Atharvaveda / 1 / 2 / 2
ज्या॑के॒ परि॑ णो न॒माश्मा॑नं त॒न्वं कृधि। वी॒डुर्वरी॒यो ऽरा॑ती॒रप॒ द्वेषां॒स्या कृ॑धि ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : atharvaa | Devta : chandramaa aura parjany | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : jyaake pari No namaashmaana.m tanva.m kRRidhi. viiDurvariiyo .araatiirapa dveShaa.msyaa kRRidhi . 2.
Component Words : jyaake . pari . naH . nama . ashmaanam . tanvam . kRRidhi .viiDuH . variiyaH . araatiiH . apa . dveShaa.msi . aa . kRRidhi .
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : चन्द्रमा और पर्जन्य | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : बुद्धि की वृद्धि के लिये उपदेश।
पदपाठ : ज्याके । परि॑ । नः॒ । न॒म॒ । अश्मा॑नम् । त॒न्वम् । कृ॒धि॒ ।वी॒डुः । वरी॑यः । अरा॑तीः । अप॑ । द्वेषां॑सि । आ । कृ॒धि॒ ॥
पदार्थ : [हे इन्द्र] (ज्याके) जय के लिये (नः) हमको (परि) सर्वथा (नम) तू झुका, (तन्वम्) [हमारे] शरीर को (अश्मानम्) पत्थर सा [सुदृढ़] (कृधि) बना दे। (वीडुः) तू दृढ़ होकर (अरातीः) विरोधों और (द्वेषांसि) द्वेषों को (अप=अपहृत्य) हटाकर (वरीयः) बहुत दूर (आकृधि) कर दे ॥२॥ अथवा, (ज्याके) दोनों जय के साधनों [मेघ और भूमि] को (नः परि) हमारी ओर (नम) तू झुका। यह अर्थ प्रयुक्त करो ॥"
भावार्थ : परमेश्वर में पूर्ण विश्वास करके मनुष्य आत्मबल और शरीरबल प्राप्त करें और सब विरोधों को मिटावें। सायणाचार्य ने अर्थ किया है कि (ज्याके) हे कुत्सित चिल्ला ! (नः) हमको (परि) छोड़ कर (नम) झुक। हमारी समझ में वह असंगत है, संपूर्ण सूक्त का देवता इन्द्र है ॥
टिप्पणी :२−ज्याके। ज्या जयतेर्वा जिनातेर्वा प्रजावयतीषूनिति वा−निरु० ९।१७ ॥ खजेराकः। उ० ४।१३। इति जि जये-आकप्रत्ययः। निपात्यते च। सप्तम्यधिकरणे च। पा० २।३।३६। अत्र। निमित्तात् कर्मसंयोगे सप्तमी वक्तव्या। वार्तिकम्। इति निमित्ते सप्तमी। जयनिमित्ते=जयार्थम्। यद्वा १।१।३। ज्या-स्वार्थे कन्, टाप् च। जयसाधने [उभे पर्जन्यपृथिव्यौ]−स्त्रियां द्वितीयाद्विवचनम्। परि। परितः सर्वतः। नः। अस्मान्। नम। नमय, प्रह्वीकुरु। अश्मानम्। अशशकिभ्यां छन्दःसि। उ० ४।१४७। इति अशू व्याप्तौ वा अश भोजने−मनिन्। अश्मा मेघनाम−निघ० १।१०। पाषाणं, प्रस्तरवद्, दृढम्। तन्वम्। १।१।१। छन्दसि यण्। उदात्तस्वरितयोर्यणः स्वरितोऽनुदात्तस्य। पा० ८।२।४। इति स्वरितः। तनूम्, शरीरम्। कृधि। डुकृञ् करणे−लोट्। कुरु। वीडुः। भृमृशीङ्०। उ० १।७। इति वील संस्तम्भे−उ, लस्य डः। वीलु बलनाम निघ० २।९। वीलयतिश्च व्रीलयतिश्च संस्तम्भकर्माणौ। निरु० ५।१६। वीड्वी दृढा। वरीयः। प्रियस्थिरेत्यादिना। पा० ६।४।१५७। इति उरु−ईयसुन् वरादेशः। क्रियाविशेषणम्। उरुतरं दूरतरम्। अरातीः। न राति ददाति सुखं स अरातिः शत्रुः। क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।१७४। इति रा दाने-क्तिच्, नञ्समासः। सुपां सुलुक्पूर्वसवर्ण०। पा० ७।१।३९। इति पूर्वसवर्णः। अरातीन् शत्रून्। यद्वा क्तिन् प्रत्ययान्ते, शत्रुभावान्, विरोधान्। अप। अपहृत्य। द्वेषांसि। द्विष अप्रीतौ भावे-असुन्। द्वेषान् आ। ईषदर्थे ॥