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Yajurveda / 37 / 2

यु॒ञ्जते॒ मन॑ऽउ॒त यु॑ञ्जते॒ धियो॒ विप्रा॒ विप्र॑स्य बृह॒तो वि॑प॒श्चितः॑।वि होत्रा॑ दधे वयुना॒विदेक॒ऽइन्म॒ही दे॒वस्य॑ सवि॒तुः परि॑ष्टुतिः॥२॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 37 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : स्यावाश्वः | देवता : सविता | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब योगाभ्यास का विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

पदपाठ : यु॒ञ्जते॑। मनः॑। उ॒त। यु॒ञ्ज॒ते॒। धियः॑। विप्राः॑। विप्र॑स्य। बृ॒ह॒तः। वि॒प॒श्चित॒ इति॑ विपः॒ऽचितः॑॥ वि। होत्राः॑। द॒धे॒। व॒यु॒ना॒वित्। व॒यु॒न॒विदिति॑ वयुन॒ऽवित्। एकः॑। इत्। म॒ही। दे॒वस्य॑। स॒वि॒तुः। परि॑ष्टुतिः। परि॑स्तुति॒रिति॒ परि॑ऽस्तुतिः॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो! जो (वयुनावित्) उत्कृष्ट ज्ञानों में प्रवीण (एकः) अद्वितीय जगदीश्वर सबको (वि, दधे) रचता (सवितुः) सर्वान्तर्यामी (देवस्य) समग्र जगत् के प्रकाशक ईश्वर की यह (मही) बड़ी (परिष्टुतिः) सब ओर से स्तुति प्रशंसा है (होत्राः) शुभगुणग्रहीता (विप्राः) अनेक प्रकार की बुद्धियों में व्याप्त बुद्धिमान् योगीजन जिस (बृहतः) सबसे बड़े (विपश्चितः) अनन्त विद्यावाले (विप्रस्य) विशेष कर सर्वत्र व्याप्त परमेश्वर के बीच (मनः) संकल्प-विकल्प रूप मन को (युञ्जते) समाहित करते (उत) और (धियः) बुद्धि वा कर्मों को (युञ्जते) युक्त करते हैं, (इत्) उसी की तुम लोग उपासना किया करो॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो! जो योगीजनों को ध्यान करने योग्य, जिसकी प्रशंसा के हेतु सूर्य्य आदि दृष्टान्त वर्त्तमान हैं, जो सर्वज्ञ असहायी सच्चिदानन्दस्वरूप है, जिसके लिये सब धन्यवाद देने योग्य हैं, उसी को इष्टदेव तुम लोग मानो॥२॥