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Yajurveda / 17 / 17

यऽइ॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि॒ जुह्व॒दृषि॒र्होता॒ न्यसी॑दत् पि॒ता नः॑। सऽआ॒शिषा॒ द्रवि॑णमि॒च्छमा॑नः प्रथम॒च्छदव॑राँ॒२ऽआवि॑वेश॥१७॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 17 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : भुवनपुत्रो विश्वकर्मा | देवता : विश्वकर्मा | छन्द : निचृदार्षी त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब ईश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदपाठ : यः। इ॒मा। विश्वा॑। भुव॑नानि। जुह्व॑त्। ऋषिः॑। होता॑। नि। असी॑दत्। पि॒ता। नः॒। सः। आ॒शिषेत्या॒ऽशिषा॑। द्रवि॑णम्। इ॒च्छमा॑नः। प्र॒थ॒म॒च्छदिति॑ प्रथम॒ऽछत्। अव॑रान्। आ। वि॒वे॒श॒॥१७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो! (यः) जो (ऋषिः) ज्ञानस्वरूप (होता) सब पदार्थों को देने वा ग्रहण करनेहारा (नः) हम लोगों का (पिता) रक्षक परमेश्वर (इमा) इन (विश्वा) सब (भुवनानि) लोकों को व्याप्त होके (न्यसीदत्) निरन्तर स्थित है और जो सब लोकों का (जुह्वत्) धारणकर्त्ता है (सः) वह (आशिषा) आशीर्वाद से हमारे लिये (द्रविणम्) धन को (इच्छमानः) चाहता और (प्रथमच्छत्) विस्तृत पदार्थों को आच्छादित करता हुआ (अवरान्) पूर्ण आकाशादि को (आविवेश) अच्छे प्रकार व्याप्त हो रहा है, यह तुम जानो॥१७॥

भावार्थ : सब मनुष्य लोग जो सब जगत् को रचने, धारण करने, पालने तथा विनाश करने और सब जीवों के लिये सब पदार्थों को देने वाला परमेश्वर अपनी व्याप्ति से आकाशादि में व्याप्त हो रहा है, उसी की उपासना करें॥१७॥