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Yajurveda / 24 / 15

उ॒क्ताः स॑ञ्च॒राऽएता॑ऽऐन्द्रा॒ग्नाः कृ॒ष्णा वा॑रु॒णाः पृश्न॑यो मारु॒ताः का॒यास्तू॑प॒राः॥१५॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 24 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिः | देवता : इन्द्रादयः | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : उ॒क्ताः। सं॒च॒रा इति॑ सम्ऽच॒राः। एताः॑। ऐ॒न्द्रा॒ग्नाः। कृ॒ष्णाः। वा॒रु॒णाः। पृश्न॑यः। मा॒रु॒ताः। का॒पाः। तू॒प॒राः॥१५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो! तुम को (एताः) ये (उक्ताः) कहे हुए (सञ्चराः) जो अच्छे प्रकार चलने हारे पशु आदि हैं, वे (ऐन्द्राग्नाः) इन्द्र और अग्नि देवता वाले। जो (कृष्णाः) खींचने वा जोतने हारे हैं, वे (वारुणाः) वरुण देवता वाले और जो (पृश्नयः) चित्र-विचित्र चिह्न युक्त (मारुताः) मनुष्य के से स्वभाव वाले (तूपराः) हिंसक हैं, वे (कायाः) प्रजापति देवता वाले हैं, यह जानना चाहिये॥१५॥

भावार्थ : जो नाना प्रकार के देशों में आने-जाने वाले पशु आदि प्राणी हैं, उनसे मनुष्य यथायोग्य उपकार लेवें॥१५॥