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Bhumkia

इस समाधिपाद में योग का लक्षण चित्त की वृत्तियों का निरोध और उसके भेदों का व्याख्यान, अभ्यास और वैराग्य रूप वाले दो उपायों का स्वरूप और भेद को कह कर सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात भेद से योग के मुख्य और अमुख्य = प्रधान और गौण भेद को कहकर, योगाभ्यास के प्रदर्शनपूर्वक विस्तार सहित उपायों = साधनों को दिखलाकर = वर्णन कर सुगम = सरल उपाय दिखलाने के लिए ईश्वर के स्वरूप, प्रमाण, प्रभाव, वाचक = ओ३म् तथा उपासना के स्वरूप को और उसके फल का निर्णय = वर्णन करके, चित्त के व्याधि आदि नौ विक्षेपों को और उनके साथ होने वाले दुःख, दौर्मनस्य आदि का विस्तार के सहित और उसके निषेधक उपाय एक तत्त्व = ईश्वर का अभ्यास करना; चित्त प्रसाद हेतु मैत्री, करुणा आदि, प्राणायाम आदि उपायों को कहकर सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात के पूर्व अङ्ग रूप विषयवती प्रवृत्ति आदि को कहकर = वर्णन करके और उपसंहार द्वारा लक्षण और फल सहित समापत्ति का अपने-अपने विषय के साथ कहकर = वर्णन कर = समापत्तियों के लक्षण, फल और विषय का निरुपण करके सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधियों के उपसंहार को कहकर के सबीज समाधि पूर्वक निर्बीज समाधि को कहा गया। इस प्रकार समाधिपाद का वर्णन किया गया॥