Atharvaveda / 1 / 18 / 2
निरर॑णिं सवि॒ता सा॑विषक्प॒दोर्निर्हस्त॑यो॒र्वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। निर॒स्मभ्य॒मनु॑मती॒ ररा॑णा॒ प्रेमां दे॒वा अ॑साविषुः॒ सौभ॑गाय ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 18 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : draviNodaaH | Devta : vinaayakaH | Metre : nichRRijjagatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : niraraNi.m savitaa saaviShakpadornirhastayorvaruNo mitro aryamaa. nirasmabhyamanumatii raraaNaa premaa.m devaa asaaviShuH saubhagaaya . 2.
Component Words : niH. araNim . savitaa . saaviShak . padoH . niH . hastayoH . varuNaH . mitraH . aryamaa . niH . asmabhyam . anu.amatiH . raraaNaa . pra . imaam . devaaH . asaaviShuH . saubhagaaya .
In Hindi:
ऋषि : द्रविणोदाः | देवता : विनायकः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर :
विषय : राजा के लिये धर्म का उपदेश।
पदपाठ : नि:। अर॑णिम् । स॒वि॒ता । सा॒वि॒ष॒क् । प॒दो: । नि: । हस्त॑यो: । वरु॑ण: । मि॒त्र: । अ॒र्य॒मा । नि: । अ॒स्मभ्य॑म् । अनु॑ऽमति: । ररा॑णा । प्र । इ॒माम् । दे॒वा: । अ॒सा॒वि॒षु॒: । सौभ॑गाय ॥
पदार्थ : (सविता) [सबका चलानेहारा] सूर्य [सूर्यरूप तेजस्वी], (वरुणः) सबके चाहनेयोग्य जल [जलसमान शान्तस्वभाव], (मित्रः) चेष्टा देनेहारा वायु [वायु समान वेगवान् उपकारी], (अर्यमा) श्रेष्ठों का मान करनेहारा न्यायकारी राजा (अरणिम्) पीडा को (पदोः) दोनों पदों और (हस्तयोः) दोनों हाथों से (निः) निरन्तर (निः साविषत्) निकाल देवे। (रराणा) दानशीला (अनुमतिः) अनुकूल बुद्धि (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (निः=निः साविषत्) [पीडा को] निकाल देवे, (देवाः) उदार चित्तवाले महात्माओं ने (इमाम्) इस [अनुकूल बुद्धि] को (सौभगाय) बड़े ऐश्वर्य के लिये (प्र असाविषुः) भेजा है ॥२॥"
भावार्थ : मन्त्रोक्त शुभ लक्षणोंवाला राजा और प्रजा परस्पर हितबुद्धि से और शुभचिन्तक महात्माओं के सहाय से क्लेशों का नाश करके सबका ऐश्वर्य बढ़ावें ॥२॥
टिप्पणी :टिप्पणी−सायणभाष्य में (अरणिम्) के स्थान में (अरणीम्) है और बंबई गवर्नमेन्ट के पुस्तक में लिखे] [साविषक्] के स्थान में सायणभाष्य में और अन्य दोनों पुस्तकों में (साविषत्) पद है, वही पाठ हमने रक्खा है। गवर्नमेन्ट पुस्तक में टिप्पणी है कि [साविषक्] शब्द शोधकर लिखा है, परन्तु यह अशुद्ध है, क्योंकि अथर्व० ६।१।३ में, ७।७७।७ में और ९।१५।४। में (सविता साविषत्) पाठ है, वही (सविता साविषत्) यहाँ भी शुद्ध है ॥ २−निर्। म० १। निश्चयेन। नितराम्। बहिर्भावे। अरणिम्। अर्त्तिसृधृ०। उ० २।१०२। ऋ हिंसने−अनि। आर्त्तिम्, पीडाम्। सविता। षूञ् प्रसवे प्रेरणे-तृच्। सर्वस्य प्रसविता=उत्पादकः। निरु० १०।१। सर्वप्रेरकः सूर्यः। निः+साविषत्। षूञ् प्रेरणे-लेट्। निःसुवतु, निःसारयतु। पदोः। पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति पादशब्दस्य पद् आदेशः। पादयोः सकाशात्। हस्तयोः। हसिमृग्रिण्वामि०। उ० ३।८६। इति हस विकाशे-तन्। करयोः सकाशात्। वरुणः। १।३।३। वरणीयं जलम्। मित्रः। १।३।३। सर्वप्रेरको वायुः। अर्यमा। १।११।१। अर्यान् श्रेष्ठान् मिमीते मानयतीति। न्यायकारी राजा। अनुमतिः। अनु+मन ज्ञाने−क्तिन्। सम्मतिः। अनुकूला, सहायिका बुद्धिः। रराणा। रा दाने−कानच्। दानशीला। देवाः। पूज्याः, दातारः। प्र+असाविषुः। षूञ् प्रेरणे−लुङ्। प्रेरितवन्तः, दत्तवन्तः। सौभगाय। प्राणभृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ्। पा० ५।१।१२९। इति सुभग−भावे अञ्। ञ्नित्यादिर्नित्यम्। पा० ६।१।१९७। इति आद्युदात्तः। सुभगत्वाय, शोभनैश्वर्याय ॥