेदों पर प्राचीन ऋषियों की मान्यताओं के अनुकूल भाष्य करना था, अतः उन्होंने पहले वेदभाष्य करना आरम्भ किया। परन्तु महान् शोक!!! कि विरोधियों द्वारा विष दिए जाने से वेदभाष्य जैसा परम महत्त्वपूर्ण कार्य भी उनके जीवन काल में पूरा न हो सका। अतः जो कुछ भी निर्णय किया जाना है उसे पूर्वोक्त सन्दर्भों में, पौराणिक जगत् में प्रचलित विभिन्न मान्यताओं से निरपेक्ष होकर ही करना होगा अन्यथा सत्य तक पहुँच पाना सम्भव नहीं हो पायेगा।

 


[1] वेद के इन वर्णनों का वास्तविक अभिप्राय जानने हेतु महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का ग्रन्थप्रामाण्याप्रमाण्यप्रकरण, तथा प० शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ की पुस्तक “वैदिक इतिहासार्थ निर्णय” देखें।

 

            Some of the explainators of Arya Samaj believe that there are post-age mixtures in Vyaasa commentary. Swami Vijyaanashram had identified 11 places in the Vyaasa commentary as post-age mixtures. These are in aphorisms 1.9, 1.43, 2.5, 2.17, 2.23, 2.28, 3.14, 3.22, 3.26, 3.51, and 4.10. In the same way some others had accepted post-age mixtures in one or other aphorisms. Some explaintors have treated some of attainments as impossible, and some others as partially possible, some are required to be tested, and some are possible in optional way.

            In this regard I believe that nothing is post-age mixture in the Vyaasa commentary. Various commentators had treated the post-age mixtures on account of availability of wrong history in various Puranas, which are said to be written by seer Vyaasa. If somebody accepts history in Vedas, by merely seeing the various things in this world, named on the basis of various nouns in Vedas, that cannot be accepted. Since Vedas were advised by GOD in the heart of four saints in the beginning of this creation; and various things were named on the basis of nouns given in Vedas. It does not mean that Vedas were created / formed by seeing the things and history of human world. So it is not acceptable to attribute the human history in the Vedas which were available before such historical events.

            In the same way seer Vyaasa have give some examples in his commentary to various aphorisms, and many social references had also been made. History about those nouns and references is also available in 18 Puranas, and people now relate such history to Vyaasa commentary. As such history does not appear to be logical, various commentators had declared such contexts as post-age mixtures. On the other hand on account of serious contradictions within Puranas and with the principles of Vedas, Swami Dayanand had declared, in chapter 11 of Light of Truth that these Puranas were not written by seer Vyaasa, but some other persons had written these in the name of seer Vyaasa. These persons had created imaginary history of various nouns used in Vyaasa commentary and wrote the same in Puranas. In the light of such imaginary history, some of the places in Vyaasa commentary appear to be post-age mixtures. One more reason for considering these contexts as post-age mixture is that two commentaries of Vachaspati Misra and Vijyaanabhikshu on Vyaasa commentary, are based on the conceptions of Puranas only. And there is direct impact of these two commentaries on most of present age explainators.

            In fact in order to understand the Vyaasa commentary in true spirit, we have to forget the references of Puranas. In the present age, it is very difficult to say what was the history of those references at the time of seer Vyaasa?  We are to understand the same on the basis of available authentic works of those seers only.

            Question: How can you say, that other persons had created wrong and imaginary history on the basis of nouns of Vyaasa commentary? Why should the history of Puranas not to be treated as correct?

            Answer: See, after the War of Mahabharata, the study practices of Vedas had diminished and remained centred to a particular class, namely BraahmaNas. In order to maintain their supremacy, these BraahmaNas had propagated their own conceptions which were against the principles of Vedas; and created such literature and propagated it among the other communities of society. Since the other communities of society were not studying and practicing knowledge of Vedas, they became unaware of scriptural truths. When such intellectuals had created history on the nouns of Vedas, as story of Gautam-Indra-Ahilya, story of Indra and Vritraasura, story of Devasura-war, story of Kashyap and Gaya-pushkar etc.; then creation of imaginary and wrong histories on the nouns of Vyaasa commentary and putting them in Puranas was a tiny job. When 18 Puranas were written in the name of Seer Vyaasa, then such type of historical misconduct is quite possible. It cannot be imagined from seer Vyaasa, who had written  commentary on Yoga-aphorisms and Philosophy of Vedanta, that he wrote such impossible history which was against the science of creation. Hence in order to understand Vyaasa commentary in true spirit, we have to forget the history of Puranas.

            It is a matter of great satisfaction for us that Swami Dayanand, who was a great Yogi and believed that Vyaasa commentary is fully authentic, had not only wrote on many aphorisms of Yoga in his books, but also clarified the secrets of various aphorisms in various debates. These meanings and clarifications are helpful to solve many complexities of Yoga. While referring to aphorism 1.35 Swami Dayanand said in Hugali debate that “by this idol worship cannot be accepted. Since nowhere these as accepted as God. As these idols are inanimate objects, so the Yogi accepts them as it is. The practice of Yoga is to divert the external modification inward. It is nowhere written to concentrate on external gross objects, since steadiness of mind cannot take place in the objects with parts. And, if it can take place, the minds of people are involved in the spouse, children, property and other affairs of world, but none of the mind is steady and calm.” On the basis of this principle, if external objects i.e. Sun, Moon and Pole Star are not to be taken for ‘Surya’ (= Sun), ‘Chandra’(= Moon) and ‘Dhruva’(= Pole Star), as the subjects of Sanyama, then what these should be meant and what will be knowledge of ‘Bhuvan’ etc. achieved by performing Sanyama on them, becomes the subject of great concern. This secret is solved by us on the basis of various testimonies of Vedas and Vedic Scriptures. In our explanation to philosophy of Yoga, we remained dependent on the base of Vedas, Vedic Scriptures and references of Swami Dayanand in order to understand the true meanings of Vyaasa commentary.

            The meanings given by Swami Dayanand to various aphorisms are helpful for devotee to achieve cognizance of GOD. These meanings are written in the chapter of Worship in Rigvedaadibhashyabhuumika, and these are very useful for any devotee for cognizance of GOD.

            वेद का ज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक सा है, अतः लोक निरपेक्ष ज्ञान है। इस विषय में स्वामी दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम्समुल्लास में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं —

            प्रश्न — जिन वेदों का इस लोक में प्रकाश है, उन्हीं का उन लोकों में भी प्रकाश है वा नहीं ?

            उत्तर — उन्हीं का है। जैसे एक राजा की राज्यव्यवस्था नीति सब देशों में समान होती है, उसी प्रकार परमात्मा राजरोजश्वर की वेदोक्त नीति अपने सृष्टिरूप सब राज्य में एक सी है।

            इस आधार पर ही हमें वेद ज्ञान और अन्य ग्रन्थों में ऋषियों द्वारा प्रतिपादित ज्ञान के अन्तर को समझना होगा। वेद का ज्ञान लोक निरपेक्ष है। यहाँ लोक से अभिप्राय पृथिवी आदि विभिन्न लोक-लोकान्तर विशेष हैं, जहाँ पर जीवों की सृष्टि है। जबकि ऋषियों द्वारा विभिन्न शास्त्रों में प्रतिपादित ज्ञान लोक सापेक्ष और लोक निरपेक्ष दोनों प्रकार का है। लोक साक्षेप ज्ञान से अभिप्राय उस ज्ञान से है, जो विभिन्न ऋषियों को अन्तः- साक्षात्कार से हुआ और इस लोक से ही मुख्यतया सम्बन्धित है। ऐसा लोक साक्षेप ज्ञान ब्रह्माण्ड में स्थित दूसरे लोकों के लोक सापेक्ष ज्ञान जैसा भी हो सकता है, और नहीं भी हो सकता। ऋषियों द्वारा प्रतिपादित ऐसा ज्ञान जिसका वर्णन प्रत्यक्ष रूप से वेद में नहीं मिलता, परन्तु वह ज्ञान उस लोक विशेष में अन्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के अनुसार हो, ऐसा ज्ञान लोक सापेक्ष ज्ञान कहलायेगा।  अतः  लोक सापेक्ष ज्ञान  किसी लोक विशेष से सम्बन्धित होता है, जबकि लोक निरपेक्ष ज्ञान से अभिप्राय उस ज्ञान से है, जो ब्रह्माण्ड के सभी लोकों में एक समान है। वेद में परमात्मा द्वारा प्रदत्त ज्ञान, लोक निरपेक्ष ज्ञान की श्रेणी में आता है, अतः यह ज्ञान ब्रह्माण्ड भर में एक सा ही होगा;  क्योंकि परमात्मा का ज्ञान, स्थान और काल के अनुसार, परिणाम को प्राप्त नहीं होता।

            इस पृथिवी लोक में ऋषियों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न शास्त्रों में उपलब्ध, जो वेद में प्रत्यक्ष रूप से व्याख्यात नहीं है, लोक सापेक्ष ज्ञान के उदाहरण निम्न प्रकार से हैं —

१.       संवत्सर की काल गणना — वेद में सवत्सर के काल की वर्णन नहीं है। वेद के किसी मन्त्र में यह नहीं मिलता कि एक संवत्सर कितने दिन का होता है और एक दिन-रात का काल कितने क्षण, घड़ी आदि का होता है, क्योंकि यह लोक सापेक्ष ज्ञान है। संवत्सर का काल, किसी भी ग्रह द्वारा अपने तारे = सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने के काल पर निर्भर करता है। इसी प्रकार एक दिन का काल, ग्रह द्वारा अपनी धुरी पर एक चक्कर के काल के समान माना जाता है। इस लोक = पृथिवी पर एक दिन का काल लगभग २४ घंटे का तथा संवत्सर = वर्ष का काल लगभग ३६५ दिन का है। इसका विस्तार पूर्वक वर्णन सूर्यसिद्धान्त आदि ज्योतिष के ग्रन्थों में आता है। इसी सौरमण्डल के विभिन्न ग्रहों पर, एक दिन और एक संवत्सर का काल पृथिवी के दिन और संवत्सर से सर्वथा भिन्न है;  जो कि पृथिवी के काल की अपेक्षा से निम्न प्रकार है —

            ग्रह का नाम       अपनी धुरी पर प्रदक्षिणा =                                  सूर्य के चारों                                                       दिन का काल                                               ओर प्रदक्षिणा =

                                                                                               संवत्सर = वर्ष का काल

                                    (पृथिवी के दिन की अपेक्षा से)       (पृथिवी के वर्ष की अपेक्षा से)

            बुध                               ५९ दिन                                      ८७.७ दिन

            शुक्र                              २४३ दिन                                   २२८.४३ दिन

            मंगल                            १.०३ दिन                                  ६८६.५७ दिन

            बृहस्पति                         १० घंटे                                      ११.८६ वर्ष

            शनि                              १०.२३ घंटे                                 २९.४८ वर्ष

            वरुण                             १०.८ घंटे                                  ८४.२७ वर्ष

            नेप्च्यून                           १५.८ घंटे                                   १६४.१७ वर्ष

            प्लूटो                             ६.३९ दिन                                  २४८.२३ वर्ष

            इसी प्रकार दूसरे सौरमण्डलों / आकाशगंगाओं में उपलब्ध ग्रहों पर दिन और वर्ष = संवत्सर का काल इस पृथिवी के दिन और वर्ष के काल के समान ही होगा, ऐसा मानना दुराग्रह होगा। यदि ब्रह्माण्ड भर के सभी ग्रहों पर यह काल एक समान होता तो इसका वर्णन वेद में परमात्मा द्वारा कर दिया जाता। अतः इस दिन और संवत्सर के काल की गणना को लोक सापेक्ष जानना चाहिए।

२.       शरीर रचना विज्ञान — जिस प्रकार संवत्सर काल गणना का वर्णन ज्योतिष के ग्रन्थ सूर्यसिद्धान्त आदि में आता है, उसी प्रकार शरीर विज्ञान का वर्णन आयुर्वेद के चरक, सुश्रुत आदि ग्रन्थों में आता है। जिस प्रकार से शरीर के अङ्गों का माप, प्रकार, कार्य आदि का वर्णन इन ग्रन्थों में उपलब्ध होता है, उतना वेद में नहीं। अतः आयुर्वेद में उपलब्ध शरीर विज्ञान भी लोक सापेक्ष है, जो कि इस पृथिवी लोक के मनुष्यों आदि के अनुसार होने से प्रमाण कोटि में आता है। अगर ब्रह्माण्ड भर के सभी ग्रहों पर यह विज्ञान एक सा होता तो परमात्मा ने इसका भी विस्तार पूर्वक वर्णन वेद में अवश्य कर दिया होता।

            अन्य लोकों में भी मनुष्यादि सृष्टि के सम्बन्ध में महर्षि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश के अष्टमसमुल्लास में कहते हैं —

“प्रश्न :— सूर्य, चन्द्र और तारे क्या वस्तु हैं और उनमें मनुष्यादि सृष्टि है वा नहीं ?

उत्तर :— ये सब भूगोल लोक और इनमें मनुष्यादि प्रजा भी रहती है क्योंकि —

एतेषु हीदसर्वं वसु हितमेते हीदसर्वं वासयन्ते तद्यदिदसर्वं वासयन्ते तस्माद्वसव इति॥

                                                ॥शत० का॰ १४.६.९.४॥

            पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, नक्षत्र और सूर्य इनका वसु नाम इसलिये है कि इनमें सब पदार्थ और प्रजा वसती है और ये ही सबको वसाते हैं। जिसलिये वास के निवास करने के घर हैं इसलिये इसका नाम वसु है। जब पृथिवी के समान सूर्य चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं पश्चात् उनमें इसी प्रकार प्रजा होने में क्या सन्देह? और जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुष्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्य होगें ? परमेश्वर का कोई भी काम निष्प्रयोजन नहीं होता तो क्या इतने असंख्य लोकों में मनुष्यादि सृष्टि न हो तो सफल कभी नहीं हो सकता है। इसलिये सर्वत्र मनुष्यादि सृष्टि है।

प्रश्न :— जैसे इस देश में मनुष्यादि सृष्टि की आकृति अवयव है वैसे ही अन्य लोकों में होगी वा विपरीत?

उत्तर :— कुछ-कुछ आकृति का भेद होने में सम्भव है। जैसे इस देश में चीने, हबशी और आर्य्यावर्त्त, यूरोप के अवयव और रङ्ग रूप आकृति का भी थोड़ा-थोड़ा भेद होता है इसी प्रकार लोक-लोकान्तरों में भी भेद होते हैं। परन्तु जिस जाति की जैसी सृष्टि इस देश में है वैसी जाति की ही सृष्टि अन्य लोकों में भी है। जिस-जिस शरीर के प्रदेश में नेत्रादि अङ्ग हैं उसी-उसी प्रदेश में लोकान्तर में भी उसी जाति के अवयव भी वैसे ही होते हैं।”

            उपर्युक्त मान्यता के आधार पर यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक ग्रह पर विभिन्न प्राणियों और मनुष्य आदि के शरीरों का आकार-प्रकार तथा इन शरीरों के विभिन्न अङ्ग इस लोक = पृथिवी पर उपलब्ध प्राणियों के एकदम समान ही हों। यह भी आवश्यक नहीं है कि अन्य ग्रहों = लोकों में प्राणियों के शरीर पार्थिव ही हों, जैसा कि पृथिवी लोक में है। सूर्य, नक्षत्र आदि अग्नि तत्त्व प्रधान वसुओं में प्राणियों के शरीर, अग्नि तत्त्व के बाद बने, जल तत्त्व और पृथिवी तत्त्व की प्रधानता से बने नहीं हो सकते, क्योंकि अग्नि प्रधान देश में पार्थिव और जलीय पदार्थों / शरीरों का अस्तित्त्व पृथिवी के समान सम्भव नहीं हो सकता। इस विषय में महर्षिव्यास कृत वेदान्तदर्शन के सूत्र “वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः” २.४.२२ में शरीर का विशिष्टता के सन्दर्भ में अर्थ करते हुए आर्यमुनि जी लिखते हैं “पृथिवी आदि तत्त्वों की अधिकता से शरीर में पार्थिवादि व्यवहार होता है।” इसी को आगे स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं “पाञ्चभौतिक होने पर भी किसी एक तत्त्व की अधिकता से शरीर में पार्थिव, जलीय आदि का व्यवहार हो सकता है। अर्थात् पृथिवी तत्त्व अधिक होने से मनुष्य शरीर ‘पार्थिव’ और जलतत्त्व की अधिकता से मत्स्यादि शरीर ‘जलीय’ कहाते हैं, यही रीति तैजसादि शरीरों में भी जाननी चाहिए।”

            इसी सम्बन्ध में महर्षि कपिल सांख्यदर्शन में अन्य आचार्यों का मत इस प्रकार से कहते हैं “ऐकभौतिकमित्यपरे” ॥सांख्य ३.१९॥ अर्थात् “स्थूल शरीर एक भूत से बना है, ऐसा अन्य आचार्य मानते हैं।” इस पर आचार्य उदयवीर जी व्याख्या करते हुए लिखते हैं “जैसे पृथ्वीलोक में समस्त देहों की रचना में पार्थिव तत्त्वों की प्रधानता है, ऐसे ही सूर्य आदि लोकों में तैजस शरीरों की कल्पना की जा सकती है। वहाँ जो शरीर होगें, उनमें तैजस तत्त्व की प्रधानता संभव है। तथा अन्य लोकों में दूसरे तत्त्वों की प्रधानता वाले देह हो सकते हैं।” इस विषय में प्रशस्तदेवाचार्य तो अपने पदार्थधर्मसंग्रह, जो कि महर्षि कणाद कृत वैशेषिकदर्शन का व्याख्यान है, में मात्र सम्भावना नहीं बल्कि स्पष्ट रूप से पृथिवी लोक में पार्थिव तत्त्व प्रधान शरीरों, वरुण लोक में जल तत्त्व प्रधान शरीरों, आदित्यलोक में अग्नि तत्त्व प्रधान शरीरों तथा मरुतलोक में वायु तत्त्व प्रधान शरीरों का उल्लेख करते है।[1] यहाँ पर यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि आत्मा से सम्बद्ध कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर सर्वत्र समान ही हैं, केवल उसके लिए भौतिक शरीरों में ही भेद होता है। स्थूल महाभूतों यथा जल, वायु और अग्नि आदि तत्त्वों से कारणशरीर और सूक्ष्मशरीर में कोई अन्तर नहीं आता। अर्थात् आत्मा के ही समान, अग्नि, जल और वायु से, इन कारण और सूक्ष्म शरीरों में जलना, भीगना अथवा सूखना आदि नहीं घटता। इसी प्रकार यदि दूसरे ग्रहों पर पृथिवी से सर्वथा भिन्न वातावरण अर्थात् अत्याधिक गर्म या अत्याधिक ठंडा वातावरण है तो उस ग्रह पर प्राणियों के ऐसे प्रकार के स्थूल शरीरों का होना सम्भव हैं जो उस ग्रह के वातावरण के अनुसार तालमेल रखते हों, अर्थात् अत्याधिक गर्मी अथवा अत्याधिक ठंड के अनुकूल जीवन यापन में प्राणियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। परन्तु इस लोक के वातावरण के अनुसार अन्य ग्रहों पर जीवन की सम्भावनाओं की वर्त्तमान वैज्ञानिकों की खोज सम्भवतः अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती। अतः भौतिक शरीरों में मात्र पृथिवी महाभूत की प्रधानता से बने शरीरों का ग्रहण करना और अन्य स्थूल भूतों = यथा जल, अग्नि और वायु की प्रधानता से बने शरीरों का अस्तित्व ही स्वीकार न करना, इस लोक की दृष्टि से चाहे सही ज्ञात होता हो, परन्तु परमात्मा द्वारा ऐसी रचना की सम्भावना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अतः अन्य लोकों में इस प्रकार की शरीर-धारियों का अस्तित्व स्वीकृत होने पर, इस पृथिवी लोक में शरीर सम्बन्धी मान्यताएँ को उन शरीरों पर समान रूप से लागू कर, उन शरीरों को असम्भव नहीं कहा जा सकता।

शंका — महर्षि दयानन्द तो यह कह रहे हैं कि “जिस जाति की जैसी सृष्टि इस देश में है वैसी जाति की ही सृष्टि अन्य लोकों में भी है। जिस-जिस शरीर के प्रदेश में नेत्रादि अङ्ग हैं उसी-उसी प्रदेश में लोकान्तर में भी उसी जाति के अवयव भी वैसे ही होते हैं।” ऐसे में जल, अग्नि और वायु तत्त्व प्रधान शरीरों अस्तित्व कैसे स्वीकार किया जा सकता है। उन सभी लोकों में, इस पृथिवी पर मनुष्यादि प्राणियों के समान ही सभी मनुष्यादि प्राणी मानने चाहिए, न कि उनसे भिन्न।

समाधान — आपने महर्षि की भाषा से, स्वयं द्वारा पूर्व स्वीकृत ज्ञान के अनुसार अर्थ लगा लिया है;  जबकि महर्षि दयानन्द ऐसा नहीं कह रहे हैं। उनका यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि जैसे इस पृथिवी पर पृथिवी तत्त्व प्रधान शरीरधारी हैं, मात्र वैसे ही शरीरधारी अन्य सभी लोकों एवं वसुओं में भी हैं। यह सत्य है कि जिस भी लोक में पृथिवीतत्त्व प्रधान शरीरों की सृष्टि परमात्मा करेगा, वह सृष्टि इस लोक की सृष्टि से मिलती हुई सी होगी, और थोड़ा बहुत परिवर्तन भी सम्भव है। परन्तु जहाँ पृथिवी तत्त्व प्रधान सृष्टि सम्भव ही नहीं है, वहाँ ऐसे शरीरों का होना कैसे सम्भव माना जाए। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने शतपथ ब्राह्मण के आधार पर सूर्य नक्षत्र आदि वसुओं में, जो कि अग्नि तत्त्व प्रधान हैं, भी मनुष्यादि सृष्टि का होना स्पष्ट रूप से कहा है। वहाँ पर अग्नि, अथवा वायु तत्त्व प्रधान शरीरों का ही तो अस्तित्व स्वीकार करना होगा। इस पृथिवी पर अग्नि अथवा वायु तत्त्व प्रधान शरीरों की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती अतः यहाँ ऐसे शरीर नहीं हैं। पृथिवी पर ऐसे शरीरों का अभाव होने से अन्य वसुओं और लोकों में भी ऐसे शरीर नहीं होगें, ऐसा कहना और मानना दुराग्रह नहीं तो क्या है?

            अतः आयुर्वेद के ग्रन्थों में ऋषियों द्वारा प्रतिपादित शरीररचना विज्ञान लोक सापेक्ष ज्ञान है। यह विज्ञान विभिन्न लोकों की स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न होगा;  परन्तु इस प्रकार के लोक सापेक्ष ज्ञान से वेद के लोक निरपेक्ष ज्ञान पर कोई आक्षेप नहीं आता।

३.       मनुष्यों की आयु — अब उपर्युक्त सन्दर्भों में मनुष्य की आयु को भी समझना चाहिए। वेद में मनुष्यों की सामान्य आयु को शतवर्ष का कहा गया है। यजुर्वेद ३६.२४ में “जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तं” अर्थात् सौ शरद ऋतु पर्यन्त जीवें। क्योंकि वर्ष में शरद ऋतु एक बार ही आती है अतः सामान्य आयु का मान शत वर्ष हुआ। इस उपरोक्त वर्ष का काल वस्तुतः लोक में काल की गणना से सम्बन्धित है ना कि वेद से। अर्थापत्ति से यह भी सिद्ध होता है कि जिन ग्रहों = लोकों में वर्ष का काल जितना अधिक होगा वहाँ पर मनुष्य की आयु का काल भी पृथिवी के काल की अपेक्षा से उतना अधिक होगा। जैसे कि अगर प्लूटो ग्रह पर मानवीय सृष्टि हो तो वहाँ पर मनुष्य की शतवर्ष की आयु पृथिवी के मनुष्य की अपेक्षा से २४८ गुणा अधिक होनी चाहिए, क्योंकि वहाँ का एक वर्ष इस पृथिवी के २४८ वर्ष के समान है। अतः विभिन्न लोकों में पृथिवी की अपेक्षा से अत्याधिक लम्बी आयु का होना सम्भव है। यदि किसी ग्रन्थ में कोई मनुष्य इसी पृथिवी पर होने वाले मनुष्य की आयु को सहस्र अथवा लक्ष वर्ष की कहे तो ऐसा असम्भव है;  दूसरी ओर कोई ऋषि अपने किसी ग्रन्थ में किसी अन्य लोक में ऐसी किसी सम्भावना का वर्णन करे अर्थात् वहाँ पर प्राणी की आयु इतने सहस्र अथवा लक्ष वर्ष की है तो ऐसे ज्ञान को, उस लोक विशेष का सापेक्ष ज्ञान जान कर, सम्भव माना जा सकता है। 

            इसी प्रकार अन्य लोकों में अग्नि, जल, वायु तत्त्व प्रधान शरीरों की सम्भावना को स्वीकार कर लेने पर इन शरीरों में दीर्घ आयु की सम्भावना को भी स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि जैसी अक्षमता पार्थिव शरीरों में समय के साथ इस पृथिवी लोक पर देखने में आती है, उस प्रकार की अक्षमताओं का आग्नेय अथवा वायवीय शरीर में होना सम्भव प्रतीत नहीं होता। फिर भी इस विषय का पूर्ण ज्ञान तो परमात्मा को ही है।

४.         योगसूत्र १.८ के भाष्य में महर्षि व्यास लिखते हैं — “तद्यथा द्विचन्द्रदर्शनं सद्विषयेणैकचन्द्रदर्शनेन बाध्यत इति।” अर्थात् दो चन्द्र दर्शन रूपी विपरीत ज्ञान का वास्तविक एक चन्द्र दर्शन से निराकरण हो जाता है। यह भी लोक सापेक्ष ज्ञान का उदाहरण है। इस लोक = पृथिवी का एक चन्द्र होने से यह आवश्यक नहीं है कि इसी सौरमण्डल के दूसरे प्रत्येक ग्रह का भी एक-एक ही चन्द्र होता है। वर्त्तमान काल के अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने दूरान्वीक्षक यन्त्रों = दूरबीन आदि के द्वारा अन्य ग्रहों पर साक्षात् हुए चन्द्रमाओं की संख्या को निम्न प्रकार से बताया है  —

                        ग्रह का नाम             चन्द्रमा          ग्रह का नाम             चन्द्रमा

                        बुध                               कोई नहीं           शुक्र                              कोई नहीं

                        मंगल                            २                      बृहस्पति                         २८       

                        शनि                              ५६                    वरुण                             २७

                        नेप्च्यून                           १३                    प्लूटो                             ३

            इसी प्रकार अन्य सौरमण्डलों और अन्य आकाशगंगाओं में उपस्थित विभिन्न ग्रहों के विषय में भी जानना चाहिए। वेद में किसी भी ग्रह पर उपस्थित चन्द्रमाओं की संख्या का उल्लेख नहीं मिलता। अतः किसी भी ग्रह के चन्द्रमाओं की संख्या को कहना लोक सापेक्ष ज्ञान है।

५.         हमारे इस सौरमण्डल में सूर्य की परिक्रमा करने वाले मान्यता प्राप्त ९ ग्रह थे। कुछ काल पूर्व ईस्वी संवत् २४ अगस्त २००६ की वैज्ञानिकों की बैठक में प्लूटो, जिसको ईस्वी संवत् १९२१ से ग्रह की मान्यता प्राप्त थी, को अन्य ग्रहों के समान, ग्रह के रूप में स्वीकार नहीं किया गया। परिणामस्वरूप अब सौरमण्डल में ८ ग्रह ही स्वीकृत हैं। अगर प्लूटो को ग्रह के रूप में स्वीकार किया जाता तो ऐसी ही श्रेणी के तीन अन्य पिण्डों को भी ग्रह के रूप में स्वीकार करना होता जिससे इस सौरमण्डल के ग्रहों की संख्या १२ हो जाती। यह ज्ञान भी लोक सापेक्ष है। क्योंकि वेद में ऐसा कोई वर्णन नहीं है। अगर ब्रह्माण्ड में उपलब्ध सभी तारों / सूर्यों के चारों ओर ग्रहों की संख्या निश्चित होती तो इसका वर्णन वेद में अवश्य आता, क्योंकि ब्रह्माण्ड भर में समान रूप से उपलब्ध होने वाले ज्ञान का वर्णन वेद में होता ही। इसका न होना भी यह सिद्ध करता है कि इसी आकाशगंगा के अन्य सूर्यों के चारों ओर भिन्न-भिन्न संख्या में ग्रह हो सकते हैं।

६.         इसी प्रकार ब्रह्माण्ड में स्थित सभी सूर्यों का आकार आदि भी समान नहीं है।  वर्त्तमान में वैज्ञानिकों ने दूरन्वीक्षक यन्त्रों द्वारा बहुत से भिन्न आकार वाले तारों को देखा है, जो हमारे सूर्य से कई गुणा बड़े हैं। जिस प्रकार ये सूर्य हमारी पृथिवी के सूर्य की अपेक्षा से अधिक आकार वाले हैं, तो ऐसी सम्भावना भी व्यक्त की जा सकती है कि इन सूर्यों के सौरमण्डलों का आकार भी हमारे सौरमण्डल की अपेक्षा से अधिक विशाल हो सकता है और उस सौरमण्डल में ग्रहों का आकार भी  पृथिवी आदि की अपेक्षा से अधिक विशाल हो सकता है। क्योंकि बड़े सूर्य के गुरुत्वाकर्षण का क्षेत्र अधिक होने से ऐसी सम्भावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। अतः इस प्रकार का ज्ञान भी लोक सापेक्ष ही होता है।

            अतः ऋषियों द्वारा प्रतिपादित ग्रन्थों में जब इस लोक की वस्तुस्थिति अथवा परिस्थितियों के आधार पर वेद के रहस्यों का विवेचन किया जाता है, तब ऐसा ज्ञान लोक सापेक्ष ज्ञान कहाता है;  और जब ऐसा विवेचन किसी एक लोक से सम्बन्धित न होकर ब्रह्माण्ड भर से सम्बन्धित हो, तो ऐसा ज्ञान लोक निरपेक्ष कहाता है;  यथा परमात्मा सर्वव्यापक और सर्वज्ञ है, वह सभी जीवों को उनके कर्मों के अनुसार जाति आयु और भोग रूप फलों को प्राप्त कराता है, यह ज्ञान लोक निरपेक्ष है।

            योगदर्शन के कई रहस्यों को समझने हेतु इस लोक सापेक्ष और लोक निरपेक्ष ज्ञान के अन्तर को समझना होगा तभी हम महर्षि व्यास द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को सम्यक् रूप से समझ पायेंगे।

 


[1] प्रशस्तपादभाष्य के पृथिवीनिरुपणप्रकरणम्, जलनिरुपणप्रकरणम्, तेजोनिरुपणप्रकरणम् तथा वायुनिरुपणप्रकरणम् द्रष्टव्य हैं।

            योगदर्शन के विभूतिपाद में महर्षि पतञ्जलि ने विभिन्न विषयों, पदार्थों और देशों में संयम से होने वाली सिद्धियों का वर्णन किया है। इन सिद्धियों में कुछ सिद्धियाँ सामान्य रूप से असम्भव प्रतीत होती हैं, जिसके कारण जन सामान्य में कई भ्रान्तियाँ फैली हुई हैं। इसी कारण विभिन्न भाष्यकारों ने व्यासभाष्य के अर्थ का अनर्थ करते हुए ऐसी-ऐसी धारणायें और मान्यतायें प्रचारित कर दी, जिससे कई सिद्धियों का वास्तविक रूप ही आवरण में आ गया। वर्त्तमान काल में सामान्य मनुष्य, कुछ आसन और प्राणायाम की क्रिया विशेष करता हुआ, और परिणामस्वरूप शरीरिक स्वास्थ्य को प्राप्त करता हुआ, यह मानता है कि वह दैनिक जीवन में योग कर रहा है;  इससे अधिक योग का कोई अर्थ उसके लिए नहीं है। जबकि चित्त वृत्तिनिरोध रूप जो वास्तविक योग है, उसके बारे में कोई ज्ञान ही नहीं, तो ऐसे में विभूतियों के बारे में यथार्थ ज्ञान का होना तो बहुत दूर का विषय है। विद्वत्वर्ग में योग से प्राप्त होने वाली विभूतियों को निम्न प्रकार से जाना जाता है —

    सूत्र संख्या     संयम का विषय                                      विभूति

            ३.१६      परिणाम त्रय                                            अतीत अनागत का ज्ञान

            ३.१७     शब्द, अर्थ, प्रत्यय - प्रविभाग                       सब प्राणियों के शब्दों का ज्ञान

            ३.१८     संस्कार                                                   पूर्व जाति = जन्म का ज्ञान

            ३.१९      प्रत्यय                                                     पर चित्त का ज्ञान

            ३.२१      कायरूप                                                  अन्तर्धान = छिप जाना

            ३.२२     सोपक्रम, निरुपक्रम कर्म                             मृत्यु का ज्ञान

            ३.२३      मैत्री आदि                                               मैत्री आदि बल = शक्ति

            ३.२४     हस्ति आदि बल                                        हस्ति आदि बल प्राप्ति

            ३.२५      ज्योतिष्मती प्रवृत्ति                                     सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट ज्ञान           

            ३.२६      सूर्य                                                        भुवन का ज्ञान

            ३.२७     चन्द्र                                                      ताराव्यूह का ज्ञान

            ३.२८     ध्रुव                                                        तारों की गति का ज्ञान

            ३.२९      नाभिच्रक                                                            शरीर के व्यूह = स्थितिक्रम का ज्ञान

            ३.३०      कण्ठकूप                                                 भूख-प्यास की निवृत्ति

            ३.३१      कूर्मनाड़ी                                                 स्थिरता प्राप्ति

            ३.३२      मूर्धा ज्याति                                             सिद्ध दर्शन

            ३.३४      हृदय                                                      चित्त

            ३.३५      स्व-अर्थ = पुरुषविषयक ज्ञान                       पुरुष = जीवात्मा का ज्ञान

            ३.३८     बन्धकारण की शिथिलता और                      चित्त का परशरीर प्रवेश

                        चित्त की प्रवृत्ति के मार्ग का ज्ञान

            ३.३९      उदान प्राण का जय                                                जल, पंक, कण्टक असङ्ग और ऊर्ध्वगति

            ३.४०     समान प्राण का जय                                   शरीरिक तेज की प्राप्ति

            ३.४१      श्रोत्र-आकाश सम्बन्ध                                 दिव्य श्रोत्र की प्राप्ति

            ३.४२     शरीर-आकाश सम्बन्ध                                आकाशगमन

            ३.४३      महाविदेहावृत्ति                                         प्रकाश के आवरण का क्षय

            ३.४४     पंचभूतों के स्थूल, स्वरूप आदि                     पंचभूतों पर जय

            ३.४५      पंचभूत जय से                                          अणिमादि सिद्धियाँ और कायसम्पत्

            ३.४७     इन्द्रियों के ग्रहण, स्वरूप आदि                     इन्द्रियजय          

            ३.४८     इन्द्रियजय से                                           मनोजवित्व, विकरणभाव, प्रधानजय

            ३.४९      सत्त्व-पुरुष का भेदज्ञान                               सर्वभावाधिष्ठातृत्व, सर्वज्ञातृत्व

            ३.५१      क्षण और उसका क्रम                                 विवेकज-ज्ञान

            वेदादि सत्यशास्त्रों के अध्ययन के न रहने से, स्वयं की वास्तविक योग = चित्तवृत्तिनिरोध में अप्रवृत्ति से, योग के बहिरङ्ग साधनों = वो भी विशेषतया आसन, प्राणायाम तक सीमित रहने से, योग के अन्तरङ्ग अङ्गों = धारणा, ध्यान और समाधि में कुछ भी गति न होने से, उपरोक्त सिद्धियों हेतु संयम के विषयों और उनसे प्राप्त होने वाली सिद्धियों के बारे में सम्यक् ज्ञान सामान्य विद्वानों तक को भी नहीं हो पाता। ऐसे में ऋषि पद्धति के ज्ञान से रहित अनार्ष एवं अवैदिक मान्यताओं को मानने वाले अयोगियों द्वारा रचित ग्रन्थों में प्रतिपादित मान्यताओं के प्रचार द्वारा, योग के सम्बन्ध में दुष्प्रचार ही हो रहा हैं। जो संयम के विषय ही नहीं हैं, वे भी संयम के विषय बताए जा रहे हैं;  और सिद्धियों का जो वास्तविक स्वरूप नहीं है, उसे ही सिद्धि के रूप में बताया जाता है। ऋषियों की परम्परा में बाह्य सूर्य, चन्द्र और ध्रुव तारे को संयम का विषय कहीं नहीं कहा गया, परन्तु ये तीनों ही योगसूत्र ३.२६, ३.२७, और ३.२८ में आधुनिक विद्वानों द्वारा, संयम के विषय, माने और कहे जाते हैं। इसी प्रकार कुछ विद्वान् योगसूत्र ३.१६ में प्रतिपादित पहली ही सिद्धि में अतीत और अनागत ज्ञान से मनुष्यों के अतीत = भूतकाल और अनागत = भविष्यत्काल का ज्ञान भी कहते हैं।  ऐसा सब कुछ वेद और वेदानुकूल शास्त्रों के पठन-पाठन न रहने, और महर्षिव्यास के नाम से प्रचलित, परन्तु अन्य मनुष्यों द्वारा रचित वेद-विरुद्ध मान्यताओं को प्रचारित करने वाले १८ पुराणों के पठन-पाठन के कारण हो रहा है।

            इस व्याख्या में हमने, वेदादि सत्यशास्त्रों के ज्ञान के आधार पर, महर्षि व्यास द्वारा भाष्य में प्रयुक्त शब्दों की यथार्थता को स्पष्ट कर, सिद्धियों के वास्तविक स्वरूप को प्रतिपादित किया है।

            In this chapter seer Patanjali had described various attainments which can be achieved by performing Sanyama over various subjects / objects. In the philosophy of Yoga, Sanyama is defined as – the process where             concentration, meditation and trance, are on one object / subject (Ref Yoga 3.4); this is specific definition for the purpose of this philosophy. There is no equivalent word for this Sanyama in English. Hence we have used this as a noun in our English commentary and is to be understood accordingly. 

            Some of the attainments appear to be impossible, with the result there is confusion in the mind of common person. For this reason various commentators had translated according to their level of knowledge and beliefs, and propagated such misconceptions; which resulted in shadow on the real form of Yoga. In the present age Yoga is propogated as mean to acheive the more preferabley physical health than to achieve mental steadiness; and even the mental concentration is said to be meant for performing one's day to day affairs more efficiently. So a person, by performing some postures and regulation of breath in his day to day life and attaining physical health thereby, believes that he is performing Yoga; there no other meaning of Yoga for him. On the other hand, Yoga is restraint of modifications of mind. When the real function of Yoga is not in practice for a common man, then knowledge of attainments is a far off subject.

            Various attainments as described in the third chapter from aphorisms 3.16 to 3.54, are as follows:—

Aphorism       Subject                                               Attainment

3.16     Three-fold Change of object                Knowledge of Past and Future of Object

3.17     Distinction of Word, Object and                      Knowledge of speech of all human-beings

            Knowledge

3.18     Residual potencies                               Knowledge of previous life-states

3.19     Modification of other’s mind               Knowledge of other’s mind

3.21     Form of Body                                      Disappearance from the sight of others

3.22     Fast-in-fruition and                              Knowledge of death

            Slow-in-fruition acts

3.23     Friendliness etc                                                Power of friendliness etc.

3.24     Power of Elephant etc.                         Attainment of power of Elephant etc.

3.25     Light of Lucid State of mind                Subtle, indirect and expanded knowledge

3.26     Sun                                                      Knowledge of universe

3.27     Moon                                                   Knowledge of constellations

3.28     Pole Star                                              Knowledge of movement of stars

3.29     Navel Plexus                                        Knowledge of System of body

3.30     Pit of throat                                          Absence of hunger and thrust

3.31     Tortoise tube                                        Steadiness of body

3.32     Coronal Light                                       Knowledge of intellectuals / attainers

3.34     Heart                                                    Knowledge of mind

3.35     Notion of self                                      Knowledge of Soul

3.38     Relaxing the cause of bondage                        Entry into another’s body

            And knowledge of passage of

            Movement

3.39     Mastery over Udaana system               Contact-less with water, mud, thorn and

            Of breath                                             ascension at the time of death

3.40     Mastery over Samaana system                         Effulgence

            Of breath

3.41     Relation between power  of                 Higher power of hearing

            Hearing and sky

3.42     Relation between body and sky                       Ability to move in sky

3.43     Great Excorporeal modification                       Destruction of veils of knowledge

3.44     Form etc. of gross objects                    Mastery over the gross objects

3.45     By mastery of gross objects                 Powers of attenuation etc.

3.46     Form etc. of sense organs                    Mastery over the senses

3.47     By mastery of senses                           Quickness of mind, un-instrumental                                                                            perception and Mastery over the matter

3.49     Distinctive knowledge of mind                        Lordship of existing substances and real        

            And soul                                              knowledge of all objects

3.51     Moment and its succession                  Knowledge born of discrimination

            On account of non-study of Vedas, Vedic Scriptures, non-performance of Yoga in practical life, being limited to two external accessories of Yoga i.e. Posture and Regulation of breath, and no practice of internal accessories – concentration, meditation and trance of Yoga, even the intellectuals are not able to know the real form and meaning of attainments achievable by performing Sanyama on various subjects / objects. As such the commentaries on the Philosophy of Yoga by the persons, who are non-performer of Yoga and have no knowledge of stream of seers, are propagating misconceptions about the Yoga. The subjects / objects which are not the subject of Sanyama, are described as subject of Sanyama; with the result unreal form of attainment get explained as attainment. In the stream of seers, as explained above, Sun, Moon and Pole Star cannot be taken as the subject of Sanyama, but these are being said as subject of Sanyama for attainments in aphorisms 3.26 to 3.28 by the various intellectuals after Bhoja. In the same way some of the commentators had accepted the knowledge of past, present and future of living beings by performing Sanyama as per aphorism 3.16. This is happening due to non-study of Vedas and Vedic Scriptures, and acceptability of 18 Puranas, said to be written by seer Vyaasa, as authentic.

            In this commentary we have explained the attainments on the basis of testimonies of Vedas and Vedic scriptures, by explaining the words used by seer Vyaasa in respective aphorisms.

            योगदर्शन में महर्षि पतञ्जलि ने समाधि के दो भेद कहे हैं — सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि। इन दोनों समाधियों में भेद को स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। सम्प्रज्ञात समाधि चित्त की एकाग्रावस्था में होती है, जिसमें राजसिक और तामसिक वृत्तियों का निरोध होता है, और चित्त में सत्त्वगुण प्रधान वृत्तियाँ रहती हैं। जबकि असम्प्रज्ञात समाधि चित्त की निरुद्धावस्था में होती है, अर्थात् जिसमें सर्ववृत्ति निरोध को कहा है। इस आधार पर बहुधा भाष्यकारों का यह मानना है कि जब सर्ववृत्ति निरोध हो जाता है, तो उस काल में किसी भी प्रकार के ज्ञान का अभाव होता है, क्योंकि ज्ञान प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम के अनुसार ही होने से वृत्तिरूप ही होता है। ऐसे में बहुधा विद्वान् असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में आत्मा और परमात्मा के ज्ञान का भी निषेध मानते हैं।

            वास्तव में उपर्युक्त यह मान्यता कि — “असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में आत्म-ज्ञान और परमात्म-ज्ञान अथवा आत्म-साक्षात्कार एवं परमात्म-साक्षात्कार का भी सर्वथा निषेध होता है” — असम्प्रज्ञात समाधि के यथार्थ स्वरूप को न समझने के कारण बनी हुई है। इस भाष्य में हमने वेद, उपनिषद् तथा वेदान्तदर्शन आदि के प्रमाणों के आधार पर परमात्म-साक्षात्कार = परमात्म-अनुभूति को असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में प्रतिपादित किया है। इस हेतु हमें सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधि में होने वाले ज्ञान तथा अनुभूति के भेद को समझना होगा। असम्प्रज्ञात समाधि के वास्तविक स्वरूप को, व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी रूप प्रमाणों के आधार पर, निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

१.         “न तत्र किञ्चित्संप्रज्ञायत इत्यसंप्रज्ञातः॥” (व्यासभाष्य १.२) अर्थात् इस अवस्था में किसी भी पदार्थ का ज्ञान अर्थात् अब तक जाने हुए किसी भी पदार्थ का ज्ञान नहीं होता अतः इस समाधि को असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। वस्तुतः इस सूत्र पर व्यासभाष्य को ध्यानपूर्वक पढ़ने पर यह ज्ञात होता है कि इस अवस्था में अब तक जाने हुए पदार्थों का अभिप्राय सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था तक जाने हुए पदार्थों से है, न कि परमात्मा से। इस तथ्य को हमने प्रमाणपूर्वक योगसूत्र १.२ की व्याख्या में प्रतिपादित किया है।

२.         “सर्ववृत्तिनिरोधे त्वसंप्रज्ञातः समाधिः॥” (व्यासभाष्य १.१) अर्थात् निरुद्धावस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है। यहाँ चित्त की वृत्तियों को समझना होगा। चित्त की वृत्तियाँ प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति हैं। विपर्यय, मिथ्याज्ञान होने से इसका निरोध तो सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था से पूर्व ही हो जाता है। निद्रा को महर्षि व्यास ने अन्य वृत्तियों के समान निरोध करने योग्य कहा है (व्यासभाष्य १.१०), क्योंकि निद्रा होने पर सम्प्रज्ञात समाधि ही सिद्ध नहीं हो पायेगी।  सम्प्रज्ञात समाधि के भेदों को योगसूत्र १.१७, १.४२-४४ तथा इसके स्वरूप को योगसूत्र १.४१ में स्पष्ट किया है। सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में “प्रमाण” (प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम), विपर्यय रहित “विकल्प” तथा “स्मृति” रूप सात्त्विक वृत्तियों का अस्तित्व रहता है।

            सम्प्रज्ञात समाधि में रहने वाली वृत्तियों (= प्रमाण, विकल्प और स्मृति रूपी सत्त्वगुण प्रधान) को, परमात्म-ज्ञान के सम्बन्ध में, इस प्रकार से जानना और समझना चाहिए —

अ.        प्रमाण में प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम इन तीनों को गिना है। योगसूत्र १.७ की व्याख्या में महर्षि व्यास ने इन्द्रियों के माध्यम से बाह्यवस्तु के सम्बन्ध से होने वाले, पदार्थ के विशेष धर्मों के, ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा है। प्रत्यक्ष का यह लक्षण परमात्मा में नहीं घटता। न तो परमात्मा, जीवात्मा के लिए बाह्य पदार्थ है, और न ही परमात्मा का ज्ञान इन्द्रियों के माध्यम से सम्भव है। अतः असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्म-ज्ञान हेतु प्रत्यक्ष प्रमाण रूप वृत्ति का निरोध स्वतः ही हो जाता है। पदार्थ के सामान्य धर्मों का निश्चय कराने वाली वृत्ति को अनुमान प्रमाण कहा है। परमात्मा में सामान्य अथवा विशेष धर्मों का कथन ही असंगत है। इस प्रकार यह वृत्ति भी परमात्म-अनुभूति में नहीं घटती। वेदादि सत्यशास्त्र पूर्वक मात्र शब्दज्ञान से होने वाला परमात्म-ज्ञान, वास्तव में परमात्मा की अनुभूति को करा ही नहीं सकता। परमात्मा की अनुभूति को शाब्द रूप में कहा भी नहीं जा सकता, अतः शब्द रूप प्रमाण वृत्ति का भी निषेध जानना चाहिए।

आ.       विकल्प के विषय में योगसूत्र १.९ में कहा है कि शब्दज्ञान से उत्पन्न परन्तु पदार्थ से रहित वृत्ति विकल्प कहलाती है। “परमात्मा” शब्दज्ञान से उत्पन्न वृत्ति मात्र नहीं है, वरन् वह सत्तावान् पदार्थ है अतः इस वृत्ति का निरोध स्वाभाविक है।

इ.         स्मृति वृत्ति प्रमाणादि वृत्ति पूर्वक ही होती है (योगसूत्र तथा व्यासभाष्य १.११)। जब परमात्मा के ज्ञान में उपर्युक्त प्रकार से प्रमाण आदि वृत्तियों का निरोध हो जायेगा, तो ऐसे में उन वृत्तियों की स्मृतियों का निरोध भी, इनको परमात्म-अनुभूति हेतु अनुपयोगी जान कर करना ही होगा। साधक इसकी अनुपयोगिता को भी प्रमाणादिवत् जान कर इसके निरोध हेतु पूर्ण पुरुषार्थ करेगा।

            परमात्मा की अनुभूति, जो कि असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में शास्त्रकारों ने मानी है, वह प्रमाणादि वृत्तियों के निरोधपूर्वक ही सम्भव है। इसलिये परमात्म-अनुभूति का निषेध असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में करना उचित नहीं है। उसी अनुभूतिपूर्वक ही जीवात्मा, परमात्मा का साक्षात्कार = अनुभव करता हुआ उसके स्वरूप में जाकर स्थित हो सकता है अन्यथा नहीं;  इस विषय में “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” (योगसूत्र १.३) पर “वैदिक योग-मीमांसा” द्रष्टव्य है।

३.         “सर्ववृत्तिप्रत्यस्तमये संस्कारशेषो निरोधश्चित्तस्य समाधिरसंप्रज्ञातः॥” (व्यासभाष्य १.१८) अर्थात् चित्त की सभी वृत्तियों के निरुद्ध हो जाने पर संस्कार मात्र वाली चित्त की निरोध रूप समाधि असम्प्रज्ञात समाधि है। परन्तु चित्त की इस अवस्था में भी संस्कार उत्पन्न होते हैं, क्योंकि “निरोधस्थितिकालक्रमानुभवेन निरोधचित्तकृतसंस्कारास्तित्वमनुमेयम्॥” (व्यासभाष्य १.५१) अर्थात् निरोध अवस्था के काल क्रम के अनुभव से निरोध चित्त में उत्पन्न संस्कारों का अस्तित्व अनुमान से जाना जाता है।

            अतः इससे स्पष्ट है कि निरुद्धावस्था में संस्कार बनते हैं, परन्तु इन संस्कारों को शाब्द रूप में प्रकट करने की असमर्थता के कारण ही महर्षि व्यास ने इनको अनुमान से जानने योग्य कहा है। संस्कारों की उत्पत्ति होने से ही, चेतन जीवात्मा में किसी न किसी प्रकार की अनुभूति का होना ही प्रमाणित होता है। परन्तु असम्प्रज्ञात समाधि की ये अनुभूतियाँ चित्तगत् नहीं होती, (क्योंकि चेतन जीवात्मा का ज्ञान जड़ चित्त की ओर प्रवाहित नहीं होता, जबकि इन्द्रिय-अर्थ सन्निकर्ष से उत्पन्न चित्तस्थ ज्ञान जीवात्मा हेतु होता है) और न ही इन अनुभूतियों के संस्कार जीवात्मा को जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में बाँधने वाले होते हैं;  इसलिए भी ये अनुभूतियाँ और इनके संस्कार शब्द-ज्ञान के माध्यम से नहीं जाने जाते।

            देखो, जीवात्मा के गुणों में जो गुण स्वाभाविक हैं, उन गुणों के आधार पर होने वाली सभी क्रियाओं को भी शब्द रूप में प्रकट करना सदा सम्भव नहीं होता। आत्मा के गुणों को महर्षि गौतम ने न्यायदर्शन में इस प्रकार से कहा है —

            “इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्॥” न्याय १.१.१०॥ अर्थात् इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान ये आत्मा के लिङ्ग = गुण हैं। इसी प्रकार मोक्ष के प्रकरण में जीवात्मा की शक्तियों का वर्णन करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं —

            प्रश्न :— उसकी शक्ति कै प्रकार की और कितनी है ?

            उत्तर :— मुख्य एक प्रकार की शक्ति है परन्तु बल, पराक्रम, आकर्षण, प्रेरणा, गति, भीषण, विवेचन, क्रिया, उत्साह, स्मरण, निश्चय, इच्छा, प्रेम, द्वेष,[1] संयोग, विभाग, संयोजक, विभाजक, श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, स्वादन और गंध ग्रहण तथा ज्ञान इन २४ चौबीस प्रकार के सामर्थ्ययुक्त जीव है। (सत्यार्थप्रकाश नवम समुल्लास)।

            उपरोक्त ६ गुणों में से इच्छा, प्रयत्न और ज्ञान जीव के स्वाभाविक सामर्थ्य अथवा गुण हैं। और ये तीनों गुण मुक्ति की अवस्था में बिना भौतिक चित्त के भी रहते हैं। जीवात्मा के स्वाभाविक सामर्थ्यों /  गुणों का वर्णन मात्र चित्तगत आधार पर नहीं किया जा सकता।

            इस जीवनकाल में भी मन, वाणी और शरीर से होने वाली क्रिया हेतु, जीव प्रथम इच्छा करता फिर वह चित्त = मन से संयुक्त होता, फिर मन इन्द्रियों से और इन्द्रियाँ अर्थों = विषयों से संयुक्त होती, उससे पूर्व नहीं। मन, इन्द्रियाँ आदि जड़ होने से ये स्वतः किसी भी क्रिया में असमर्थ रहते हैं। अतः इच्छा आदि आत्मा में रहते, मन = चित्त के द्वारा प्रकट होने से पूर्व ही आत्मा में होते, और चित्तगत होने पर ही शब्द रूप में अभिव्यक्त होते, उससे पूर्व नहीं। अतः आत्मा में होने वाली वो अनुभूति जो चित्तगत नहीं होती, वह वृत्तिरूप नहीं कही जाती। जिस प्रकार चित्तगत् न होने पर भी, आत्मा के इन स्वाभाविक गुणों का निषेध नहीं किया जा सकता और न ही इन गुणों के कारण आत्मा में होने वाली अनुभूतियों को शब्दों द्वारा प्रकट किया जा सकता;  उसी प्रकार परमात्म-अनुभूति के विषय में जानना चाहिए। अतः परमात्म-अनुभूति प्रमाणादि वृत्ति रूप नहीं होती। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्म-अनुभूति होने का निषेध नहीं किया जा सकता।

 


[1] सत्यार्थप्रकाश के उपलब्ध संस्करणों में “द्वेष” शब्द उपलब्ध होता है। वस्तुतः सत्यार्थप्रकाश के द्वितीय संस्करण, जो महर्षि दयानन्द के जीवनकाल में छपा रहा था, में यहाँ द्वेष शब्द न होकर “द्वर्ष” शब्द है, जोकि ‘हर्ष’ प्रतीत होता है, जबकि मूल हस्तलेख में भी द्वेष शब्द ही लिखा मिलता है। हो सकता है, स्वामी जी ने प्रूफ के संशोधन करते हुए ‘द्वेष’ को बदल कर ‘हर्ष’ कर दिया हो, क्योंकि “द्वेष” के स्थान पर “हर्ष” गुण मुक्ति की अवस्था में जीवात्मा की शक्ति के रूप में अधिक उचित ज्ञात होता है, और द्वेष के रहते जीवात्मा की मुक्ति सम्भव नहीं हो सकती। परन्तु प्रूफ संशोधक ने ‘द्व’ के स्थान पर ‘ह’ नहीं किया गया क्योंकि पुराने टाईप के घिसे होने से दोनों का आकार एक सा प्रतीत होता है। (इस छपे टाईप को हमने स्वयं देखा है)

 

            In this philosophy Seer Patanjali had described two categories of trance – Cognitive and Ultra-cognitive. We are to clearly understand the distinction between these two. Cognitive trance takes place in the one-pointed state of mind, where the modifications of Activity and Inertia (Qualities) are restrained and modifications of Illumination Quality only exist. On the other hand Ultra-cognitive trance take place in the restrained state of mind, where all the modification are restrained. On the basis of above various commentators believe that when all the modifications are restrained, then there is absence of any type of knowledge, since knowledge is the form of perception which is either direct, inferential or verbal cognition, and the same is a form of modification only. As such these commentators accept the absence of knowledge of Soul and GOD also in the state of Ultra-cognitive trance.

            In fact the conception that – “there is absence of knowledge of Soul and GOD or non-cognition of Soul and GOD in Ultra-cognitive trance” is due to non-understanding the real form of Ultra-cognitive trance. In this commentary, we have established the cognition of GOD and His experience, on the basis of testimonies of Vedas and Vedic scriptures in Ultra-cognitive trance. For this we are to understand the difference in the knowledge and experience taking place in Cognitive and Ultra-cognitive trances. The real form of Ultra-cognitive trance, on the basis of testimonies of Vyaasa commentary, is to be understood as follows:

1.         “na tatra ki~nchit-sampraGYaayat iti asampraGYaataH” (Vyaasa commentary 1.2) i.e. in this state none of the object known through the mind till the stage of cognitive trance is cognized, so it is called Ultra-cognitive trance. In fact on reading the Vyaasa commentary with attention, it can be understood that there is denial of knowledge of objects known up to the state of Cognitive trance, not the cognizance of GOD. This fact is categorically established in our commentary to 1.2.

2.         “sarvavritti-nirodhe tu asampraGYaataH samaadhiH” (Vyaasa commentary 1.1) i.e. in the state of total restraint all the modifications of mind, the Ultra-Cognitive trance takes place. Here we have to understand the modifications of mind. Modifications of mind are Real cognition, unreal cognition, imagination, sleep and memory. Unreal cognition, being false knowledge is restrained even before Cognitive trance. Sleep is required to be restrained (Ref 1.10), since trance cannot be achieved, if sleep exists. Divisions of Cognitive trance are explained in 1.17, 1.42-44, and its form is explained in 1.41. In case of Cognitive trance, modifications of Illumination Quality in the form of real cognition, imagination (which is devoid of unreal cognition), and memory exist. These modifications, in the context of cognizance of GOD, are to be understood as follows:

a.         Real cognition includes direct perception, inference and verbal cognition. In aphorism 1.7 seer Vyaasa said that cognizance of specific properties of an object by contact of senses with the external objects is direct perception. The property of direct perception is not applicable to GOD. Neither GOD is external object, nor can be cognized through sense-organs. So modification of direct perception being not applicable for cognizance of GOD in Ultra-cognitive trance will not be there. Inference is modification where the general properties of object are cognized. It is improper to describe the specific or general properties in GOD. In this way this modification also does not apply for cognizance of GOD. Merely Verbal knowledge of GOD from Vedas and Vedic scriptures cannot result in cognizance of GOD. Further experience of GOD cannot be described in words. Hence the modification of verbal cognizance gets restrained for experience or cognizance of GOD.

b.         With regard to imagination it is said in aphorism 1.9 that imagination is that which follows the verbal expressions and knowledge, but has no objective substratum thereof. On the other hand GOD is an existing substratum, and is not a verbal imagination hence restraint of this modification is natural.

c.         Modification of memory is born of the modifications of perception etc. (Ref Vyaasa commentary on 1.11). When the modifications of perceptions etc. are not applicable for the cognisance of GOD, the existence of memory will not be there in this regard or devotee will put full efforts to restrain this modification in order to achieve cognizance of GOD.

            Experience of GOD, which is described by the seers in Ultra-cognitive trance, is possible only by restraint of all modifications only. It is not proper to deny the cognizance of GOD in Ultra-cognitive trance. By such experience only, Soul exists in the form of GOD, not otherwise; this has been explained in our Vedic Commentary on the aphorism 1.3.

3.         “sarva-vritti-pratyastamaye sa.nskaarasheSho nirodhaH-chittasya samaadhiH-amapraGYaataH” (Vyaasa 1.18) i.e. the Ultra-Cognitive Trance is that state of restrained mind, in which all its modifications = affairs cease from action i.e. restrained and their impressions [of modifications] only remain. But residual potencies get generated in this state of mind, since “nirodha-sthiti-kaala-kramaanubhavena nirodha-chitta-krita-sa.nskaara-astitvam-anumeyam” (Vyaasa 1.51) i.e. existence of potencies generated in the restrained mind is to be inferred by the mental experience of the succession in the time of the restrained state of mind.

            From this it is clear that residual potencies get generated in the restrained state of mind, but due to inability to express these potencies in words, seer Vyaasa had said that these are to known by inference. By the generation of residual potencies, it is established that there is some type of experience for the Soul. But the experiences of Ultra-cognitive trance do not take place in mind, (since knowledge of animate Soul do not flow towards mind, however knowledge generated by the contact of object-organ-mind is for the Soul only), nor the potencies of these experiences bound the Soul in the life-cycle; for this reason these experiences and their potencies are not known by the verbal knowledge.

            Further it is not possible to describe all the activities, which take place on account of natural characteristics / properties of Soul, in words. Characteristics of Soul are described, in Philosophy of Nyaaya, as — “ichchha-dveSha-prayatna-sukha-duHkha-GYaanaani-aatmano li.ngam” (1.1.10) i.e. desire, aversion, effort, pleasure, pain and knowledge are the characteristics of Soul. In the same way while describing the powers of Soul in the state of salvation, Swami Dayanand said in Chapter 9 of Light of Truth

Question - What is the nature of this power and of how many kinds is it?

Ans.     Really it is of one kind, but it may be said to consist of the following 24 varieties:-  strength, energy, attraction, suggestion, motion, intimidation, analytic power, skill, courage, memory, discernment, desire, love, hatred1, association, dissociation, dividing power, combining power, power of sight, hearing, touch, taste, smell, knowledge. By the help of these very powers, Soul attains and enjoys happiness even in Emancipation.” (Light of Truth, Chapter 9)

            Out of 6 characteristics, desire, effort and knowledge are the natural characteristics / powers of Soul; and these three remain in the salvation also. The natural characteristics / powers of Soul cannot be merely described on the basis of modifications of mind.

            During the life-time also, for all the activities taking place by the mind, speech, and body, Soul first desires and then gets connected with the mind, then mind gets connected with the organs and organs get connected with the objects, not before that. Mind and organs are not capable of any activity at their own, since these are inanimate objects. Hence desire etc. exist in the Soul only, take place in the Soul, before getting manifested in mind; and are expressed in words only when these manifest in mind, not before that. So the experiences taking place in the Soul, which do not manifest in the mind, cannot be termed as modification. As the natural characteristics of Soul, which do not manifest in mind, cannot be denied and nor the experiences taking place in the Soul on account of these characteristics can be expressed in words; in the same way it is to be known with regard to cognizance of GOD. So the cognizance of GOD is not in the form of modification. On account of above description, cognizance of GOD cannot be denied in Ultra-cognitive trance.

(1. There seems to be power of “happiness” in place of “hatred” due to typographical error in the original work. Pl refer our Hindi commentary in this regard.)

    शंका — योग में अष्टचक्रों में संयम का विधान कहा जाता है, और यह भी यह कहा जाता है कि कुण्डलिनी जागरण आदि के द्वारा समाधि की सिद्धि शीघ्र हो जाती है। योगदर्शन के कई भाष्यकारों ने अष्टचक्रों का वर्णन भी किया है। क्या योगदर्शन में शरीर के चक्रों में संयम का विधान है ?
    समाधान — महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ३.२९ में “नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्” कहा है। अन्य किसी सूत्र में कहीं भी चक्रों के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा। महर्षि व्यास ने अपने भाष्य में उपर्युक्त ३.२९ सूत्र के अतिरिक्त योगसूत्र ३.१ की व्याख्या में “नाभिचक्रे” कहा है।  इसके अतिरिक्त पूरे योगदर्शन में शरीर में तथाकथित चक्रों का कोई वर्णन नहीं है। दूसरी ओर, हठयोग के ग्रन्थों में शरीरस्थ चक्रों का वर्णन आता है। कहीं छः, कहीं आठ और कहीं १२ चक्रों का वर्णन है।   स्वामी हरिहरानन्द आरण्य ने अपने भाष्य में योगसूत्र ३.१ की व्याख्या में छः चक्रों निम्न प्रकार से कहा है — मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनहत, विशुद्ध तथा आज्ञा चक्र;   जबकि शिवयोगमार्ग  के  आधार  पर १२ द्वादशचक्रों को निम्नप्रकार से कहा है — मूलाधार, स्वाधिष्ठान, नाभिचक्र, हृचक्र, कण्ठचक्र, राजदन्त = जिह्वामूल, भ्रूचक्र, निर्वाणचक्र, ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर अष्टदल पद्म, समष्टिकार्य (अंहकार), कारण (महत्तत्त्व वा अक्षर), तथा निष्कल। इसी प्रकार से स्वामी ओमानन्द जी ने अपने पातञ्जल योगप्रदीप में अष्टचक्रों का निम्न प्रकार से कहा है — कुण्डलनी, मूलाधारचक्र, स्वाधिष्ठानचक्र, मणिपूरकचक्र, अनाहतचक्र, विशुद्धचक्र, आज्ञाचक्र, और सहस्रारचक्र = ब्रह्मरन्ध। हठयोग तथा तन्त्रग्रन्थों में इस प्रकार के मतभेद उपलब्ध होते हैं। कई ग्रन्थों में कुण्डलिनी जागरण का व्याख्यान भी किया गया है। वर्तमान काल के, यथार्थ योगज्ञान से रहित, तथाकथित योगशिक्षक कुण्डलिनी जागरण पर ही बल देते दीखते हैं। परन्तु महर्षि पतञ्जलि कृत सूत्रों तथा व्यासभाष्य में इस प्रकार का कोई उल्लेख मात्र भी न होने से, षट्चक्र या अष्टचक्र वर्णन योगाभ्यास में उपयोगी नहीं जानना चाहिए। योगसूत्र ३.२९ में भी नाभिचक्र में संयम से केवलमात्र शरीर की व्यूह रचना का ज्ञान होना ही कहा गया है, न कि वृत्तिनिरोध। अतः वृत्तिनिरोध तथा समाधि की सिद्धि से इनका कोई सम्बन्ध नहीं जानना चाहिए। इनका ज्ञान शरीर के संतुलन में उपयोगी है।  
    शंका — अथर्ववेद १०.२.३१ में अष्टचक्र और नवद्वारों वाली नगरी इस शरीर रूपी अयोध्या का कथन है। ऐसे में आप इसका निषेध कैसे करते हो ?
    समाधान — अथर्ववेद का मन्त्र निम्न है —
    अ॒ष्टच॑क्रा॒ नव॑द्वारा दे॒वानां॒ पूर॑यो॒ध्या। तस्यां॑ हिर॒ण्ययः॒ कोशः॑ स्व॒र्गो ज्योति॒षावृ॑तः॥ १०.२.३१॥
    कुछ भाष्यकारों ने इस मन्त्र का शरीरपरक अर्थ करते हुए शरीर में आठचक्रों और नौ द्वारों को कहा है। परन्तु ऐसा वर्णन प्रकरण विरुद्ध है। इस मन्त्र का देवता = विषय है — “साक्षात् ब्रह्मप्रकाशिन्यौ”। अथर्ववेद के १०वें काण्ड के दूसरे सूक्त का विषय “ब्रह्मप्रकाशनम्” है, जबकि ३१वे और ३२वे मन्त्र का विषय “साक्षात् ब्रह्मप्रकाशिन्यौ” है। ऐसे में इस मन्त्र का शरीरपरक अर्थ करना मंत्र के विषय से विरुद्ध ही है। श्री क्षेमकरणदास त्रिवेदी जी इस मन्त्र का अर्थ निम्न प्रकार से करते हैं —
    (अष्टचक्रा) (योग के अंग अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) इन आठों का कर्म (वा चक्र) करने वाली, (नवद्वारा) (सात मस्तिष्क के छिद्र और मन और बुद्धि रूप) नव द्वार वाली (पूः) पूर्ति (पुरी देह) (देवानाम्) उन्मत्तों के लिये (अयोध्या) अजेय है। (तस्याम्) उस पूर्ति में (हिरण्ययः) अनेक बलों से युक्त (कोशः) कोश (= भण्डार अर्थात् चेतन जीवात्मा) (स्वर्गः) सुख (सुख स्वरूप परमात्मा की ओर चलने वाला) (ज्योतिषा) ज्योति (प्रकाश स्वरूप ब्रह्म) से (आवृतः) छाया हुआ है।
    यहाँ अष्टचक्रों से, हठयोग एवं तन्त्रग्रन्थों में प्रतिपादित, शरीर के अष्टचक्रों का सन्दर्भ ही नहीं है। उपर्युक्त अर्थ शरीरपरक अर्थ की अपेक्षा से अच्छा है। परन्तु यह अर्थ भी मन्त्र के देवता = विषय को प्रतिपादित नहीं करता। 
    शतपथ ब्राह्मण में “पूः” नाम आत्मा का है। (आत्मा वै पूः॥ शतपथ० ७.५.१.२१॥) अतः “पूः” से पुरी = देह को ग्रहण करने वाले मन्त्र के वास्तविक रहस्य से दूर रह गये हैं। अतः साक्षात् ब्रह्मप्रकाशन् विषयपरक इस मन्त्र का अर्थ निम्न प्रकार से होगा —
    (अष्टचक्रा) योग के आठ अंगों  से युक्त, (नवद्वारा) नौ प्रकार के द्वारों अर्थात् त्रिविध उपायों और त्रिविध संवेग (=परवैराग्य) रूपी मार्गों  का पालन करने वाला (पूः) आत्मा = चेतन पुरुष (देवानाम्) मन, प्राण, इन्द्रिय रूप देवों के द्वारा = से (अयोध्या) अजेय है, अर्थात् मन और इन्द्रियों से इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती। (तस्याम्) उसी आत्मा में (हिरण्ययः कोशः) सभी प्रकार के बलों का भण्डार (स्वर्गः) सुखस्वरूप परमात्मा (ज्योतिषा) अपनी ज्योति = ज्ञान द्वारा (आवृतः) छाया हुआ है। 
    इस अर्थ को इस प्रकार से समझना चाहिए। अष्टचक्रों से शरीर के आठ चक्रों को कहने वाले व्याख्या- कार, नवद्वारों से शरीरस्थ नौ द्वारों का ग्रहण निम्न प्रकार से करते हैं — दो आँख, दो कान, दो घ्राण, एक-एक मुख, उपस्थ और गुदा। परन्तु यह जानना चाहिए कि पुरुष के शरीर में चाहे ये ही दृश्यमान नौ द्वार हैं, परन्तु स्त्री शरीर में तो ३ तीन और भी दृश्यमान द्वार हैं — दो स्तन तथा एक योनि। अतः यहाँ शरीर के नव द्वारों का वर्णन नहीं है। जबकि दूसरी ओर कठोपनिषद् में यमाचार्य नचिकेता को ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हुए शरीर में एकादश द्वारों को कहते हैं — पुरमेकादशद्वारम्॥ कठो॰ ५.१॥ अर्थात् इस शरीर में एकादश द्वार = दो आँख, दो नाक, दो कान, एक मुख, एक गुदा, एक उपस्थ, एक नाभि तथा एक ब्रह्मरन्ध्र, ये ग्यारह छिद्र रूप द्वार हैं। अतः शरीर में नौ से अधिक छिद्र, वास्तव में होने से, यहाँ भाष्यकारों द्वारा शरीर में नवद्वारों का कथन ऋषियों की मान्यताओं से विरुद्ध है।
    द्वार का अर्थ यहाँ पर मार्ग है। यहाँ मन्त्र का विषय है — “साक्षात् ब्रह्मप्रकाशन्”।  योगसूत्र १.२१ की भूमिका में महर्षि व्यास ने नौ प्रकार के योगियों का कथन किया है, जो  मृदु-मध्य-अधिमात्र उपाय और मृदु- मध्य-तीव्र संवेग = परवैराग्य भेद से नौ प्रकार के होते हैं। योगी मृदुउपाय-मृदुसंवेग रूप प्रथम द्वार को अपनाकर, उपाय और संवेग के स्तर को बढ़ाता हुआ, क्रमशः दूसरे, तीसरे सभी द्वार भी पार करता हुआ, नवम् द्वार अर्थात् अधिमात्र उपाय-तीव्र संवेग रूप द्वार के द्वारा असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि और ब्रह्म-साक्षात्कार रूप लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त करता है।  (इस सूत्र की विस्तृत व्याख्या यथास्थान देखें।) 
    शंका — अथर्ववेद १०.८.४३ में “पुण्डरीकं नवद्वारम्” कहा है, वहाँ भी शरीरस्थ नवद्वारों को ही भाष्यकारों ने कहा है। अतः इस मंत्र में भी शरीरस्थ नवद्वार ही अधिक उचित प्रतीत होते हैं ?
    समाधान — देखो, अथर्ववेद १०.८.४३ में भी नवद्वारों को कहा है —
    पु॒ण्डरी॑कं॒ नव॑द्वारं त्रि॒भिर्गु॒णेभि॒रावृ॑तम्। तस्मि॒न् यद् य॒क्षमा॑त्म॒न्वत् तद् वै ब्र॑ह्म॒विदो॑ विदुः॥
    इसका अर्थ करते हुए प० शिवशंकरशर्मा जी लिखते हैं — (पुण्डरीकम्) हृदयकमल जो (नवद्वारम्) नौ द्वारों से युक्त है, और (त्रिभिः गुणेभिः) जो तीन गुणों से (आवृतम्) आवृत है (यस्मिन्) जिस पुण्डरीक में (यद् यक्षम्) जो परम पूजनीय ब्रह्म है, वह (आत्मन्वत्) आत्मा के साथ निवास करता है (तद्वै) निश्चय उसी को (ब्रह्मविदः) ब्रह्मवेत्ता (विदुः) जानते हैं।
    यहाँ पुण्डरीक = हृदय के जो नवद्वार कहे गये हैं, वे स्थूलशरीर में स्थित हृदय के द्वार अभिप्रेत नहीं हैं। क्योंकि ऋषियों ने स्थूल शरीर में स्थित हृदय से निकलने वाली १०१ एक सौ एक नाडि़यों को कहा है , जिससे हृदय के १०१ द्वार तो कहे जा सकते हैं, नौ नहीं। अतः हृदयस्थ नौ द्वारों की संगति भी उपर्युक्त प्रकार से सम्भव है, क्योंकि चित्त का स्थान भी हृदय कहा गया है — हृदये चित्तसंवित्॥ योग० ३.३४॥
    यहाँ जो बहुसंख्यक भाष्यकारों ने शरीर के नवद्वारों को ही कहा है वह सर्वथा प्रकरणविरुद्ध ही है। इस प्रकार का अर्थ वेदार्थविज्ञान की अनभिज्ञता के कारण ही है।   इस मंत्र का देवता = विषय अध्यात्म है, तथा छन्द अनुष्टुप् (= ३२ अक्षरों का) है। यह अनुष्टुप् छन्द भी चतुष्पाद = अर्थात् ८-८ अक्षरों वाले चार पादों वाला है। इसका पहला पाद “पुण्डरीकं नवद्वारम्” है।  महर्षि जैमिनि मीमांसादर्शन में कहते हैं कि — तेषामृक् यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था॥ मीमांसा॰ २.१.३५॥ अर्थात् वेदमंत्रों की पादव्यवस्था अर्थ के वश से है। इसका अर्थ यह है कि मंत्र में किसी भी पाद के “पद” अर्थ की दृष्टि से सम्बद्ध होते हैं।  अतः इस पाद का अभिप्राय है कि “पुण्डरीक नवद्वारों वाला है।” यहाँ “पुण्डरीक” का शरीर अर्थ करने वाले विद्वान् भाष्यकार इस पक्ष में कोई प्रमाण तो देवें। वस्तुतः वे वेदार्थविज्ञान से अनभिज्ञ हैं। 
    पुण्डरीक का अर्थ कोशकारों ने सफेद कमल कहा है। अध्यात्मपक्ष में पुण्डरीक का अर्थ “हृदय” शास्त्रों में कहा गया है। योग के भाष्यकार महर्षि व्यास भी योगसूत्र ३.३४ की व्याख्या करते हुए कहते हैं — “यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म तत्र विज्ञानं तस्मिन्संयमाच्चित्तसंवित्॥” यहाँ स्पष्ट रूप से पुण्डरीक से हृदय का ही ग्रहण होता है, स्थूल शरीर का कदापि नहीं। इसी सूत्र पर भोजवृत्ति में पुण्डरीक से हृदय का ही ग्रहण किया गया है।  योगसूत्र १.३६ की व्याख्या में भी महर्षि व्यास ने — “हृदयपुण्डरीके धारयतो ... ” कहा  है, यहाँ भी पुण्डरीक से हृदय का ही ग्रहण होता है।  इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद् ८.१.१ में पुण्डरीक शब्द हृदय के लिये ही प्रयुक्त हुआ है।  अतः यहाँ भी शरीरस्थ नवद्वारों का वर्णन नहीं है।
    अतः इस मंत्र का अभिप्राय है कि हृदय में त्रिगुणात्मक चित्त से अन्वेष्टित आत्मा के साथ ही परब्रह्म स्थित है, जिसे ब्रह्मवेत्ता विद्वान् उपर्युक्त नवद्वारों का अनुसरण करते हुए जानते हैं। 
    उपर्युक्त व्याख्यान से स्पष्ट है कि इन मंत्रों में न तो स्थूल शरीर के नवद्वारों को कहा है, और न ही तथाकथित अष्टचक्रों को। अतः हठयोगप्रदीपिका आदि ग्रन्थों में कथित चक्रों का पातञ्जल योग से  कोई सम्बन्ध नहीं है।
 

            Query : There is said to be a provision of performing Sanyama over the eight chakras, and it is also said that by awakening of Kundalini, one is able to achieve trance in no time. Some of the commentators have described eight Chakras. What is the position of such Sanyama in this philosophy?

            Answer : Seer Patanjali had given an aphorism “nabhichakre kaayavyuha-GYaanam” 3.29 which refers to 'Navel Plaxus Chakra'. There is no other reference of any Chakra in yoga aphorisms. Seer Vyaasa had also referred “nabhichakre” = Navel Plexus in his commentary. Apart from this, there is no reference of any other Chakra in Yoga aphorisms and Vyaasa commentary. On the other hand there is reference of Chakras in Hathayoga. The main eight chakras are termed as Root Chakra, Sacral Chakra, Navel Plexus, Solar plexus Chakra, Heart Chakra, Throat Chakra, Third Eye Chakra and Crown Chakra; in addition to this some also refer Jivhamool, Bhruchakra, Nirvaana Chakra. Swami Hariharanand had referred six Chakras, and Swami Omanand had referred eight Chakras. Some of the books on Hathayoga explain the process of awakening of Kundalini. In the modern age many of the teachers of Yoga give importance to Kundalini awakening. But there is no reference of eight Chakra and Kundalini in Yoga aphorisms and Vyaasa commentary. Even the reference of Nabhi-chakra = Navel Plexus is for the knowledge of body only, not for restraint of modifications. Hence these Chakras have no relation with the restraint of modifications of mind.

            Query : There is an advice of physical body which have eight Chakra and nine entry / exist paths in Atharvaveda 10.2.31. How can you deny this ?

            Answer : The Hymn of Atharvaveda is as follows:—

            aShTachakraa navadvaaraa devaanaam puurayodhyaa.

            tasyaam hiraNyayaH koshaH svargo jyotiShaavritaH. 10.2.31.

            Many commentators have given the meaning of 8 Chakras and 9 doors in the physical body. But such meaning is against the reference. The subject of the hymn is “saakShaat brahmaprakaashinyau” which means “direct cognizance of GOD”. The subject of whole Sukta 2 is “brahmaprakaashinam” = "cognizance of GOD" and hymn 31 and 32 have the subject as “saakShaat brahmaprakaashinyau” i.e. “direct cognizance of GOD”. In this light of this subject, giving the meaning of hymn with reference to physical body is totally wrong. Here the Chakras and doors of physical body are not referred. Any such explanation will not in the context of subject of this hymn which is “Direct cognizance of GOD”.

            In shatapatha braahamaNa, “puuH” the term of hymn is meant for Soul (Ref – aatmaa vai puuH (shatapatha 7.5.1.21)). So the explainators who had given the meaning of physical body for “puuh” were not able to reach up to the real meaning of hymn. The meaning of this hymn in the context of subject “Direct cognizance of GOD” will be as follows:—

            (puuH) The Soul who (aShTachakraa) adopts eight accessories of Yoga, and (navadvaara) nine paths of yoga (Ref the paths explained by seer Vyaasa in the commentary on aphorism 1.21), (ayodhyaa) is beyond victory (devaanaam) by the internal organs i.e. mind and senses; i.e. he cannot be achieved through mind and senses. (svargaH) That blissful GOD (hiraNyayaH koshaH) who is source of all type of powers (aavritaH) pervades (tasyaam) the Soul (jyotiShaa) through his light = knowledge.

            Some of the interpreters accept nine paths of the body from navadvara, these are two eyes, two ears, two nostrils, one mouth, one penis and one anus, and give the meaning of the hymn in terms of body. Though these are the visible nine holes / paths in the body, yet there are three other in the female body, i.e. vagina (womb) and two breast. On the other hand, there are 11 paths / holes in the human body as per — “puramekaadashaadvaaram” (Katha-UpaniShada 5.1) which are two eyes, two ears, two nostrils, one mouth, penis, anus, navel plexus, crown. Since as per physical body and scriptural testimony, there are more than nine paths / holes in the body, so the physical interpretation is not correct in terms of subject of the hymn.

            From the above it is clear that the hymn does not describe 8 Chakras and 9 physical paths / holes of the physical body. However there is description of 8 Chakras in the Hathayoga, but there is no such reference in the Patanjali aphorisms and Vyaasa commentary.

पाञ्जल योगदर्शन पर एक दृष्टि

            मानवजीवन के चरम लक्ष्य ‘मोक्ष’ की प्राप्ति योग के द्वारा ‘साक्षात्कार’ किये बिना सम्भव नहीं है। पूर्णतया वेद व वैदिक साहित्यानुकूल महर्षि पतञ्जलि द्वारा उपदिष्ट योगसूत्र तथा उस पर महर्षि व्यास विरचित ‘व्यासभाष्य’ समवेत रूप में योग के सम्पूर्ण सिद्धान्त एवं साधना पद्धति प्रस्तुत करते हैं।

            योग के जिज्ञासु एवं साधक, विशेषतः योगदर्शन के प्रत्येक हिन्दीभाषी अध्येता, जो संस्कृत में अधिकार नहीं रखते, के हृदय में एक अभिलाषा रहती है कि हिन्दी भाषा में एक ऐसा ग्रन्थ उपलब्ध हो, जिस में ‘व्यासभाष्य’ सहित योगसूत्र का अक्षरशः अनुवाद समाहित हो, जिससे कि ऋषियों के योग विषयक मन्तव्य को यथार्थ रूप से समझकर योगविद्या को शुद्ध व सम्पूर्ण रूप में हृदयङ्गम एवं आत्मसात् करने में विशेष सहायता मिल सके। प्रस्तुत कृति ‘पाजञ्जल योगदर्शन’ उस अभिलाषा को पूर्ण करने में सक्षम है।

            प्रस्तुत ग्रन्थ के ग्रन्थकार का मानना है कि ‘महर्षि दयानन्द ने व्यासभाष्य को पूर्णतया प्रमाणिक माना है और इसमें किसी प्रकार के प्रक्षेप का कोई उल्लेख नहीं किया, अतः इसमें किसी प्रकार का कोई प्रक्षेप नहीं है।’ इसी मान्यता के आधार पर यह कृति योगसूत्र सहित उस पर महर्षि व्यास विरचित ‘व्यासभाष्य’ को हिन्दी भाषा में न केवल अक्षरशः खोल देती है, अपितु आर्यभाषा / हिन्दीभाषा में ‘वैदिक योग मीमांसा’ नामक व्याख्या प्रस्तुत कर व्यासभाष्य को सर्वांश में वेद तथा वेदानुकूल ग्रन्थों के प्रमाणों तथा पातञ्जल योगसूत्र व व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी के अनुकूल सिद्ध करने का अद्भुत व महान् प्रयास भी करती है। ग्रन्थकार स्वयं लिखते हैं — ‘मैंने यह यथासम्भव प्रयास किया है कि इस भाष्य में कहीं भी, कोई भी ऐसा सिद्धान्त प्रतिपादित न हो, जो वेद तथा ब्रह्मा से लेकर दयानन्द पर्यन्त ऋषियों के सिद्धान्तों के प्रतिकूल हो।’

            योगदर्शन पर विविध भाषाओं व परम्पराओं में प्रकाशित व अद्यावधि अप्रकाशित सैकड़ों भाष्यों, उपभाष्यों, टीकाओं, वृत्तियों व व्याख्याओं को देखने का ही नहीं, अपितु उन पर अध्ययन व अनुसन्धान करने का परम सौभाष्य मुझे प्राप्त हुआ;  परन्तु अभी तक मेरे सामने योगदर्शन पर इस ग्रन्थ के समान कोई दूसरा ऐसा ग्रन्थ नहीं आया है, जिसमें महर्षि पतञ्जलि के कुल १०२ सूत्रों पर महर्षि दयानन्द की व्याख्या उनके द्वारा विरचित कुल ४७ ग्रन्थों में से अधिकांश ग्रन्थों से ससन्दर्भ इकट्ठी की गई हों;  १४४ सूत्रों की व्याख्या में पातञ्जल योगसूत्र तथा व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी दी गई हों;  १०७ सूत्रों पर वेद तथा वेदानुकूल ग्रन्थों से लगभग ५०० प्रमाण उद्धृत किये गये हों।

            इस ग्रन्थ में अध्ययन के क्रम में आर्ष ग्रन्थों से प्रमाणों की बौछार देखकर रोम-रोम पुलकित हुआ। प्रस्तुत ग्रन्थान्तर्गत महर्षि पतञ्जलि के १९५ सूत्रों में से १३५ सूत्रों पर वेदादि सत्यशास्त्रों के अथवा ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों से प्रमाणों को उद्धृत किया गया है। शेष सूत्रों में भी मात्र १६ सूत्र ही ऐसे हैं, जिनकी व्याख्या में योगसूत्रों अथवा व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी नहीं है। विभिन्न विभूतियों / सिद्धियों / लब्धियों का वेद तथा वेदानुकूल ग्रन्थों के सिद्धान्तों के आधार पर स्पष्टीकरण तथा विभूतियों की प्रमाणिकता का प्रतिपादन;  कुछ व्याख्याकारों द्वारा पातञ्जल योगसूत्र तथा व्यासभाष्य की व्याख्या में प्रतिपादित हुई वेद, महर्षि पतञ्जलि व महर्षि व्यास के प्रतिकूल मान्यताओं एवं सिद्धान्तों का खण्डन;  आर्यजगत् के विभिन्न विद्वानों द्वारा व्यासभाष्य में कथित प्रक्षेपों के आरोप का निराकरण पूर्वक तथाकथित प्रक्षिप्त स्थलों के वास्तविक अभिप्राय का स्पष्टीकरण करने का सार्थक प्रयास अत्यन्त स्तुत्य है। भोजवृत्ति के पदार्थ का ग्रन्थ के अन्दर समावेश होने से महर्षि पतञ्जलि व महर्षि व्यास को समझने में निश्चित रूप से हर कोई पाठक अधिक सरलता का अनुभव कर सकेगा।

            सत्य न जानने वालों की अपेक्षा सत्य को स्वीकार न करने वाला समाज के लिये अधिक घातक होता है। इसलिए महापुरुष महर्षि दयानन्द सरस्वती कहते हैं — ‘सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।’ इसलिए ‘योगसूत्र व व्यासभाष्य में प्रक्षेप है या नहीं?’ इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ‘हम तर्क, तथ्य व प्रमाण के अनुकूल सार्वभौमिक, सार्वकालिक व सार्वर्जनिक सत्य को स्वीकारने के लिये ‘सर्वदा’ तैयार हैं या नहीं हैं?’ अतः हमें, हम अभी तक क्या मानते थे? या अभी क्या मान रहे हैं? इसकी परवाह किए बिना सदा सत्यपथ पर, ऋषिपथ पर ही चलना होगा। आज तक जिसे मानते आये हैं, आज वह ‘असत्य’ सिद्ध होने पर उसे छोड़ने के लिए तथा आज जिसे सत्य मान बैठे हैं, वह कल ‘असत्य’ सिद्ध होने पर उसे छोड़ने के लिए तैयार रहना होगा। दुराग्रह न आज के लिए उचित है, न ही कल के लिए होगा।

            आदरणीय श्री सतीश आर्य जी ने इस ग्रन्थ की रचना करके न केवल महर्षि पतञ्जलि व महर्षि व्यास के अभिप्राय को समझने में हिन्दी के पाठकों के लिए मार्ग सुगम कर दिया है, अपितु योगशास्त्र के प्रतिपादन को सम्यक् रूप से समझाने के लिए सार्वभौमिक, सार्वकालिक व सार्वजनिक सत्य से ओतप्रोत अपौरुषेय वेद व तर्क, तथ्य व प्रमाण सङ्गत वैदिक साहित्य के अनेक सन्दर्भों को उपस्थित कर पाठकों को वेद व अनेक ऋषि व ऋषिकृत साहित्य से जुड़ने का, उनके पवित्र वाक्यों को देखने का, उच्चारण करने व समझने का महान् सौभाग्य भी प्रदान किया है। ‘वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।’ ऋषि के इस परम वाक्य के मर्म को समझकर श्रद्धेय आर्य जी ने ‘परम धर्म’ को निभाया है। आपका मैं नमन-वन्दन एवं सादर अभिनन्दन करता हूँ।

ऋषीणामनुचरः

आचार्य (डा॰) महेशानन्द विद्यालङ्कार

संस्थापकाध्यक्ष - ऋषिपथ इण्टरनेशनल फाउण्डेशन।

विभागाध्यक्ष - पतञ्जलि योग-साहित्यानुसन्धान विभाग,

पतञ्जलि योगपीठ, हरिद्वार।

            जन्मजन्मान्तर के योगविद्या विषयक शुभ संस्कारों, गहन स्वाध्याय, अथक परिश्रम, सकारात्मक दृष्टिकोण व सत्य प्रस्तुति की उत्कट अभिलाषा के फलस्वरूप सम्माननीय श्री सतीश आर्य जी द्वारा अन्तःसाक्षी व वैदिक प्रमाणों से परिपूर्ण पातञ्जल योगदर्शन पर किया गया भाष्य ‘वैदिक योग मीमांसा’ अपने आप में अनुपम है। मेरी दृष्टि में वर्तमान में योगदर्शन पर उपलब्ध सभी भाष्यों में इसका विशेष स्थान है। हालाँकि मैंने सम्पूर्ण भाष्य को पंक्तिशः नहीं पढ़ा, पुनरपि भाष्यकर्त्ता की सूक्ष्म प्रज्ञा, ऊहा एवं वेद व ऋषि निष्ठा को विभिन्न प्रसंगों में देखकर हार्दिक सन्तोष व प्रसन्नता का अनुभव किया है।

            योग, वास्तव में मात्र पठन-पाठन का विषय न होकर, अभ्यास का विषय है। क्रियात्मक अभ्यास पूर्वक इस भाष्य द्वारा योग शास्त्र का गहन अनुशीलन निश्चित रूप से अभ्यासी को अनुभवात्मक रूप से भी विकसित करने वाला होगा। यह भाष्य योग विषयक अनेक भ्रान्तियों को दूर करता हुआ योग जिज्ञासु के हृदय में ‘सम्प्रज्ञात योग’ के महत्त्व को भलीभांति प्रकाशित करने वाला होने से भी विशिष्ट है। इस भाष्य में विभूति पाद में की गयी सूत्र व्याख्यायें अध्येता को निश्चित रूप से सकारात्मक एवं नवीन दृष्टिकोण देने में समर्थ हैं।

            अपने गृहस्थ आश्रमीय कर्तव्यों को निष्ठापूर्वक पूर्ण करते हुए तथा बैंक में अपनी सेवायें देते हुए भी आपने जिस उत्तमत्ता के साथ यह भाष्य प्रस्तुत किया है वह सभी के लिये प्रेरणास्पद, प्रशंसनीय व अनुकरणीय है। आपने स्वयं इस भाष्य का आंग्ल भाषा में अनुवाद करके इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उपयोगी बना दिया है। प्रभु कृपा से समयानुसार इस भाष्य का महत्त्व समाज में और भी स्थापित होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

शुभकामनाओं के साथ

आशीष आर्य

आचार्य, वैदिक साधन आश्रम,

तपोवन, नालापानी, देहरादून।

योगभाष्य - गागर में सागर

            मैंने पूर्ण मनोयोगपूर्वक अक्षरशः आद्योपान्त भाई श्री सतीश आर्य जी द्वारा कृत “पातञ्जल योगदर्शन” के समूचे समाधिपाद आदि चारों पादों में प्रदत्त व्यासभाष्य एवं भोजवृत्ति तथा महर्षि दयानन्द जी के सूत्रार्थों सहित व वैदिक योगमीमांसा नान्मी भाष्य-आशय वाली विस्तृत व्याख्या को पढ़ा है। वस्तुतः योगदर्शन पर किये गये अनेक विद्वानों के भाष्यों को मैंने इससे पूर्व अनेकधा पढ़ा और पढ़ाया भी है। पश्चात् वर्तमान में जिज्ञासु, बहुश्रुत, विचारक, मनस्वी श्री आर्य प्रवर की भी योगसूत्रों की व्याख्या देखी। मैंने यह भाष्य अपने आप में अद्भुत, बुद्धिगम्य, निराला एवं अत्यन्त सुगम शैली वाला पाया। प्रस्तुत भाष्य में योगदर्शन के पाद १/१७,१९,३७ व ३९ तथा पाद २/१३,१४,१७ और ऐसे ही अनेक परिश्रम साध्य सूत्रों के महत्त्वपूर्ण स्थलविशेषों को खोलकर सरलविधि से समझाने का स्तुत्य एवं अनुकरणीय प्रयास किया गया है। भाष्य की व्याख्या शैली की विशिष्टता, बुद्धिगम्यता, अतुलनीयता एवं हृदयग्राह्यता भाष्य को पढ़ते ही विदित होने लगती है। भाष्य को वेद और वैदिक ग्रन्थों के सिद्धान्तों के अनुरूप करके ‘सोने में सुहागा’ तथा ‘गागर में सागर’ भर देने वाली बात चरितार्थ कर दी है। मैं तो यह समझ पाया हूँ कि केवल पढ़ने-पढ़ाने वालों ही के लिये नहीं, अपितु प्रत्येक गवेषक, उपदेशक और स्वाध्यायशील जन के लिये भी यह भाष्य अत्यन्त ग्राह्य व पठनीय है। भाष्य का अधिकाधिक प्रचार- प्रसार हो जिससे योगविषयक यथार्थ सिद्धान्त समूचे भूगोल में फैले और एतद्विषयक भ्रान्तियों का शीघ्र निवारण होके मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सके।

आचार्य अर्जुनदेव वर्णी

महर्षि दयानन्द वैदिक योगाश्रम,

सूर्य निकेतन, दिल्ली

मानव ज्ञान-विज्ञान के रूप में योगशास्त्र की मौलिक, नवीन और संतुलित व्याख्या

            आर्य जगत् के मूर्धन्य विद्वान, लेखक एवं योगाचार्य श्री सतीश आर्य कृत पातञ्जल योगदर्शन की व्यासभाष्य एवं भोजवृत्ति सहित व्याख्या, अब तक की सर्वोत्तम एवं सन्तुलित विवेचनात्मक व्याख्या द्रष्टव्य होती है। सतीश आर्य ने मर्हिर्ष दयानन्द के विचारों और कार्यों को गम्भीरता और निष्ठा के साथ समझा है। योगदर्शन में आप ने महर्षि के मार्ग का अनुसरण किया है। व्यवहार में योगदर्शन जितना सरल प्रतीत होता है, उतना उसका सूत्र भाग कठिन है। सतीश जी ने प्रत्येक सूत्र को जितनी गहराई, गवेषणापरक और विज्ञान की दृष्टि से देखा है,  वह उनके स्वाध्याय, चिन्तन और शोध प्रवृति का परिचायक है। लेखक, शोधकर्ता और विवेचनकर्ता की अपनी अलग दृष्टि होती है। सत्य, शुभ, सुन्दर और शिव का निर्माण उसके पीछे का मूल उद्देश्य होता है। भाष्यकार आर्य ने भाष्य के मूल उद्देश्य को अपनी सम्पूर्ण पुस्तक में अत्यन्त जीवन्तता के साथ निभाया है। प्रथम संस्करण का भी मैंने अवलोकन किया था और कुछ त्रुटियों (टंकण सम्बन्धित) की ओर इशारा था, जिसे प्रकाशित द्वितीय संस्करण में दूर कर दिया गया है।

            लेखक सतीश आर्य द्वारा लिखित योगदर्शन भाष्य के प्रथम संस्करण के पूर्व हिन्दी में निम्न पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं - जो कि ‘कर्म और कर्मफल मीमांसा’, ‘वैदिक धर्म ग्रन्थ परिचय’, ‘परमात्म-साक्षात्कार - कैसा?’ हैं, जो धर्म, अध्यात्म और दर्शन में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी साबित हुई हैं। लेखक के इस कार्य को हम ‘बड़ा’ कह सकते हैं, लेकिन इससे बड़ा कार्य महर्षि दयानन्द कृत वेदभाष्य और अन्य पुस्तकों, तथा अन्य वेदानुकूल सत्यशास्त्रों को वेबसाइट बनाकर लोड करना, और उन्हें जनसामान्य के लिये निःशुल्क उपलब्ध कराना, उससे बड़ा और अत्यन्त महत्व का कार्य है। इसी श्रृखंला में प्रस्तुत योगदर्शन का अंग्रेजी अनुवाद कर प्रकाशित कराना भी है, जिससे विश्व जनमानस के लिये अंग्रेजी भाषा में योग के सिद्धान्तों को समझना सरल हो गया है। लेकिन एक और भी अत्यन्त महत्व का कार्य सतीश जी द्वारा, महर्षि दयानन्द के यजुर्वेद भाष्य का हूबहू अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करना, प्रगति पर है, जो विश्व स्तर का एक महनीय कार्य कहा जाना चाहिए। आर्य समाज के इतिहास में सम्भवतः प्रथम अवसर होगा जब किसी आर्य विद्वान् ने बिना अपनी ओर से कुछ जोड़े-घटाए, वेदभाष्य का अंग्रेजी में अनुवाद यास्क प्रणाली में करने का बीड़ा उठाया है।

            आर्य जगत् के अनेक विद्वानों के पातञ्जल योग भाष्यों और पौराणिक जगत् के पातञ्जल योग भाष्यों के अन्तर को भी विद्वान भाष्यकार ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखने का सार्थक प्रयास किया है। पातञ्जल योग भाष्य के सम्बन्ध में भाष्यकार के विचार क्या हैं, इसे व्यक्त करते हुए कहा हैं - ‘‘महर्षि पतञ्जलि के योगसूत्रों पर व्यासभाष्य को स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि व्यासभाष्य समग्र वैदिक साहित्य का ही एक अंग है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो अन्य ऋषियों द्वारा प्रतिपादित वेदानुकूल सिद्धान्तों से विरुद्ध हो।’’

            पुस्तक के द्वितीय संस्करण की भूमिका इतनी बृहद, विवेचनात्मक, गवेषणात्मक और संग्रहणीय है कि इसे शोध पत्र कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। लेखक की सरलता ही कही जाएगी कि उन्होंने सहयोगी ग्रंथों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने में कोई कृपणता नहीं दिखाई। भूमिका में ही योगदर्शन की मान्यता के विषय में लेखक स्वीकार करते हुए कहते हैं - ‘‘हमारा मानना है कि योगदर्शन पर उपलब्ध व्यासभाष्य पूरी तरह प्रामाणिक है। परन्तु विभिन्न विद्वानों ने उस भाष्य के कुछ स्थलों का वास्तविक अभिप्राय न समझ कर उसे प्रक्षेप, परीक्षा कोटि, असम्भव कोटि या विकल्प कोटि आदि में रखा है।’’ योगदर्शन जैसे मानव शास्त्र के विषय में लेखक की यह स्वीकरोक्ति निश्चित ही उनकी दर्शन के प्रति निष्ठा को व्यक्त करता है।

            सम्पूर्ण वैदिक वांगमय में दो प्रकार के ग्रंथ हैं - प्रथम स्वतः प्रमाण जिसमें चारों वेद आते हैं और द्वितीय प्रकार के वे ग्रंथ हैं जो परतः प्रमाण हैं यानि इनकी प्रमाणिकता के लिये वेदों को आधार माना गया है। लेखक ने सम्पूर्ण योगदर्शन को वेदों के ज्ञान से तौला है। इसके आधार पर उन्होंने योगदर्शन को वेदानुकूल प्रमाणित किया है। इसी तरह व्यासभाष्य की बात पर भी लेखक और भाष्यकार ने अपने स्वाध्याय के द्वारा गहनता से विवेचना की है। प्रक्षेप के सम्बन्ध में वैदिक विद्वानों के तर्क और मन्तव्य को अपनी चिंतन प्रक्रिया से तौलने के साथ ही साथ, प्रमाणों के माध्यम से भी दर्शाने का प्रयास किया है।

            भाष्यकार ने वेद और महर्षि दयानन्द को अपने भाष्य का आधार बनाकर यह बताने का प्रयास किया है कि वह कोई नई परिपाटी योगदर्शन में नहीं डाल रहे हैं। पुराणों और इतिहास के सम्बन्ध में महर्षि दयानन्द जो कहते हैं, भाष्यकार सतीश आर्य उसे शत प्रतिशत अपनी सहमति देते हैं। प्रश्न उठता है कि क्या महर्षि के प्रति सतीश जी की अंधभक्ति है, या विवेचनात्मक और चिन्तयात्मक धारा में बहने का उनका संकल्प? सम्पूर्ण भाष्य पढ़ने के बाद समीक्षात्मक और गवेषणात्मक चिन्तन के द्वारा मैं यह कह सकता हूँ कि वह अपने भाष्य में जो कहते हैं, वह वेदाधारित और व्यास मार्ग का अनुसरण है। ज्ञातव्य है वेद में कहीं भी अंधभक्ति और अंधविश्वास को बढ़ाने का कोई संकेत नहीं है। इसी प्रकार पतञ्जलि ने जो योगसूत्र लिखे हैं, उनका मूल वेद हैं। भाष्यकार सतीश इसी तत्वधर्मिता के अनुपालक हैं। इस संदर्भ में अपनी भूमिका में सतीश आर्य कहते हैं - ‘‘हमने अपने इस विशद् एवं महत्वपूर्ण कार्य में, वेद तथा वेदानुकूल सत्य शास्त्रों में प्रतिपादित सिद्धान्तों तथा महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रतिपादित योगविषयक सिद्धान्तों को मुख्य आधार बनाकर ही व्यासभाष्य के रहस्यों को खोलने का प्रयास किया है।’’ भाष्यकार का यह मन्तव्य उस आर्ष परम्परा को अनुमोदित करता है जो वेदाधारित और सर्वकल्याणपरक है।

            शास्त्र की भूमिका में आर्य विद्वानों द्वारा व्यासभाष्य में निकाले गये प्रक्षेपों को भी बताकर सतीश आर्य ने निष्पक्षता का परिचय दिया है। स्वामी विज्ञानाश्रम, स्वामी सत्यपति जी व राजवीर शास्त्री जी द्वारा निकाले गये प्रक्षेपों को किस रूप में माना गया है उसे उसी रूप में बता दिया है। योगदर्शन में अनेक कारणों से अनेक विद्वानों ने प्रक्षेप माना है। लेकिन भाष्यकार सतीश ने योगदर्शन में किसी भी प्रकार से प्रक्षेप नहीं माना। इसके पीछे उन्होंने जो कारण बताया है उसमें पुराण या इतिहास और वेद के मनमाने अर्थ जैसे संदर्भ तर्कसंगत लगते हैं। महर्षि दयानन्द के पगचिन्हों पर चलते हुए सतीश आर्य ने अत्यन्त विस्तृत ढंग से चीजों को रखा है। साथ ही वह कहीं मनमानी करने का दुष्साहस करते हुए द्रष्टव्य नहीं होते। महर्षि दयानन्द एक उच्चकोटि के साधक और सत्यवादी महान् आत्मा थे। निश्चित ही उन्होंने वेद, योग, दर्शन और अन्य विषयों पर जो लिखा है वह हर दृष्टि से तर्कसंगत, अनुकूल और कल्याणकारी है। योगदर्शन के अधिकारी विद्वान् सतीश ने यदि महर्षि के प्रति अनन्त भक्ति-श्रद्धा दिखाई है तो वह किसी भी प्रकार से गलत नहीं कहा जा सकता।

            भूमिका में ज्ञान को लोक सापेक्ष और लोक निरपेक्ष, दो भागों में विभाजित कर उनकी परिभाषा जिस प्रकार से की है, वह भी भाष्यकार की विद्वता और स्वाध्याय को इंगित करता है। और जो परिभाषा की है, वह तर्कसंगत और विज्ञानसंगत है। इसमें संवत्सर की काल गणना, शरीर रचना विज्ञान, मनुष्यों की आयु जैसे वर्णित विषयों को अत्यन्त तर्कसंगत, दर्शनपरक और विज्ञानपरक ढंग से विवेचित किया है। सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी और लाभकारी हो, इसे ध्यान रखकर विषयों को विवेचित और व्याख्यायित किया है।

            विभूति के विषय में जहाँ जानकारी दी है, वहीं पर विभूतियों की सूत्रवत जानकारी दी गई है। पाठकों की दृष्टि से यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधियों पर सूत्रवत और योगदर्शन परक वर्णन कई दृष्टियों से उपयोगी और महत्वपूर्ण है।

            सामान्यतः अष्टचक्र और कुण्डलनी जागरण जैसे जनश्रुत विषय को भी भाष्यकार ने अत्यन्त गम्भीरता और तर्कसंगत ढंग से विवेचित किया है। इसी के परिपेक्ष्य में अथर्ववेद का प्रसिद्ध मंत्र ‘अष्टचक्र नवद्वारा ...’ का भी उल्लेख करके यह बताने का प्रयास किया गया है कि सामान्य रूप से इस मंत्र के परम्परागत जो अर्थ या व्याख्यायें की जाती रहीं है, वे विषय और प्रकरण से मेल नहीं खाती। सतीश जी की इस विषय पर की गई व्याख्या व विवेचना तर्कसंगत लगती है, वहीं पर व्याकरण सम्मत भी लगती है। विषय और प्रकरण को किस प्रकार से देखना चाहिए और उस पर अपनी मान्यता से ऊपर उठकर निष्पक्ष दृष्टि अपनानी चाहिए। इस संदर्भ में पुस्तक लेखक ने हठयोगप्रदीपिका का उल्लेख करके यह बताने का प्रयास किया है कि वेद से इतर यदि कोई ग्रंथ काल्पनिक रूप से नए विषय को स्थापित करने का प्रयास करता है तो उसका कोई महत्व और मूल्य नहीं होना चाहिए। नीर क्षीर विवेक की भाष्यकार की दृष्टि, जटिल विषय को सरल करने का सामर्थ्य रखती है, ऐसा मुझे लगता है।

            इस भाष्य की विभिन्न विशेषताओं में से सबसे अधिक तथ्यपरक मुझे जो लगता है, वह यह है - वैदिक योग मीमांसा में वेद और वेदानुकूल ग्रंथों में प्रतिपादित सत्य सिद्धान्तों के अनुकूल तथा प्रमाणिक व्याख्या। सम्पूर्ण भाष्य के स्वाध्याय के उपरान्त यह कहा जा सकता है कि भाष्य में कोई ऐसा तथ्य, तर्क, प्रमाण, उदाहरण, व्याख्या, विवेचना और अर्थ द्रष्टव्य नहीं होते जो योगदर्शन और वेदानुकूल न हों।

            समाधिपाद पातञ्जल योगदर्शन का प्रथम पाद है इसमें योग का स्वरूप, जीवात्मा का स्वरूप, समाधियों का वर्णन, ईश्वर सिद्धि और प्रज्ञाओं का वर्णन किया गया है। पुस्तक में विवेचनात्मक और व्याख्यात्मक शैली में सूत्रों का वर्णन किया गया है। योगदर्शन का प्रारम्भ ही योग के अनुशासन से होता है। भाष्यकार ने प्रथम सूत्र से ही भोजवृत्ति, वैदिक योगमीमांसा और शंका-समाधान की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की है। इस के साथ महर्षि दयानन्द का उक्त योगसूत्र का अर्थ क्या है, उसे भी स्थान दिया है। प्रत्येक सूत्र को वैदिक योग मीमांसा से सजाकर जिस ज्ञानपरक विवेचना के साथ प्रस्तुत किया गया है, वह भाष्यकार के योगदर्शन जैसे अत्यन्त गूढ़ विषय पर अधिकार होने का प्रमाण तो है ही, वैदिक वाङ्गमय पर भी अधिकार होने का प्रमाण है। भाष्यकार ने सम्पूर्ण ग्रन्थ में अपनी सूक्ष्म दृष्टि के साथ अपने अनुभव, ज्ञान, शोध, स्वाध्याय और विज्ञान का प्रयोग भी प्रत्येक सूत्र के साथ किया है। उदाहरण के लिए समाधिपाद के सूत्र संख्या ९ को देखें। भाष्यकार ने वैदिक योग मीमांसा के अन्तर्गत उस सूत्र में प्रतिपादित भाव (विकल्प वृत्ति) से सम्बन्धित अन्य सभी विषयों को विवेचनात्मक और व्याख्यात्मक शैली में समझाया है। सूत्र से सम्बन्धित वेद के ऐसे कितने मंत्र हो सकते हैं, उनके अर्थ को समझाते हुए लिखा है। इसे हम योगदर्शन का ‘थिसारस’ ग्रंथ भी कह सकते हैं।

            समाधि योगदर्शन का प्रमुख विषय है। मानव जीवन का मूल लक्ष्य होने के कारण योगदर्शनकार ने समाधि और समाधियों पर अत्यन्त वैज्ञानिक और रहस्यमय सूत्र प्रतिपादित किये हैं। इन सूत्रों को सतीश आर्य ने अपने भाष्य में देते हुए अन्य भाष्यकारों के द्वारा स्थापित विचार का वर्गीकरण करके पाठकों के लिये एक स्थान पर उपलब्ध करा दिया है। यह भी इस भाष्य की ‘विशेषता’ कही जायेगी। प्रत्येक सूत्र में संभावित शंकाओं का शास्त्रीय और तार्किक समाधान करना इस भाष्य की अन्य विशेषता है। भाष्यकार ने अपना मत यदि दिया है तो वह वेद-शास्त्र सम्मत ही है। ऐसा भी नहीं है कि महर्षि दयानन्द, योगदर्शनकार और ऋषियों के विचारों की पुष्टि के लिए भाष्यकार सतीश ने कहीं कुतर्क या अशास्त्रीय प्रमाणों या तर्कों का सहारा लिया हो। वह तो भूमिका में ही संकल्प लेते हुए द्रष्टव्य होते हैं कि वेदाधारित और महर्षि दयानन्द के मत के विरोध में लिखने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह भाष्यकार की कृतज्ञता ही कही जाएगी।

            ग्रन्थ का द्वितीय अध्याय साधनपाद है। इस पाद का विषय क्रियायोग, यम-नियम और योगांग हैं। भाष्य में विवेचना और व्याख्या शैली अपनायी है। इन दोनों शैलियों की विशेषता यह होती है कि लेखक को अपना सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान परोसने का अवसर प्राप्त होता है, लेकिन विषय की सीमा में रहकर। भाष्यकार सतीश ने इसका प्रत्येक सूत्र में ध्यान रखा है। आवश्यकता के अनुरूप विषय, ज्ञान, धर्म और भावना को जिस प्रकार व्यक्त किया गया है वह उन्हें एक सिद्ध लेखक, गवेषक और वैदिक वाङ्मय के जानकर के रूप में प्रतष्ठित करता है।

            साधनपाद के अन्तर्गत जितने भी विषयों को सम्मिलित किया गया है वे सभी विषय मानव के शरीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति में सहायक तो हैं ही, सर्वोच्च स्थिति क्या हो सकती है इसको भी समझाया गया है। दर्शन, व्याकरण, विज्ञान, धर्म और अध्यात्म की सबसे उत्कृष्ट स्थिति की भी विवेचना भाष्यकार ने दी है। उदाहरण के रूप में कर्मफल सिद्धान्त के विषय में भाष्यकार सतीश आर्य ने अपने ज्ञान, अनुभव और तर्क के आधार पर कर्मफल की मीमांसा की है। यह सामान्य पाठकों के लिये उपयोगी है। भाषा-शैली की दृष्टि से सम्पूर्ण ग्रंथ में अत्यन्त सरल और तर्क-भाव को प्राथमिकता दी गई है। विवेचना शैली, समाधान शैली, गवेषणा शैली, मीमांसा शैली, जिज्ञासा शैली का प्रयोग भी बढि़या ढंग से किया गया है।

            विभूतिपाद योगदर्शन का आंतरिक योग को बताने वाली योगिक क्रियाओं में धारणा, ध्यान और समाधि को रखा गया है। इसके अतिरिक्त संयम, समाधि के परिणाम, पंचभूतों का स्वरूप, वैराग्य, परकाया प्रवेश का उपाय जैसे अनेक विषयों को सम्मिलित किया गया है। मानव सुख चाहता है। समाधि में ईश्वरीय आनन्द की अनुभूति लेना चाहता है। ऐश्वर्य, स्वर्ग (सुख विशेष) औेर मोक्ष के माध्यम से परमात्मा के आनन्द में करोड़ों वर्षों तक स्थिर रहना चाहता है। इन सब का सबसे पावन आदर्श माध्यम योग - ध्यान की साधना है। विभूतिपाद के प्रथम सूत्र में वैदिक योग मीमांसा के अन्तर्गत भाष्यकार इसकी विवेचना करते हैं। विभूतिपाद अत्यन्त जटिल, रहस्यमय और आत्मप्रज्ञा से जुड़ा पाद है। इसमें कुछ ऐसे उदाहरण देने चाहिए थे जो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के माध्यम से जुड़े हुए हैं। शोधार्थियों के लिये यह ग्रंथ मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में सामर्थ्य रखता है। मेरी समझ से ग्रंथ की भाषा को और सहज-सरल करने की आवश्यकता है। इससे विभूतिपाद जैसे जटिल विषय को समझने में आसानी हो सकती है।

            योगदर्शन का अन्तिम पाद कैवल्य पाद के नाम से जाना जाता है। निश्चित ही इसमें कैवल्य = मोक्ष संबंधी विषयो को प्राथमिकता दी गई है। इसके अतिरिक्त चित्त के स्वरूप, क्लेशकर्म, योगजधर्म और समाधिजन्य सिद्धियों का वर्णन किया गया है। साथ ही अन्य अनेक विषयों पर भी विचार किया गया है। अन्तिम पाद होने के कारण ऐसे सभी विषय सम्मिलित किये गए हैं जो अष्टांगयोग के लिये आवश्यक हो सकते हैं। भाष्यकार सतीश ने वैदिकयोगमीमांसा में जन्मना सिद्धि पर प्रकाश डालते हुए इससे शास्त्र सम्मत सिद्ध करने के लिये कठोपनिषद् का प्रमाण दिया है। इसी प्रकार औषध जात सिद्धि और तपोजा सिद्धि आदि पर भी व्याख्यात्मक शैली में प्रकाश डाला गया है। नित्यता दर्शन का विषय है। योगदर्शन में उसकी विवेचना करके भाष्यकार ने अपना अभिमत प्रकट कर दिया है। इसी प्रकार अपवर्ग को स्पष्ट कर दिया है। अपवर्ग पर व्यासभाष्य का अर्थ और उसके लिये कर्मों की विवचेना कर्मफल को समझने में सहायक है।

            इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रंथ एक शोध ग्रंथ जैसा जान पड़ता है। जिसमें प्रत्येक विषय को क्रम के अनुसार और प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया गया है। कहीं-कहीं वर्तनी व्याकरण और भाषा की अशुद्धियाँ हैं, लेकिन इनसे ग्रंथ की महत्ता कम नहीं हो जाती। योगदर्शन की जितनी भी गूढ़ पुस्तकें मेरे स्वाध्याय से गुजरी हैं उसमें यह ग्रंथ अन्य ग्रंथों की अपेक्षा अधिक प्रमाणिक, स्पष्ट, विवेचनापूर्ण, विचारयुक्त और मननीय लगा। सामान्य पाठकों के क्रय की सीमा में इसका मूल्य यदि कम होता तो शायद यह सामान्य जन के लिये भी पठनीय बन जाता।

अखिलेश आर्येन्दु

साहित्यकार, चिन्तक, संस्कृतिवेत्ता और आर्ष क्रान्ति मासिक के सम्पादक

ए - ११, त्यागी विहार, नांगलोई, दिल्ली ११००४१

ओ३म्

            स्वाध्याय काल में आचार्य ब्रह्मचारी नन्दकिशोर जी के पुस्तकालय में श्रीमान् सतीश आर्य जी द्वारा कृत पातञ्जल योग पर व्याख्या देखी। इसका स्वाध्याय करते हुए बहुत अच्छा लगा, सहसा मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि नये योगाभ्यासी साधकों को स्वाध्याय के लिये यह टीका सुझानी चाहिए, इसे पढ़ने के लिये प्रेरित करना चाहिए। योगमार्ग पर दिनों-दिन उन्नति चाहने वाले सब साधक-साधिकाओं को योगशास्त्र को गुरु-परम्परा से पढ़ने का अवसर नहीं मिलता, दूसरी सबसे बड़ी समस्या संस्कृत भाषा का ज्ञान भी सबको नहीं होता। इन कारणों से योग के नाम पर कुछ साधक भ्रमित रहते हैं। योगशास्त्र के विपरीत अनेकानेक मान्यतायें लिये आज यहाँ तो कल वहाँ, आज इस योगी के पास तो कल उस महात्मा के पास भटकते रहते हैं। अब तक के अध्ययन, चिन्तन-मनन के बाद मेरा यह कहना है कि योग के अध्ययन, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और प्रायोगिक योगाभ्यास के बिना साधना में गति पाना लगभग असम्भव जैसा है। इससे यह अवश्य समझ लेना चाहिए कि शास्त्र-प्रक्रिया के विपरीत जितने भी ध्यान-साधना और योग सिखाने वाले हैं वे मात्र श्रोताओं में भ्रम ही पैदा करते हैं कि शीघ्र सिद्धि और समाधि की प्राप्ति होकर अविद्यादि पञ्चक्लेशों का नाश होगा, एवं आत्मा और परमात्मतत्त्व के तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होगी।   यह  कब हो सकता है, जब साधक यम-नियमादि का व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर पालन करके विवेकख्याति को प्राप्त कर लेता है। इस लक्ष्य पर अहर्निश निरन्तरता के साथ श्रद्धापर्वूक योगदर्शन का स्वाध्याय और तदनुसार आचरण करने से शीघ्र लाभ प्राप्त कर सकता है। सभी प्रकार के साधक-साधिकाओं के लिये वैदिक विद्वान् श्री सतीश आर्य जी द्वारा कृत योगदर्शन की व्याख्या विशेष लाभप्रद होगी। हर व्याख्याकार की अपनी कुछ विशेषतायें होती हैं। आर्यजगत के कई मूर्धन्य विद्वानों ने भी इस टीका पर अपनी-अपनी सम्मति दी है, जो कि बहुत महत्त्वपूर्ण है, वहाँ उन्हें भी अवश्य देखना चाहिए। यहाँ मैने योग-साधकों के लिये इसकी उपयोगिता को दर्शाया है। श्रीमान वैदिक विद्वान् श्री सतीश आर्य ही का यह कार्य स्तुत्य है, विद्वत्तापूर्ण है। मैं आपके लिये ईश्वर से मंगलकामनायें करता हूँ ईश्वर आपको उत्तम आरोग्य, धनैश्वर्य से सम्पन्न दीघार्यु करे। इस टीका की विशेषतायें —

१.         व्याख्याकार वैदिक है। वैदिक सैद्धान्तिक पक्ष को ध्यान में रखते हुए व्याख्या की गई है।

२.         सूत्र और व्यासभाष्य का पदार्थ और भावार्थ सरल सुगम और सहजता के साथ हृदयंगम हो जाने जैसा है।

३.         स्वल्प संस्कृत भाषा जानने वाले साधक भी पदार्थ से ही मूल के अभिप्राय को सहज समझ सकेंगे।

४.         जगह-जगह पर पूर्वा-पर को जोड़कर वा अन्तःसाक्षी द्वारा भाष्य को सरल किया गया है।

५.         जगह-जगह पर वेद, ऋषियोें और स्वामी दयानन्द जी की योग-दृष्टि को उदृत किया गया है।

६.         स्वामी दयानन्द जी द्वारा योग-सूत्रों पर किये गये अर्थों को, तत् सम्बन्धित प्रसंगों को, प्रमाणरूप से उदृत करके भाष्य को और उपयोगी बना दिया है।

७.         पातञ्जल योग-सूत्रों पर व्यासभाष्य के साथ महाराजा भोज-कृत भोजवृत्ति को भी सम्मिलित करके उसका भी पदार्थ व भावार्थ करके, इस टीका को साधक-जिज्ञासुओं के लिये बहुत उपयोगी बनाया गया है।

८.         जिन स्थलों पर भाष्य में सैद्धान्तिक हानि प्रतीत होती दिखाई देती है,  वहाँ पर व्याख्याकार ने यथोचित समाधान दिया है।

            निवेदन - जो मुझे इस व्याख्या के कुछ अध्ययन से विशेषतायें प्रतीत हुई, वो ऊपर श्रद्धया निवेदन की है, शेष अध्येता स्वयं अध्ययन करके निश्चय करें।

आचार्य सानन्द

आर्य समाज, माडलटाउन, पानीपत

      पातञ्जल योगदर्शन के तीन संस्करण शीघ्र ही समाप्त हो गये हैं, जो इस भाष्य की उपयोगिता को दर्शाते हैं। पिछले संस्करणों की कम्पोजिंग एवं भाषा सम्बन्धित अशुद्धियों को दूर कर वर्तमान संस्करण का प्रकाशन किया जा रहा है। इस कार्य के लिये हम लेखक के गुरुवर आचार्य अर्जुनदेव जी वर्णी, जिन्होंने द्वितीय संस्करण के प्रकाशन से पूर्व अपने अत्यन्त व्यस्त कार्यक्रम में से समय निकालकर इस ग्रन्थ को आद्योपान्त देखकर कम्पोजिंग एवं भाषा सम्बन्धित अशुद्वियों को चिह्नित किया था, का हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।

            योगदर्शन पर बहुत से भाष्य उपलब्ध हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इतने भाष्यों के होते हुए एक नये भाष्य के प्रकाशन की क्या आवश्यकता थी? योगदर्शन पर व्यासभाष्य आर्षसाहित्य का एक अभिन्न अंग है। महर्षि दयानन्द सरस्वती इसे पूर्णतया प्रामाणिक मानते हुए पठन-पाठन में सम्मिलित करते हैं और तदनुसार योग के सम्पादन को कैवल्य प्राप्ति हेतु अनिवार्य मानते हैं। उनकी यह स्पष्ट मान्यता है कि योग को क्रियात्मक रूप से अपनाये बिना आत्मसाक्षात्कार और परमात्मसाक्षात्कार सम्भव ही नहीं हो सकता। महर्षिव्यास योगभाष्य के अतिरिक्त ब्रह्यसूत्रों के भी रचियता हैं। महर्षिव्यास के दोनों ही ग्रन्थ, ब्रह्मा से लेकर उन पर्यन्त ऋषियों द्वारा प्रतिपादित मान्यताओं के अनुकूल हैं। वे स्वयं वेदों के अच्छे ज्ञाता थे और उन्हीं सिद्धान्तों का परिपालन भी करने वाले थे। अतः महर्षि व्यास रचित योगभाष्य न केवल पूर्व ऋषियों द्वारा प्रतिपादित योग सिद्धान्तों के अनुकूल है, बल्कि यह वेद में योगविषयक सिद्धान्तों की भी व्याख्या करता है।

            योगदर्शन पर पूर्व उपलब्ध भाष्यों में निम्न प्रकार के दोष पाये जाते हैं —

१.         वर्त्तमान में उपलब्ध बहुसंख्यक योगभाष्य या तो केवल व्यासभाष्य का अनुवाद मात्र हैं, अथवा पूर्व के अन्य व्याख्याकारों यथा भोज, वाचस्पतिमिश्र, विज्ञानभिक्षु आदि का अनुकरण करने वाले हैं। कई स्थलों पर ये भाष्य महर्षि व्यास की मान्यता पर भोज की मान्यता को भी प्राथमिकता देते हैं।

२.         इन भाष्यकारों ने व्यासभाष्य की प्रामाणिकता को वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणों से सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया। बहुधा भाष्यकारों के स्वयं के योगी न होने से, तथा वेदादि सत्यशास्त्रों के सिद्धान्तों के सन्दर्भों को न लेने से, वे व्यासभाष्य की यथार्थता तक नहीं पहुँच पाये। अगर इन भाष्यकारों ने वेद, ब्राह्मणग्रन्थों, उपनिषदों तथा महर्षि व्यास द्वारा ब्रह्मसूत्रों में प्रतिपादित सिद्धान्तों के सन्दर्भों को सामने रखकर भाष्य किया होता तो व्यासभाष्य का वास्तविक स्वरूप अधिक स्पष्ट होता। पौराणिक भाष्यकारों ने तो महर्षि व्यास के नाम से रचित पुराणों के सन्दर्भों में भाष्य किया और व्यासभाष्य की मूल भावना से ही दूर रह गये।

३.         लगभग सभी विद्वानों ने अपने स्वाध्याय और अपनी मान्यताओं के अनुसार व्यासभाष्य का अनुवाद करते हुए व्याख्या की। अतः उन भाष्यों में एक ओर जहाँ पौराणिक भाष्यकारों द्वारा पुराणों की तथाकथित मान्यताओं का समावेश कर दिया, वहीं दूसरी ओर आर्यजगत् के विद्वानों को पुराणों में प्रतिपादित मान्यताओं के कारण व्यासभाष्य में प्रक्षेप नजर आये और उन्होंने व्यासभाष्य के कई स्थलों को प्रक्षिप्त कह दिया।

४.         इन उपलब्ध भाष्यों में एक अन्य दोष यह है कि इन बहुसंख्यक भाष्यकारों ने व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी से भी विपरीत भाष्य किया और उन्हें इसमें किसी प्रकार की विसंगति भी प्रतीत नहीं हुई।

            ऐसे में एक ऐसे भाष्य की आवश्यकता प्रतीत हुई जो योग के यथार्थ स्वरूप को, वेद ब्राह्मणग्रन्थों एवं उपनिषद आदि ग्रन्थों में इस विषयक प्रमाणों के अनुकूल प्रतिपादित करता हो। लेखक ने इस विषय पर लेखनी उठाने का साहस किया। स्वयं योगी न होते हुए, वह अपने आप को योग का एक विद्यार्थी एवं जिज्ञासु मानते हैं। उनकी यह दृढ मान्यता है कि योग को अपनाये बिना आत्मकल्याण सम्भव ही नहीं है, मोक्ष की प्राप्ति तो दूर का विषय है। प्रस्तुत व्याख्याग्रन्थ की कई विशेषताओं को सूचीबद्ध करने का प्रयास कर रहा हूँ —

१.         योगदर्शन पर व्यासभाष्य के साथ-साथ भोजवृत्ति का भी पदार्थ किया गया है। 

२.         महर्षि दयानन्द स्वयं एक योगी थे तथा उन्होंने आजीवन योग को अपनी साधना का प्रधान अंग बनाये रखा, जिससे वे वेदभाष्य से समाज-सुधार के महान कार्यों को करने में सफल रहे। उनके ग्रन्थों में प्रतिपादित योगदर्शन के समस्त उद्धरणों को तत्-तत् सूत्रों के साथ दिया गया है।

३.         योगसूत्रों की व्याख्या “वैदिकयोगमीमांसा” में वेद, उपनिषद्, ब्राह्मणग्रन्थों के लगभग ५१२ प्रमाणों को देकर योग के सिद्धान्तों को प्राचीन ऋषियों की मान्यताओं के सन्दर्भ में स्पष्ट किया गया है।

४.         योगदर्शन के विभूतिपाद का व्याख्यान भी वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणानुकूल किया गया है, जिससे विभूतियों के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो सके और विभिन्न आर्य विद्वानों द्वारा इस विषयक प्रक्षेप होने की मान्यता का निराकरण किया गया है। लेखक का यह मानना है कि महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास द्वारा प्रतिपादित विभूतियों को प्रक्षिप्त या असम्भव कहना उचित नहीं है। योगसूत्र ३.२६ से ३.२८ तक सूर्य, चन्द्र और ध्रुव में संयम से होने वाली विभूतियों को वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादित किया गया है, जिसे पाठक यथास्थान देखें। “भुवनज्ञानं सूर्येसंयमात्” ३.२६ की व्याख्या से पूर्व ४ पृष्ठों की अनुभूमिका लिखी गयी है और इसकी व्याख्या में ४६ प्रमाणों को देकर अपने पक्ष की पुष्टि की गयी है। आगे अणिमाादि सिद्धियों को शास्त्रों के प्रमाणों एवं विज्ञानानुसार सिद्ध करने का भगीरथ पुरुषार्थ किया गया है। इसी प्रकार अन्य असंभव अथवा प्रक्षिप्त प्रतीत होने वाले स्थलों का शास्त्रानुकूल प्रतिपादन किया गया है। विभूतिपाद के सूत्रों की व्याख्या को देखने के पश्चात्, अन्य विद्वानों द्वारा प्रक्षिप्त अथवा असम्भव श्रेणी में डाली गई विभूतियाँ भी प्रामाणिक एवं सम्भव ज्ञात होती हैं।

५.         आत्मसाक्षात्कार हेतु योगसूत्र ३.३५ में पुरुषज्ञानम् सिद्धि की व्याख्या विशेष रूप से द्रष्टव्य है।

६.         योगसूत्र ३.३ की व्याख्या में “एक प्रयोग” नाम से समाधि को प्राप्त करने का क्रमानुसार वर्णन किया गया है, जिसका अनुसरण करके कोई भी साधक समाधि को प्राप्त करने में सफल हो सकता है।

७.         प्रस्तुत व्याख्या में एक अन्य विशेषता यह है कि विभिन्न सूत्रों की व्याख्या करते हुए लेखक ने न केवल वेदादि सत्यशास्त्रों और ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों के प्रमाणों का ही ध्यान रखा, बल्कि व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी का भी ध्यान रखा जिससे योगसूत्रों पर व्यासभाष्य को यथार्थ रूप में समझने का सामर्थ्य मिलता है। इसका सबसे प्रबल उदाहरण योगसूत्र १.१७ की व्याख्या है, जिसमें वितर्कानुगत से लेकर अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधियों का व्याख्यान है। इस व्याख्या से समाधियों के यथार्थ स्वरूप का बोध होता है, और इस सूत्र की संगति समाधि-पाद के समाधि-विषयक अन्य सूत्रों, १.४२ से आगे के सूत्रों, से भी लगाई गयी है, जिससे समाधियों का वास्तविक स्वरूप ज्ञात होता है।

८.         योगसूत्र १.१८-२० तक असम्प्रज्ञात समाधि के विषय में भी अन्तःसाक्षी के द्वारा विशेष व्याख्यान किया गया है।  जिससे  भवप्रत्यय और उपायप्रत्यय को यथार्थ रूप में समझने में सहायता मिलती है और यह धारणा भी दूर हो जाती है कि ये दोनों समाधियाँ असम्प्रज्ञात समाधि के ही दो भेद हैं।

९.         योगसूत्र ३.२५ की व्याख्या, व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी के सन्दर्भ और प्रमाणानुकूल होने से, प्रचलित व्याख्या से सर्वथा भिन्न और सिद्धि के यथार्थ स्वरूप को दर्शाने वाली है।

१०.       योगसूत्र ४.४ की व्याख्या से योगी द्वारा अनेक चित्तों एवं शरीरों के निर्माण की वेदविरुद्ध मान्यता का निराकरण ही नहीं होता, बल्कि इस सूत्र पर व्याख्यान इस रहस्य के वास्तविक अर्थों को खोलता है।

११.        योगसूत्र ४.१० की व्याख्या में, अगस्त्य ऋषि द्वारा ३ घूट में समुद्रपान के सन्दर्भ की व्याख्या को देखने के बाद, पुराणों में उपलब्ध कथा के आधार पर, इस सन्दर्भ को प्रक्षिप्त कहना सम्भव नहीं है।

१२.       लेखक ने भूमिका में “असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्मसाक्षात्कार” विषय को उठाकर यह प्रतिपादित किया है कि योगी को परमात्मसाक्षात्कार तो असम्प्रज्ञात समाधि में ही होता है, उससे पूर्व नहीं।

१३.        प्रस्तुत ग्रन्थ की अन्तिम १० सूत्रों की व्याख्या अपने आप में एक विशद व्याख्यान है, जिसमें लेखक ने मोक्षमार्ग के पथिक के लिए सुन्दर और सरल मार्ग का निर्देशन वेदादि सत्यग्रन्थों के प्रमाणानुकूल किया है। धर्ममेघ समाधि को सम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध करते हुए, उससे आगे के मार्ग का वर्णन तो वस्तुतः अनुभव साध्य ही है, परन्तु फिर भी उसे शब्दों में लिखने का कार्य, अपने आप में एक जटिल कार्य है। असम्प्रज्ञात समाधि में क्या होता है?, परमात्म साक्षात्कार कैसे सम्भव होता है?, चित्त = बुद्धि आदि द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार क्यों नहीं हो सकता?, उस साक्षात्कार की स्थिति क्या होती है?, संस्कारों को दग्धबीजभाव करना और कैवल्य प्राप्ति का यथार्थ निरुपण ऐसे विषय हैं, जिसका जिज्ञासु साधक यथास्थान लाभ उठा सकेंगे।

            इस भाष्य की विशिष्टता को मात्र उपरोक्त प्रकार से लिखना सम्भव नहीं है। इस भाष्य की विशेषताओं की अनुभूति तो पाठक एवं जिज्ञासु साधक पूरे व्याख्यान में करेंगे। आशा है योगमार्ग के साधक एवं जिज्ञासु इस भाष्य से लाभान्वित होंगे। इस ग्रन्थ का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद, जो कि लेखक ने स्वयं किया है, का भी प्रकाशन हो चुका है। यह अनुवाद विश्व-समाज में योग के मूल सिद्धान्तों को समझने के लिये सहायक है।

            इस ग्रन्थ के विभिन्न संस्करणों की छपाई आदि की पूर्ण व्यवस्था “परिमल प्रकाशन” की ओर से हुई है, जिसके लिये हम श्री परिमल जोशी जी का हार्दिक धन्यवाद करते हैं और उनकी दीर्घायु की कामना करते हैं। वे स्वयं भी संस्कृत और वेदादि ग्रन्थों के प्रकाशन के क्षेत्र में कार्यरत हैं।

            योग के अभ्यासी विद्वानों एवं शिक्षकों ने इस ग्रन्थ पर अपनी शुभ सम्मति देते हुए, इस भाष्य को अनुपम कहा है और सभी उपलब्ध भाष्यों में इसे विशिष्ट स्थान दिया है, जो इस भाष्य की उपयोगिता को प्रमाणित करता है। हम सभी विद्वानों का हार्दिक धन्यवाद करते हैं, जो इस भाष्य को पठन-पाठन के स्तर पर ले आये। 

            अन्त में सभी पाठकों एवं विद्वानों से विनम्र निवेदन हैं कि अगर इस भाष्य में कहीं कोई त्रुटि प्रतीत हो, तो हमें अवगत कराने की कृपा करें ताकि अगले संस्करण में उसे दूर किया जा सके।

मनीष आर्य

ट्रस्टी

वेद योग चैरिटेबल ट्रस्ट