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Bhumkia

प्रथम पाद में कहे गए लक्षणयुक्त योग (योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः १.२) के अङ्ग भूत अविद्यादि क्लेशों को निर्बल करने का फल और) क्रियायोग (२.१) को कहकर, पाँच प्रकार के क्लेशों का उद्देश = नाम, स्वरूप = लक्षण, कारण, क्षेत्र और फल को कहकर, कर्मों के भी भेद, कारण स्वरूप और फल को कहकर, कर्मफल का कारण और स्वरूप को कहा गया। उसके पश्चात् क्लेशादि के त्यागने योग्य होने से ज्ञान के बिना त्याग के सम्भव न होने से और ज्ञान का शास्त्र के अधीन होने से और त्याज्य, त्याग का कारण, उपाय, उपादेय, ग्राह्य तथा उपादान के कारण ज्ञान का कारण शास्त्र का चार भेदों वाला होने से और त्याग के बिना हेय = त्याज्य = त्याग किए जाने योग्य का स्वरूप सिद्ध न होने के कारण हान = त्याग सहित चारों भेदों को अपने-अपने कारणों के सहित कहकर के, उपादेय कारण रूप विवेकख्याति का कारण रूप में विद्यमान अन्तरङ्ग (धारणा-ध्यान-समाधि) और बहिरङ्ग (यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार) रूप से स्थित योग के अङ्गों यम-नियम आदि का स्वरूप फल सहित व्याख्यान करके, आसन आदि का धारणा पर्यन्त परस्पर उपकार्य और उपकारक भाव से उपस्थित हुओं का उद्देश = नाम कहकर के, प्रत्येक योग के अङ्ग का लक्षण - कारण पूर्वक फल का वर्णन किया गया। वह यह योग यम-नियम आदि के द्वारा बीज भाव को प्राप्त, आसन, प्राणायामों से अङ्कुरित हुआ, प्रत्याहार से पुष्पित हुआ, धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारा फल देगा। इस प्रकार से साधनपाद की व्याख्या की गई॥