Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 1 / 26 / 2

सखा॒साव॒स्मभ्य॑मस्तु रा॒तिः सखेन्द्रो॒ भगः॑। स॑वि॒ता चि॒त्ररा॑धाः ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : सविता, भग इन्द्रः | छन्द : एकावसाना त्रिपदा साम्नी त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : युद्ध का प्रकरण।

पदपाठ : सखा॑ । अ॒सौ । अ॒स्मभ्य॑म् । अ॒स्तु॒ । रा॒ति: । सखा॑ । इन्द्र॑: । भग॑: । स॒वि॒ता । चि॒त्रऽरा॑धा: ॥

पदार्थ : (असौ) वह (रातिः) दानशील राजा (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (सखा) मित्र (अस्तु) होवे, (भगः) सबका सेवनीय, (सविता) लोकों को चलानेवाले सूर्य के समान प्रतापी, (चित्रराधाः) अद्भुत धनयुक्त (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला (सखा) मित्र (अस्तु) होवे ॥२॥"

भावार्थ : राजा अपनी प्रजा, सेना और कर्मचारियों पर सदा उदारचित्त रहे और सूर्य के समान महाप्रतापी और ऐश्वर्यशाली और महाधनी होकर सबका हितकारी बने और सबकी उन्नति से अपनी उन्नति करे ॥२॥

टिप्पणी :२−सखा। १।२०।४। सुहृत्, मित्रम्। रातिः। क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।१७४। इति रा दाने-क्तिच्। चितः। पा० ६।१।१६३। इति अन्तोदात्तः। उदारः, दाता राजा। इन्द्रः। १।२।३। परमैश्वर्यवान्। भगः। १।१४।१। भज सेवायाम्-घ। घत्वम्। सर्वैर्भजनीयः, सर्वैः सेवनीयः। सविता। १।१८।२। सर्वप्रेरकः। सर्ववशी, सूर्यवत् प्रतापी। त्रिचराधाः। चित्र+राध संसिद्धौ-असुन्। राध इति धननाम राध्नुवन्त्यनेनेति यास्कः−निरु० ४।४। विचित्रधनयुक्तः, अद्भुतधनः ॥