Donation Appeal

अनुभूमिका

        विभूति शब्द का अर्थ कोशकारों ने ‘‘ऐश्वर्य’’ किया है, जिससे विभिन्न प्रकार के ऐश्वर्यों की प्राप्ति हो वह विभूति कहाती है।  वेद में विभूति का वर्णन आया है। ऋग्वेद में ७ स्थानों पर, सामवेद में १ स्थान पर, और अथर्ववेद में तीन स्थानों पर विभूति शब्द का प्रयोग निम्न प्रकार से हुआ है —

        ऋग्वेद में — विभूतयः - १.८.९;  १.१६६.११;  विभूतिः - १.३०.५;  ६.२१.१;  तथा विभूतिम् - ६.१७.४;  ८.४९.६;  ८.५०.६;

        सामवेद में — विभूतिः - १६००;  तथा

        अथर्ववेद में — विभूतयः - २०.६०.५;  २०.७१.५;  विभूतिः - २०.४५.२;

        ऋग्वेद का भाष्य करते हुए महर्षि दयानन्द ने विभूति का निम्न प्रकार से अर्थ किया है —

        विभूतयः —   विविधैश्वर्यप्रदाः (ऋ० १.१६६.११);

                        विविधा भूतय ऐश्वर्याणि यासुताः (ऋ० १.८.९);

        विभूतिम् —   महदैश्वर्यम् (ऋ० ६.१७.४);

        विभूतिः —    विविधैश्वर्यम् (ऋ० १.३०.५);

        महर्षि दयानन्द ने विभूति पद से विविध अथवा महान् ऐश्वर्य को कहा है।

        इसी प्रकार से अन्य भाष्कार भी विभूति का अर्थ वैभव एवं ऐश्वर्य करते हैं यथा —

        विभूतिः (सामवेद १६००)     

— “वैभवकारिणी” = वैभव देने वाली (रामनाथ वेदालंकार);

                — “वैभवमय” (स्वामी ब्रह्ममुनि)

        विभूतयः (अथर्व० २०.६०.५, २०.७१.५)     

— ऐश्वर्य (श्री क्षेमकरणदास जी)

                — विभूतियाँ (श्री विश्वनाथ वेदालंकार)

        विभूतिः (अथर्व० २०.४५.२)  

— ऐश्वर्य (श्री क्षेमकरणदास जी)

                — विभूतियाँ (श्री विश्वनाथ वेदालंकार)

        इसी प्रकार प्रश्नोपनिषद् में सत्यकाम के प्रश्न के उत्तर में महर्षि पिप्पलाद विभूतियों के अनुभव को इस प्रकार कहते हैं — “स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्त्तते॥” प्रश्न० ५.४॥ अर्थात् वह उपासक सोमलोक = चन्द्रलोक को प्राप्त होकर वहाँ मन सम्बन्धी विभूतियों = ऐश्वर्यों = सुखों को अनुभव करता हुआ पुनः पृथिवी पर फिर से उत्पन्न होता है।

        महर्षि पतञ्जलि के अनुसार योगसाधक विभिन्न विषयों में संयम करता हुआ विभिन्न विभूतियों को प्राप्त करता है, जिनका वर्णन योगसूत्र ३.१६ से लेकर ३.५१ तक किया गया है।

        अतः उपर्युक्त वर्णन के अनुसार योगियों को विभूतियों की प्राप्ति को वेद और उपनिषद् में स्पष्ट रूप से माना है। परन्तु “इन विभूतियों का वास्तविक स्वरूप क्या है ?” इस विषय में, वेद और आर्ष ग्रन्थों के स्वाध्याय के न रहने तथा योग में विशेष गति न होने के कारण बहुत सी भ्रान्तियाँ हो गई है। तथा भोज के पश्चात् पौराणिक काल में वेदादि सत्यशास्त्रों से अनभिज्ञ लोगों ने, इनमें से कई विभूतियों का मिथ्या स्वरूप ही प्रचारित किया है जिससे जन सामान्य अविद्या ग्रस्त हुआ और मिथ्या मान्यताओं को ही मानने लगा। हमारा यहाँ यह प्रयास है कि वेदादि सत्यशास्त्रों के आधार पर, विभूतियों के यथार्थ स्वरूप को ही इस ग्रन्थ में प्रतिपादित किया जाए।

        योगदर्शन में प्रतिपादित विभूतियों / सिद्धियों को दो भागों में मुख्यरूप से बाँटा जा सकता है — ज्ञानात्मक = ज्ञानप्रधान विभूतियाँ तथा क्रियात्मक = क्रियाप्रधान विभूतियाँ।

        (१) ज्ञानात्मक = ज्ञानप्रधान विभूतियाँ वे हैं जिनमें किसी पदार्थ = विषय के संयम से विशेष ज्ञान की प्राप्ति मुख्य रूप से होती हो। उस विभूति से प्राप्त हुए ज्ञान का उपयोग, योगी के द्वारा क्रियात्मक रूप से जीवन में होना या न होना, उस ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् ही होता है। इनमें से कई विभूतियों के ज्ञान का उपयोग गौण रूप से और अन्य का मुख्य रूप से, क्रियात्मक जीवन में किया जाता है। दूसरी ओर

        (२) क्रियात्मक = क्रियाप्रधान विभूतियाँ वे हैं जिनमें विभूति का सम्बन्ध योगी के जीवन में क्रियात्मक रूप से ही होता है। उस क्रियाप्रधान विभूति के क्रिया पक्ष को सम्यक् रूप से आचरण करने के पश्चात् ही, उस विभूति सम्बन्धित ज्ञान एवं अनुभूति की प्राप्ति होती है।

        ज्ञानात्मक = ज्ञानप्रधान सिद्धियों में योगसूत्र ३.१६ से लेकर ३.३२ तक प्रतिपादित सिद्धियों में से बहुसंख्यक सिद्धियाँ आती है। इन सिद्धियों में भी जहाँ क्रिया की प्रधानता रहती है, उन सिद्धियों को क्रियात्मक = क्रियाप्रधान सिद्धियाँ जानना चाहिए, यथा ३.१८ में पूर्वजातिज्ञान, ३.२१ में अन्तर्धान, ३.२३ में मैत्री आदि बल, ३.२४ में हस्ति आदि बल, ३.३० में क्षुत्पिपासानिवृत्ति को क्रियाप्रधान जानना चाहिए। योगसूत्र ३.३५ में कथित पुरुषज्ञान मात्र शाब्दिक न होकर क्रियात्मक रूप से ही होता है। इस पुरुषज्ञान के पश्चात् ३.३६ में योगी को प्रातिभज्ञान की प्राप्ति कही गयी है। इसी सूत्र की अन्य श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद, वार्ता भी क्रियात्मक सिद्धियाँ हैं। इसी प्रकार आगे की सिद्धियों में क्रियात्मक रूप निम्न प्रकार से जानना चाहिए —

        ३.३८                  पर-शरीर प्रवेश।

        ३.३९                   जल, पङ्क, कण्टक आदि से असङ्गता।

        ३.४०                  शरीर में तेजस्विता।

        ३.४१                   दिव्य श्रोत्र की प्राप्ति।

        ३.४२                  आकाशगमन।

        ३.४३                  प्रकाश के आवरण का क्षय।

        ३.४४-४६              भूतजय से अणिमादि की प्राप्ति तथा कायसम्पत् की प्राप्ति।

        ३.४७-४८              इन्द्रियजय से मनोजवित्व, विकरणभाव तथा प्रधानजय।

        ३.४९                   सर्वभावाधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व की प्राप्ति।

        इनमें से कोई भी सिद्धि, पूर्व की सिद्धियों के समान ज्ञानात्मक नहीं कही जा सकती;  वरन् इन सभी का, किसी न किसी प्रकार से, योगी के क्रियात्मक जीवन से ही मुख्य रूप से सम्बन्ध है। क्रियात्मक सिद्धियों में किसी भी सिद्धि के अनुभव को मात्र शब्दों में कहना सम्भव नहीं हो सकता, क्योंकि वे सिद्धियाँ मुख्य रूप से क्रिया से ही सम्बन्धित हैं। इन क्रियात्मक सिद्धियों की अनुभूतियों के सम्बन्ध में, मात्र शब्द प्रमाणों के आधार पर, निश्चयात्मक रूप से प्रतिपादन करना  कदापि सम्भव नहीं हो सकता;   और  इसी प्रकार  इन का मात्र तर्क के आधार पर प्रतिवाद = निषेध भी सम्भव नहीं हो सकता।

        योगसूत्र ३.१६ से विभूतियों का प्रकरण आरम्भ हुआ है। महर्षि पतञ्जलि ने विभिन्न विषयों में संयम से होने वाली विभूतियों को कहा है, जिनकी विस्तारपूर्वक व्याख्या महर्षि व्यास ने अपने भाष्य में की है। इन विभूतियों को समझने हेतु निम्न बातों का ध्यान में रखना चाहिए —

१.      जिस विभूति में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, उस विभूति को समझने हेतु उन्हीं शब्दों तक सीमित रहना चाहिए।

२.      किसी भी विभूति का वर्णन करते हुए अर्थापत्ति का आश्रय नहीं लेना चाहिए। अर्थापत्ति का अभिप्राय है कि एक कथन से न कहा हुआ अर्थ जान लेना। जैसे किसी ने कहा कि “बादलों के न रहने पर वर्षा नहीं होती।” इससे जाना गया कि — बादलों के रहने पर वर्षा होती है। परन्तु बादलों के रहने पर वर्षा सदा ही होती हो यह भी निश्चयात्मक रूप से नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बादलों के होते हुए भी, विधारक वात के प्रबल होने पर, वर्षा नहीं हो पाती। अर्थापत्ति को न्यायदर्शनकार ने (न्याय० २.२.२) में अनुमान प्रमाण के अन्तर्गत माना है। दूसरी ओर सिद्धियों का विषय प्रत्यक्ष से ही सम्बन्धित है, जबकि अनुमान प्रत्यक्षपर्वूक ही होता। जिस योगी ने जिस सिद्धि का प्रत्यक्ष किया ही नहीं, तो उसके द्वारा सिद्धि के अन्यथा प्रतिपादन अथवा निषेध में अनुमान प्रमाण का प्रयोग उचित नहीं हो सकता। अतः कोई भाष्यकार किसी भी सिद्धि का मात्र अनुमान के आधार पर निषेध अथवा अन्यथा प्रतिपादन करना चाहे, तो उसे शास्त्रानुकूल नहीं मानना चाहिए।  अतः सिद्धियों की व्याख्या में उनका प्रतिपादन तो प्रत्यक्ष पूर्वक ही होना चाहिए;  और प्रत्यक्ष अनुभव के अभाव में वेदादि सत्यशास्त्रों के आधार पर शब्द प्रमाण के आश्रय से होना चाहिए।

३.      जैसा कि हमने भूमिका में भी कहा है कि महर्षि व्यास के नाम से प्रचलित १८ पुराणों में दिए गए सन्दर्भों को भूलकर ही इस व्याख्या को समझना होगा, अन्यथा हम विभूतियों के नाम पर असम्भव बातों को ही सत्य मानकर अविद्याग्रस्त रहेंगे। इन पुराणादि ग्रन्थों में कही गई वेद विरुद्ध मान्यताओं के आधार पर किसी अर्थ को करने से विभूति के वास्तविक स्वरूप से दूर ही रहेंगे। इस विषय में हमारा यह मानना है कि १८ पुराणों के लेखकों ने, व्यासभाष्य के ही कुछ सन्दर्भों / विषयों को लेकर, इन ग्रन्थों में मनमाने रूप से लिखा है जिससे ये सभी सन्दर्भ और विषय, उस पुराण प्रतिपादित प्रक्षिप्त प्रकार से ही जनसामान्य में प्रचलित हो गए है। अतः इस विषय में हमें इन पुराण प्रतिपादित सन्दर्भों / मान्यताओं से दूर ही रहना होगा। इसी प्रकार जिन भाष्यकारों ने भी उन प्रक्षिप्त ग्रन्थों की मान्यताओं से प्रभावित होकर विभूति पाद की व्याख्या की है, उसे भी विषयुक्त अन्न के समान त्याग देना चाहिए।

४.      कुछ विभूतियों में प्राप्त होने वाला ज्ञान अथवा उपलब्धि लोक सापेक्ष ज्ञान / उपलब्धि न होकर लोक निरपेक्ष है। उसको उसी प्रकार से समझना और मानना चाहिए। ऐसी विभूतियों का वर्णन उन-उन सूत्रों की व्याख्या में दिया जायेगा।

५.     “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” १.२;  “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” १.३;  तथा “पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति” ४.३४;  के अनुसार चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है;  इससे द्रष्टा पुरुष को स्वरूपस्थिति की प्राप्ति होती है;  और इसकी प्राप्ति की स्थिति अन्तिम सूत्र “पुरुषार्थशून्यानाम्.......” में कही गई है। इस लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में विभिन्न विषयों में संयम से प्राप्त होने वाली विभूतियों का कोई महत्त्व नहीं है। महर्षि व्यास योगसूत्र ३.५५ में स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कैवल्य प्राप्ति हेतु विभूतिसम्पन्न होना आवश्यक नहीं है। महर्षि पतञ्जलि भी ३.३७ में विभूतियों को समाधि में उपसर्ग = बाधक कहते हैं। क्लेशों को दग्धबीजवत् किए बिना स्वरूपस्थिति की प्राप्ति सम्भव नहीं है। अतः विभूतियों की प्राप्ति परमलक्ष्य = कैवल्य प्राप्ति हेतु अनिवार्य नहीं है। वस्तुतः तो बहुत सी विभूतियाँ सम्प्रज्ञात समाधि की उच्च भूमियों की प्राप्ति में ही बाधक होती है, और शेष अन्य असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति में।

६.     महर्षि दयानन्द सरस्वती ने योगदर्शन में किसी प्रकार के प्रक्षेप को नहीं माना है। इस विषय में स्वामी दयानन्द की जीवनी से निम्न प्रश्न द्रष्टव्य है —

प्रश्न — “भगवन्! पाजञ्जल शास्त्र का विभूतिपाद क्या सच्चा है ?”

उत्तर — “आप यों ही सन्देह करते हैं। योगशास्त्र तो अक्षरशः सत्य है। वह कोई पुराणों की कल्पना नहीं है, किन्तु क्रियात्मक और अनुभवसिद्ध शास्त्र है। ” (दूसरा सर्ग, राजस्थानकाण्ड, पृष्ठ ३४३, श्रीमद्दयानन्द प्रकाश — स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, जनज्ञानप्रकाशन।)

        अतः किसी भी विभूति को असम्भव, परीक्षणीय या विकल्प कोटि आदि रूप में सिद्ध करने हेतु महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों से उदाहरण देना उचित नहीं है। ऐसा करने से हम, महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित ग्रन्थों में प्रतिपादित मान्यताओं को देकर, अप्रत्यक्ष रूप से महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास दोनों की ही मान्यताओं और उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को अमान्य कर रहे हैं। जबकि महर्षि दयानन्द जी ब्रह्मा से लेकर जैमिनि पर्यन्त ऋषियों को प्रामाणिक मानते हैं, वे योगप्रवक्ता महर्षि पतञ्जलि और भाष्यकार महर्षि व्यास को पूर्णतया प्रामाणिक मानते हैं। तो क्या हम इस प्रकार महर्षि दयानन्द सरस्वती का पक्ष लेकर, हम महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास दोनों को ही वेदविरुद्ध तथा सिद्धान्तहीन सिद्ध नहीं कर रहे हैं ? क्या इस प्रकार हम महर्षि दयानन्द की इस मान्यता का ही खण्डन नहीं कर रहे हैं कि योगदर्शन और इस पर व्यासभाष्य प्रमाणिक है? अतः भाष्यकारों का यह पक्ष और मान्यता उचित नहीं है। हम, इस प्रकार, पूर्व ऋषियों को उनकी मान्यताओं के अनुसार नहीं समझ पा रहे हैं। दोष हमारा है, न कि उन ऋषियों का, जिन्होंने इस योगशास्त्र में वेदानुकूल सिद्धान्तों को स्वयं के साक्षात्कार के आधार पर कहा है। अतः इस विषय में हमें ही योग का सतत-अनवरत श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा पूर्वक अभ्यास करना होगा और इस प्रकार हम भी उन्हीं सिद्धान्तों को आत्मसात् एवं साक्षात् कर पायेंगे, अन्य कोई मार्ग नहीं है।

७.     कुछ विभूतियों के सम्बन्ध में वेदादि सत्यशास्त्रों में वर्णन मिलता है;  उनका यथासम्भव प्रमाण उन-उन सूत्रों की व्याख्या में दिया जाएगा।

८.     विभूतियों की प्राप्ति को मात्र स्थूल शरीर से ही मानना उचित नहीं,  बल्कि  इनकी उपलब्धि आत्मा से और शरीरों में मुख्यता सूक्ष्मशरीर से सम्बन्धित है। अतः कुछ विभूतियाँ इस स्थूल शरीर में होना सम्भव नहीं है यथा अणिमा, गरिमा आदि। प्रश्नोपनिषद् में परलोक (चन्द्रलोक आदि) में विभूतियों की अनुभूति का वर्णन है। यदि ऐसा न माना जाए तो महर्षि पतञ्जलि द्वारा योगसूत्र ४.१ में प्रतिपादित “जन्मजा” सिद्धियाँ सम्भव ही नहीं होंगी।

        इस विषय में महर्षि दयानन्द हुगली शास्त्रार्थ में स्पष्ट रूप से कहते हैं — “सर्वः स्थूल इत्यनेनेत्यादि देहान्तरगतस्य प्राप्तित्वादिति दिव्ययोग देह प्राप्तित्वाद्योगिनो न तु प्राकृतदेहस्य माहात्म्यमिदमित्यर्थस्य जागरूकत्वात् देहान्तर।” अर्थात् जो दिव्य योग सिद्धियों से प्राप्त होता है, उस देह से यह बात होती है। और जो अयोगी का देह नाम शरीर, उससे कभी यह बात नहीं होती।

        इसी शास्त्रार्थ में एक अन्य स्थान पर महर्षि दयानन्द कहते हैं — “...... जिस योगी को अणिमादिक सिद्धि हो गई है, वह सिद्ध जिस-जिस लोक में जाने की इच्छा करता है, उस-उस लोक को उसी समय प्राप्त होता है। सो जब पितृलोक में जाने की इच्छा करता है, पितृलोक को प्राप्त होके आनन्द करता है। क्योंकि — तेन पितृलोकेन महीयते। इत्युक्तत्वात्। ऐसे इच्छा मात्र से ही ब्रह्मलोकादिक में विहार करता है।”

        यहाँ जानना चाहिए कि ऐसा विहार चित्तगत तो सम्भव है, स्थूलशरीरगत कदापि नहीं। योगी असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ऐसा विहार करता भी है।

९.     महर्षि दयानन्द हुगली शास्त्रार्थ में योगसूत्र १.३५ के सन्दर्भ में कहते हैं —

        “बाहर के पदार्थ का ध्यान करना योगी लोगों को नहीं लिखा। क्योंकि जितने सावयव पदार्थ हैं, उनमें कभी चित्त की स्थिरता नहीं होती। और, जो होवे, तो मूर्त्तिमान् धन, पुत्र, दारादि के ध्यान में सब संसार लगा ही है। परन्तु चित्त की स्थिरता किसी की भी नहीं होती।” अतः वर्त्तमान में विभिन्न भाष्यकारों द्वारा कथित एवं प्रतिपादित बाह्य पदार्थों को संयम का विषय नहीं माना जा सकता। इस सन्दर्भ में बाह्य पदार्थों के रूप में कथित सूर्य, चन्द्र और ध्रुव के वास्तविक अभिप्राय को उन सूत्रों में दर्शाया जायेगा।

१०.    योगसिद्धियों के सम्बन्ध में यह मान्यता है कि इनको योगी मात्र चित्तगत संयम = धारणा, ध्यान और समाधि के आधार पर ही प्राप्त कर लेता है, और इसके लिए किसी प्रकार की अन्य किसी शारीरिक क्रिया आदि की आवश्यकता नहीं है। यह मान्यता ज्ञानप्रधान सिद्धियों के सम्बन्ध में तो स्वीकार्य है, परन्तु क्रियाप्रधान सिद्धियों के सम्बन्ध में ऐसा मानना उचित नहीं है।  महर्षि दयानन्द यजु॰ ११.२ के भावार्थ में कहते हैं — “यदि मनुष्य परमेश्वर की सृष्टि में समाधिस्थ होकर योग और तत्त्वविद्या का यथाशक्ति सेवन करे, और वे आत्मप्रकाश से युक्त होकर योग और पदार्थविज्ञान का अभ्यास करें, तो सिद्धियों को कैसे न प्राप्त हों।” यहाँ यह स्पष्ट है कि योग से तत्त्वविद्या का सेवन एवं योग के साथ पदार्थविज्ञान का अभ्यास, सिद्धियों की प्राप्ति हेतु आवश्यक है। यह पदार्थविज्ञान महाभूतों के विकारों के गुण, कर्म, स्वरूप आदि का क्रियात्मक ज्ञान है। अर्थात् योगी मानसिक स्तर पर संयम द्वारा पदार्थविद्या का साक्षात्कार कर, उस विद्या को क्रियात्मक रूप से पालन करे तो सम्बन्धित सिद्धियों की प्राप्ति सम्भव होगी, अन्यथा नहीं। इस सम्बन्ध में योगसूत्र ३.४५ में भूतजय से होने वाली अणिमा आदि सिद्धियाँ, तथा उन भूतों के धर्मों से योगी की शरीरिक क्रियाओं में बाधा का न होना, विशेष रूप से द्रष्टव्य हैं। अतः यदि योगी पुरुष क्रियात्मक रूप से पदार्थविज्ञान से रहित होगा, तो वह इस प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा।

        इस विषय में योगेश्वर श्री कृष्ण का जीवन भी द्रष्टव्य है। वे स्वयं एक विभूतिसम्पन्न एवं उच्चस्तर के योगी थे, दूसरी ओर वे युद्धविद्या में भी पारांगत थे। उनके पास पदार्थविद्या सिद्ध ब्रह्मास्त्र तक थे, जिनको वे चलाना और वापिस लौटाना भी जानते थे। अगर मात्र योग विभूतियों से ही सभी कुछ सम्भव होता तो उन्हें पदार्थविद्या को सिद्ध करने की क्या आवश्यकता थी ?

        महर्षि दयानन्द सरस्वती से, सन् १८८१ इस्वी में अजमेर प्रवास के समय एक दिन, एक पश्चिमी विज्ञान के एक पण्डित ने योग की सिद्धियों की सत्यता में शंका की। महाराज ने पहले तो युक्ति प्रमाण द्वारा उनकी सत्यता निरुपित की और अन्त में यह कहा कि क्या आप समझते हैं कि हम इतना बड़ा कार्य योगसिद्धि के बिना कर रहे हैं।

        इस सम्बन्ध में, महर्षि दयानन्द सरस्वती की जीवनी में कुछ ऐसी घटनाएँ हैं, जो कुछ विभूतियों को प्रमाणित करती हैं। उनमें से कुछ घटनाओं को सम्बद्ध विभूतियों की व्याख्या में देने का प्रयास किया है। महर्षि दयानन्द की जीवनी का स्वाध्याय करने से यह निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि महर्षि दयानन्द निम्न सिद्धियों = विभूतियों को प्राप्त किए हुए थे —

१.      यम = अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के परिपालन से होने वाली सिद्धियाँ।                                     (योगसूत्र २.३५ - २.३९)

२.      नियम = शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान के परिपालन से होने वाली सिद्धियाँ।                                   (योगसूत्र २.४० - २.४५)

३.      योग के अन्य अंगों = आसन से प्रत्याहार तक के परिपालन से होने वाली सिद्धियाँ।

                        आसन की सिद्धि (योगसूत्र २.४७); 

                        प्राणायाम की सिद्धि (२.५२-५३);

                        प्रत्याहार की सिद्धि (योगसूत्र २.५५)

संयम = धारणा-ध्यान-समाधि से होने वाली सिद्धियाँ —

४.      परिणामत्रय से अतीत अनागत का ज्ञान (३.१६)।

५.     प्रत्यय से परचित्त का ज्ञान (३.१९)।

६.     सोपक्रम-निरुपक्रम कर्म से अपरान्त ज्ञान (३.२२)।

७.     मैत्री आदि बल प्राप्ति (३.२३)।

८.     हस्ति आदि बल प्राप्ति (३.२४)।

९.     ज्योतिष्मती प्रवृत्ति से सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट ज्ञान (३.२५)।

१०.    चन्द्र से ताराव्यूहज्ञान (३.२७)।

११.    ध्रुव से ताराओं की गति का ज्ञान (३.२८)।

१२.    नाभिचक्र से शरीर के व्यूह = स्थितिक्रम का ज्ञान (३.२९)।

१३.    कण्ठकूप से क्षुत्पिपासा निवृत्ति (३.३०)।

१४.    कूर्मनाडी से स्थिरता (३.३१)।

१५.    मूर्धज्योति से सिद्धदर्शन को होना (३.३२)।

१६.    प्रातिभज्ञान से सभी ज्ञानात्मक सिद्धियों का होना (३.३३)।

१७.    हृदय से चित्त का ज्ञान (३.३४)।

१८.    स्वार्थसंयम से पुरुष ज्ञान (३.३५)।

१९.    प्रातिभ, श्रावण, वेदना आदि सिद्धियाँ (३.३६)।

२०.    उदानजय से जल आदि से असंगत्व और मृत्यु समय में उत्क्रान्ति (३.३९)।

२१.    समानजय से शरीरिक तेज की प्राप्ति (३.४०)।

२२.    भूमि से कुछ ऊपर आसनसिद्धि (३.४२)।

२३.    महाविदेहा वृत्ति (३.४३)।

२४.    भूतजय से कायसम्पत् (३.४६)।

२५.    इन्द्रिय जय से होने वाली सिद्धियाँ (३.४८)।

२६.    सत्त्व-पुरुष का भेद ज्ञान एवं सर्वभावाधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व (३.४९)।

२७.    क्षण और उसके क्रम संयम से विवेकजज्ञान (३.५२)।

Preface to Specialized Attainments

            "vibhuti" = Attainments are super and / or subtle powers which are attained by the practice of Yoga. As per dictionary meaning it is prosperity, so by which various type of prosperities are achieved, is called attainment. There is a mention of attainments in Vedas. This word is used in 7 hymns of Rigveda, 3 hymns of Atharvaveda and 1 hymn of Samaveda.

            Swami Dayanand had given the following meanings in his commentary on Rigveda

            vibhutayaH :- Various kind of wealths = prosperities (Rigveda 1.166.11);

                                    Various worldly prosperities = glories (Rigveda 1.8.9);

            vibhutim :-       Eminent glories = prosperities (Rigveda 6.17.4);

            vibhutiH :-       Various prosperities (Rigveda 1.30.5);

            So various and eminent glories = prosperities are called as attainments.

            In the same way other commentators had given the following meanings —

            vibhutiH :-       Giving prosperity or full of prosperity (Samveda 1600);

            vibhutayaH :- Prosperity (Atharvaveda 20.60.5 and 20.71.5);

            vibhutiH :-       Prosperity (Atharvaveda 20.45.2)

            In the same way in Prashana-UpaniShada while replying to devotee Satyakaama, seer Pippalaada said — "sa somaloke vibhutim-anubhuuya punaraavarttate" (Prashana 5.4) i.e. the devotee experience various type of prosperities = glories = pleasures in Somaloka and take birth on the earth again as per his vehicle of actions.

            As per seer Patanjali, devotee achieves various type of attainments = prosperities by performing Sanyama on different subjects / object, which are explained in aphorism 3.16 to 3.51 in this chapter.

            So as per above testimonies attainments are clearly accepted in Vedas and upaniShadas. But "what is the form of attainments?", in this regard various type of misconception are there, due to non-study of Vedas and vedic literature and non-performance of Yoga. After Bhoja, various commentators had propagated false form of attainments on the basis of their little knowledge of Vedic scriptures. With the result the common people, due to their nescience, had accepted the wrong conceptions. Here our effort is to give the true form of various attainments in this commentary, on the basis of Vedas and vedic scriptures.

            The attainments prescribed in this scripture can be divided into two categories — attainments of knowledge and attainments of action.

            1. Attainment of knowledge are those attainments where devotee get specialized knowledge by performing Sanyama on a particular subject or object. The application of knowledge, so achieved, can be used in practical life after attaining that knowledge. Out of the above, knowledge of some attainment is used primarily in the practical life, and in other cases it is used as secondary knowledge.

            2. Attainment of action are those attainments where attainment is related with the practical life of the devotee. Such attainments are achieved and experienced only after complying the practical part of Sanyama, as prescribed.

            Most of attainments explained from aphorism 3.16 to 3.32 are the attainment of knowledge. Wherever there is dominance of action in these attainments, those are to be considered as attainment of action, such as - knowledge of previous life-states in 3.18, disappearance in 3.21, power of friendliness in 3.23, power of elephant in 3.24, and cessation of thrust and hunger in 3.30 are to be considered as attainment of action. The knowledge of Soul takes place in practice only, as explained in 3.35. After the knowledge of Soul there is attainment of pre-science in 3.36 and in this aphorism other attainments of higher hearing, touch, vision, taste and smell are attainments of action only. In the same way the practical part of the following attainments is to be known is the following way —

            3.38                 Entry in the another body;

            3.39                 Remaining contact-less in the places of water, mud, thorn etc;

            3.40                 Effulgence in the body;

            3.41                 Achievement of subtle hearing power;

            3.42                 Movement in sky;

            3.43                 Destruction of veils of knowledge;

            3.44-46                        Manifestation of power of attenuation etc. and perfection of body by                                                mastery over gross elements;

            3.47-48                        Powers of quickness as of mind, un-instrumental perception and                                                       mastery over nature by mastery of sensations;

            3.49                 Becoming the lord of existing substances, and having the real                                                            knowledge of all the objects.

            None of the above attainments can be said as attainment of knowledge; on the other hand there is direct and prime relation with the practical life of the yogi. Experience of attainment of actions cannot be merely explained in words, since these attainments are mainly related with some acts. With regard to experience of these attainments of actions, it not possible to interpret certainly merely on the basis of verbal testimony; and in the same way it is not possible to deny these attainment merely by argument.

            Topic of attainments is started from aphorism 3.16. Seer Patanjali had explained various attainments which are attained by Sanyama over various objects / subjects, and seer Vyaasa had given detailed explanation of these attainments in his commentary. In order to understand the real form and meaning of these attainments the followings are to be kept in mind —

1.         Whatever words are used for the attainment, one should remain strict to those words and their meanings only.

2.         One should not use the conception of "arthaapatti" while explaining the attainment. The conception of arthaapatti is meant to know something which is not directly said. As someone said that "there will be no rain when clouds are not there". From this statement it is also known that it will rain when the clouds will be there in the sky, this is arthaapatti. But it cannot be certainly said that whenever the clouds are there in the sky, then it will rain; since it may or may not rain due to some other atmospherical reasons. The conception of arthaapatti is inferential cognition = perception, as per Philosophy of Nyaaya (aphorism 2.2.2). On the other hand attainments are the subject of direct cognition = perception, and inferential cognition is based on direct cognition. So the devotee who had not done direct cognition of a particular attainment, then use of verbal testimony or inferential cognition, by him, cannot be proper for denial of that attainment. So any commentator who wants to deny any attainment merely basing of his verbal knowledge or inference or want to establish the attainment in other meaning or form, then that type of establishment should not be acceptable as of scriptures. So while explaining the attainments the interpretation should be as per direct cognition, and if experience by direct cognition is not attained in particular subject, then the explanation should be based on the verbal testimony of Vedas and Vedic literature only.

3.         As we have already said in the preface to this book, that we have to understand the philosophy of Yoga, by ignoring the references given in the 18 Puranas which are said to be written by seer Vyaasa, otherwise we will remain in ignorance by accepting the wrong and impossible conceptions in the name of attainments. By giving the meaning basing on the conceptions which are against the principle of Vedas, we will remain away from the real form of attainments. In this regard we believe that the writers of 18 Puranas had imagined impossible history on the various concepts and historical references given by Vyaasa in his commentary, and with the result these references and subjects became popular in that way only. So we have to remain away from the conceptions given in 18 Puranas in this regard. Similarly the commentaries which are based on these scriptures should also be avoided just like the food mixed up with poison.

4.         The knowledge cognized in case of some attainments is not in prospective of this earth, but is in the wider prospective of universe. That should be understood in the same way. Details of such attainments will be given in the respective aphorism.

5.         As per "yogaH chittavritti nirodhaH" 1.2; "tadaa draShTuH svaruupe-avasthaanam" 1.3; and "puruShaarthashuunyaanaam guNaanaam pratiprasavaH kaivalyam svaruupa-pratiShThaa vaa chitishaktiH-iti" 4.34; Yoga is restraint of modifications of mind; thereby the devotee exists in his own form; and position of such achievement is explained in last aphorism 4.34. For attaining the above target there is no importance of any attainment which is achieved by Sanyama on a particular subject / object. Seer Vyaasa had clearly said in aphorism 3.55 that for achieving salvation, it is not necessary to have the attainments of Yoga. Seer Patanjali also said in aphorism 3.37 that the attainments are obstacles to trance. Without bringing the afflictions in the burnt-up seeds state, Soul can exist in his own form. So attainments are not necessary for achieving the ultimate target of salvation. In fact many of the attainments are obstacles to achieve the higher states of Cognitive Trance, and other in Ultra-cognitive Trance.

6.         Swami Dayanand Saraswati had not accepted any type of post-age scripture mixing in the philosophy of Yoga. In this regard the following reference, from his life-story, is to be seen—

Question :- Whether the chapter on attainments of Yoga is correct ?

Answer :- Your doubt without any reason. Philosophy of Yoga is totally correct. It is not an imagination of Puranas, but this philosophy is based on action and experience. (Ref page 343 of Shrimad-dayanand-prakaash)

            So it is not correct to give the reference of books of Swami Dayanand Saraswati in order to prove any attainment as impossible, under check, or otherwise. By giving the reference of books of Swami Dayanand, we are simply denying the principle of Seer Patanjali and Seer Vyaasa. On the other hand Swami Dayanand accepts authority of seers from Brahma to Jaimini, and he accepted Seer Patanjali (author of Yoga Philosophy) and Seer Vyaasa (Commentator of Yoga aphorisms) as totally authentic on the subject. So whether by taking the conceptions of Swami Dayanand, are we not proving the Seer Patanjali and Seer Vyaasa as anti-principle and anti-vedic-philosopher? Are we not indirectly denying the principle of Swami Dayanand that philosophy of Yoga and Vyaasa commentary are totally correct? So this type of conception of commentators is not correct. We are not in a position to understand the principles of our ancient seers. This is our defect, not of those seers who had explained the principles of Yoga on the basis of Vedic knowledge and experience. So in this regard we have to continuously practice the Yoga with faith, energy, memory, trance and discernment and in this way we will also be able to understand and cognize those principles, there is no other way.

7.         There is description of some attainments in Vedas and vedic scriptures; we shall try to give the testimony of these in respective aphorisms.

8.         It is not proper to accept the achievement of attainments in the physical body only, the achievement of these are mainly concerned with the Soul and more primarily with subtle body. So some attainments are not possible in the physical body at all i.e. power of attenuation, enlargement etc. In prashnopaniShada there is a mention of experience of attainments in the next world (Chandraloka). If this is not accepted, then the attainments by birth, as explained in aphorism 4.1 by seer Patanjali, will not be possibile.

            In this regard Swami Dayanand Saraswati very clearly said in Hugali Debate — "sarvaH shthuula iti-anena-ityaadi dehaantaragatasya praapti-tvaat-iti divyayoga deha praapti-tvaat-yogino na tu praakritadehasya maahaatmyam-idam-iti-arthasya jaagaruukatvaat dehaantara." i.e. whatever is achieved by subtle attainment of Yoga, that is possible with that body. It is not possible in normal body of a person who do not perform yoga. In this debate he further said that - " .... the yogi who had attained the power of attenuation etc., he achieves that place (loka) wherever he wishes to go. So when he wants to go to pitriloka, he enjoys there by being existing in that state. Since it is said - "tena pitrilokena maheeyate." Similarly he enjoys by roaming in Brahmaloka etc. as per his wish."

            It is to be understood that such type of roaming is possible by mind, not by physical body. Yogi enjoys the same state in Ultra-cognitive Trance.

9.         Swami Dayanand said, with reference to aphorism 1.35, in Hugali Debate —

            "Nowhere it is written to concentrate on external gross objects, since steadiness of mind cannot take place in the objects with parts. And, if it can take place, the minds of people are involved in the spouse, children, property and other affairs of world, but none of the mind is steady and calm."

            Hence external objects cannot be the subject of concentration as accepted by the commentators of present age. In this regard the real meaning of popular external objects i.e. Sun, Moon and Dhruva will be explained in the respective aphorisms.

10.       There is a conception with regard to attainments of Yoga, that Yogi can achieve these attainments merely on the basis of concentration, meditation and trance of mind, there is no need of any other type of physical activities. This conception is acceptable with regard to attainments of knowledge, but it not proper to accept this with regard to attainments of action. While writing the gist of hymn of Yajurveda 11.2, Swami Dayanand said — "If a man adopts the Yoga and material-science by being tranced in this universe of GOD, and practice the Yoga and material-science with the Illumination of Soul, then how can he not achieve the attainments of Yoga." It is clear from the above that the practice of accessories of Yoga and material science are necessary for achieving the attainments of action. The material science is working knowledge of properties, actions and form of gross objects and its products. It means that if Yogi cognizes the material science by Sanyama in trance, and follows that knowledge in action, then he can achieve the attainments of action, not otherwise. In this regard attainments of powers of attenuation etc. (explained in aphorism 3.45) which are achieved by mastery over gross objects are to be referred. So if the Yogi is not having the capabilities of material science, then he will not be able to achieve such type of attainments.

            In this regard life of Lord Krishna is to be seen. He was having attainments of Yoga, and was a Yogi of highest stage, on the other hand he was perfect in the military science = art of war. He was having the weapons of high proficiency with the power of devastating destruction (named as Brahmaastra) which was based on material science and he was having the knowledge of using it and calling it back also. If everything would have been possible by the attainments of Yoga, then what was need to attain the material science and military science?

            Somebody had questioned Swami Dayanand Saraswati, during his stay at Ajmer, about the truthfulness of attainments of Yoga. Swami Dayanand first given him testimony and logics for the correctness of attainments of Yoga, then in the end he said - "Do you understand that I am doing such big work without the attainments of Yoga."

            In this regard there are some incidents in the life-history of Swami Dayanand Saraswati, which proves some of the attainments. While studying the life-history of Swami Dayanand, we can certainly say that he had achieved the following attainments:-

1.         Attainments by practice of Restraints = non-violence, truthfulness, non-theft, continence, and non-avariciousness. (Yoga aphorism 2.35-2.39)

2.         Attainments by practice of Observances = cleanliness, contentment, purificatory action, study and surrender to GOD. (Yoga aphorism 2.40-2.45)

3.         Attainments with regard to practice of accessories of Posture to Abstraction —

                        Attainment of Posture (2.47);

                        Attainment of Regulation of Breath (2.52-53);

                        Attainment of Abstraction (2.55)

Attainments by performance of Sanyama = concentration, meditation  and trance —

4.         Knowledge of past and future by three-fold changes of an object (3.16);

5.         Knowledge of other's mind by modification of other's mind (3.19);

6.         Knowledge of death by the acts of fast-in-fruition and slow-in-fruition (3.22);

7.         Power of friendliness etc. (3.23);

8.         Power of elephants etc. (3.24);

9.         Subtle, imperceptible and expanded knowledge of mind and objects by light of lucid stage of mind (3.25);

10.       Knowledge of system of organs by Sanyama over mind (3.27);

11.       Knowledge of movement of organs by Sanyama over stable mind (3.28);

12.       Knowledge of system of body by Sanyama over plexus of navel (3.29);

13.       Absence of hunger and thrust by Sanyama over the pit of throat (3.30);

14.       Steadiness by Sanyama on the tortoise tube = nerve (3.31);

15.       Ability to get the knowledge of intellectual attainers (3.32);

16.       Knowledge of all knowable attainments by pre-science (3.33);

17.       Knowledge of mind by Sanyama over heart (3.34);

18.       Knowledge of Soul by Sanyama on the notion of own object (3.35);

19.       Attainments of higher hearing, touch etc. (3.36);

20.       Contact-less-ness in the places of water, mud etc. and ascension at the time of death by mastery over the Udaana (3.39);

21.       Attainment of effulgence by mastery over Samaana (3.40);

22.       Attainment of posture above the earth level (3.42);

23.       Great excorporeal power (3.43);

24.       Perfection of body by mastery over gross elements (3.46);

25.       Attainments of mastery over senses (3.48);

26.       Cognition of distinction between Soul and Mind (3.49); and

27.       Knowledge of born-of-discrimination by Sanyama over moments and their succession (3.52).