Atharvaveda / 1 / 24 / 2
आ॑सु॒री च॑क्रे प्रथ॒मेदं कि॑लासभेष॒जमि॒दं कि॑लास॒नाश॑नम्। अनी॑नशत्कि॒लासं॒ सरू॑पामकर॒त्त्वच॑म् ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 24 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : brahmaa | Devta : aasurii vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aasurii chakre prathameda.m kilaasabheShajamida.m kilaasanaashanam. aniinashatkilaasa.m saruupaamakarattvacham . 2.
Component Words : aasurii . chakre . prathamaa . idam . kilaasa.abheShajam . idam . kilaasa.anaashanam . aniinashat . kilaasam . sa.aruupaam . akarat . tvacham .
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : आसुरी वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : महारोग के नाश के लिये उपदेश।
पदपाठ : आ॒सुरी । च॒क्रे॒ । प्र॒थ॒मा । इ॒दम् । कि॒ला॒स॒ऽभे॒ष॒जम् । इ॒दम् । कि॒ला॒स॒ऽनाश॑नम् । अनी॑नशत् । कि॒लास॑म् । सऽरू॑पाम् । अ॒क॒र॒त् । त्वच॑म् ॥
पदार्थ : (प्रथमा) प्रथम प्रकट हुई (आसुरी) प्रकाशमय परमेश्वर की माया [बुद्धि वा ज्ञान] ने (इदम्) इस [वस्तु] को (किलासभेषजम्) रूपनाशक महा रोग की ओषधि और (इदम्) इस [वस्तु] को ही (किलासनाशनम्) रूप बिगाड़नेवाले महारोग की नाश करनेहारी (चक्रे) बनाया। [उसने] [ईश्वर माया ने] (किलासम्) रूप बिगाड़नेवाले महारोग को (अनीनशत्) नाश किया और (त्वचम्) त्वचा को (सरूपाम्) सुन्दर रूपवाली (अकरत्) बना दिया ॥२॥"
भावार्थ : (आसुरी) प्रकाशस्वरूप परमेश्वर की शक्ति से प्रलय के पश्चात् अनेक विघ्नों के हटाने पर मनुष्य के सुखदायक पदार्थ उत्पन्न हुए, जिससे पृथिवी पर समृद्धि और क्षुधा आदि रोगों की निवृत्ति हुई ॥२॥
टिप्पणी :२−आसुरी। म० १। प्रकाशमयपरमेश्वरस्य माया प्रज्ञा। चक्रे। म० १। कृतवती। प्रथमा। म० १। आदिभूता। इदम्। प्रसिद्धम्। उपस्थितम्। किलास-भेषजम्। किलासम्। १।२३।१। किल+असु क्षेपणे−अण्। भिषजो वैद्यस्येदमिति अण् निपातनाद् एत्वम् यद्वा, भेषं भयं रोगं जयतीति जि−ड। रुपनाशकस्य महारोगस्य औषधम्। किलास-नाशनम्। कृत्यल्युटो बहुलम्। पा० ३।३।११३। इति किलास+णश अदर्शने−कर्तरि ल्युट्। किलासस्य रूपनाशकस्य महारोगस्य कुष्ठादिकस्य निवर्तकम्। अनीनशत्। णश अदर्शने−णिच्, लुङ्। नाशयति स्म। किलासम्। १।२३।१। वर्णनाशकं महारोगम्। सरूपाम्। ज्योतिर्जनपद०। पा० ६।३।८५। इति समानस्य सभावः। समानरूपाम्। साधुरूपाम्। अकरत्। डुकृञ् करणे लुङ् कृतवती। त्वचम्। १।२३।४। त्वचाम्, शरीरावरणं चर्म ॥