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यजुर्वेद का सामान्य परिचय

सृष्टि के आदि में परमात्मा द्वारा इसका ज्ञान वायु ॠषि को दिया गया था।

जो कर्मकांड है, सो विज्ञान का निमित्त और जो विज्ञानकांड है, सो क्रिया से फल देने वाला होता है। कोई जीव ऐसा नहीं है कि जो मन, प्राण, वायु, इन्द्रिय और शरीर के चलाये बिना एक क्षण भर भी रह सके, क्योंकि जीव अल्पज्ञ एकदेशवर्त्ती चेतन है। इसलिये जो ईश्वर ने ऋग्वेद के मन्त्रों से सब पदार्थों के गुणगुणी का ज्ञान और यजुर्वेद के मन्त्रों से सब क्रिया करनी प्रसिद्ध की है, क्योंकि (ऋक्) और (यजुः) इन शब्दों का अर्थ भी यही है कि जिससे मनुष्य लोग ईश्वर से लेके पृथिवीपर्यन्त पदार्थों के ज्ञान से धार्मिक विद्वानों का संग, सब शिल्पक्रिया सहित विद्याओं की सिद्धि, श्रेष्ठ विद्या, श्रेष्ठ गुण वा विद्या का दान, यथायोग्य उक्त विद्या के व्यवहार से सर्वोपकार के अनुकूल द्रव्यादि पदार्थों का खर्च करें, इसलिये इसका नाम यजुर्वेद है। और भी इन शब्दों का अभिप्राय भूमिका में प्रकट कर दिया है, वहां देख लेना चाहिये, क्योंकि उक्त भूमिका चारों वेद की एक ही है॥

यजुर्वेद यज्ञ कर्म के लिए उपयोगी ग्रन्थ है । गद्यात्मक भाग के लिये "यजुः" कहा जाता है । यजुस् की प्रधानता के कारण इसे "यजुर्वेद" कहा जाता है । 

 

यजुष् के अन्य अर्थः —

(१.) यजुर्यजतेः (निरुक्त--७.१२)

(यज्ञ से सम्बद्ध मन्त्रों को यजुष् कहते हैं ।)

(२.) इज्यते अनेनेति यजुः ।

(जिन मन्त्रों से यज्ञ किया जाता हैं, उन्हें यजुष् कहते हैं ।)

(३.) अनियताक्षरावसानो यजुः ।

(जिन मन्त्रों में पद्यों के तुल्य अक्षर-संख्या निर्धारित नहीं होती है, वे यजुष् हैं ।)

(४.) शेषे यजुःशब्दः । (पूर्वमीमांसा--२.१.३७)

(पद्यबन्ध और गीति से रहित मन्त्रात्मक रचना को यजुष् कहते हैं ।)

(५.) एकप्रयोजनं साकांक्षं पदजातमेकं यजुः ।

(एक उद्देश्य से कहे हुए साकांक्ष एक पद-समूह को यजुः कहेंगे ।)

 

इस वेद की दो परम्पराएँ हैं — शुक्ल और कृष्ण । 

शुक्ल यजुर्वेद में शुद्ध रूप में मन्त्र मात्र संकलित है, किन्तु कृष्ण यजुर्वेद में मन्त्रों के साथ ब्राह्मण मिश्रित है ।

 

यजुर्वेद की शाखाएँ :-

महर्षि पतञ्जलि ने महाभाष्य में यजुर्वेद की १०१ शाखाएँ बताई है, किन्तु उपलब्धता कम है ।

 

(१) शुक्ल यजुर्वेद:-

इसकी कुल १६ शाखाएँ बताईं जाती हैं , किन्तु सम्प्रति २ ही शाखाएँ उपलब्ध हैं।

१. माध्यन्दिन (वाजसनेयी) शाखा,

२. काण्व शाखा ।

माध्यन्दिन-शाखा के मुख्य ऋषि याज्ञवल्क्य हैं । ये मिथिला के निवासी थे । इनके पिता वाजसनि थे, अतः याज्ञवल्क्य वाजसनेय कहलाए । उनके नाम पर इस यजुर्वेद को वाजसनेयी शाखा भी कहते हैं।

कूछ विद्वानों के अनुसार याज्ञवल्क्य ऋषि द्वारा इसे दिन के मध्य भाग में प्राप्त करने से इसे माध्यन्दिन शाखा कहा गया । इस शाखा का सर्वाधिक प्रचार उत्तर भारत में है ।

काण्व ऋषि के पिता बोधायन थे । काण्व के गुरु याज्ञवल्क्य ही थे । काण्व-शाखा का सर्वाधिक प्रचार महाराष्ट्र में हैं । 

 

(२) कृष्ण यजुर्वेद:-

इसकी कुल ८५ शाखाएँ बताईं जाती हैं किन्तु सम्प्रति ४ शाखाएँ ही उपलब्ध हैं---

(१.) तैत्तिरीय-संहिता,

(२.) मैत्रायणी-संहिता,

(३.) कठ-संहिता,

(४.) कपिष्ठल-संहिता,

 

शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद में अन्तर —

 

(प्रचलित मान्यताओं के अनुसार)

१. शुक्लयजुर्वेद

१. यह आदित्य सम्प्रदाय का प्रतिनिधि ग्रन्थ है ।

२. इसमें यज्ञ में प्रयोग किए जाने वाले मन्त्र है ।

३. यह विशुद्ध है, अर्थात् केवल मन्त्र है, कोई मिश्रण नहीं है ।

४. इस ग्रन्थ की प्राप्ति आदित्य से हुई है । आदित्य शुक्ल होता है, अतः इसका नाम शुक्ल-यदुर्वेद रखा गया । शुद्धता के कारण भी इसे शुक्ल कहा गया है ।

५. इसमें व्याख्या, विवरण और विनियोगात्मक भाग नहीं है, अर्थात् विशुद्ध है ।

 

२. कृष्णयजुर्वेद

 

१. यह ब्रह्म-सम्प्रदाय का प्रतिनिधि ग्रन्थ है ।

२. इसमें मन्त्रों के साथ-साथ ब्राह्मण भी मिश्रित है, अतः मिश्रण के कारण कृष्ण कहा गया ।

३. आदित्य के प्रकाश के विपरीत होने से भी इसे कृष्ण कहा गया ।

४. यह अव्यवस्थित है ।

५. इसमें व्याख्या, विवरण और विनियोगात्मक भाग है, अर्थात् विशुद्ध नहीं है, अस्वच्छ है, मिश्रित है ।

 

मन्त्र संख्या —

 

१. शुक्लयजुर्वेदः-

 

शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयी-शाखा में कुल---

४० अध्याय हैं,

१९७५ मन्त्र हैं ।

वाजयनेयी संहिता में कुल अक्षर २,८८,००० (दो लाख, अट्ठासी हजार)  हैं ।

 

काण्व-शाखा में भी ४० ही अध्याय हैं, किन्तु मन्त्र २०८६ हैं ।

अनुवाक-३२८ हैं । 

 

२. कृष्णयजुर्वेद -

 

तैत्तिरीय-शाखा में कुल ७ काण्ड हैं,

४४ प्रपाठक हैं,

६३१ अनुवाक हैं ।

 

मैत्रायणी-शाखा में कुल ४ काण्ड हैं,

५४ प्रपाठक हैं,

३१४४ मन्त्र हैं ।

 

काठक (कठ) संहिता में कुल ५ खण्ड हैं,

स्थानक ४० हैं,

वचन १३ हैं,

५३ उपखण्ड हैं,

८४३ अनुवाक हैं,

३०२८ मन्त्र हैं ।

 

कपिष्ठल अपूर्ण रूप में उपलब्ध है ।

इसमें ६ अष्टक ही उपलब्ध है ,

४८ अध्याय पर समाप्ति है ।

 

ब्राह्मण :-

शुक्लयजुर्वेद ------ शतपथ ब्राह्मण 

कृष्णयजुर्वेद ---- तैत्तिरीय ब्राह्मण, मैत्रायणी, कठ और कपिष्ठल

इन चारों संहिताओं में जो ब्राह्मण भाग हैं, वही कृष्णयजुर्वेद के ब्राह्मण है ।

 

आरण्यक :-

शुक्लयजुर्वेद---- बृहदारण्यक 

कृष्णयजुर्वेद---- तैत्तिरीय आरण्यक 

 

उपनिषद् :-

शुक्लयजुर्वेद ---- ईशोपनिषद् , बृहदारण्यकोपनिषद् , प्रश्नोपनिषद् ।

कृष्णयजुर्वेद---- तैत्तिरीय उपनिषद, मैत्रायणीय, कठोपनिषद, श्वेताश्वरोपनिषद।

 

श्रौतसूत्र :-

शुक्लयजुर्वेद---कात्यायन (पारस्कर)

कृष्णयजुर्वेद----आपस्तम्ब, बोधायन, हिरण्यकेशी (सत्याषाढ), भारद्वाज, वैखानस, वाधुल, मानव, मैत्रायणी, वाराह ।

 

गृह्यसूत्र :-

शुक्लयजुर्वेद---कात्यायन (पारस्कर)

कृष्णयजुर्वेद----आपस्तम्ब, बोधायन, सत्याषाढ, वैखानस, कठ ।

 

धर्मसूत्र :-

शुक्लयजुर्वेद---कोई नहीं ।

कृष्णयजुर्वेद----वसिष्ठ-सूत्र ।

 

शुल्वसूत्र :-

शुक्लयजुर्वेद---कात्यायन ।

कृष्णयजुर्वेद---बोधायन, आपस्तम्ब, मानव, मैत्रायणी, वाराह और वाधुल ।