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Atharvaveda / 1 / 29 / 4

अ॑भीव॒र्तो अ॑भिभ॒वः स॑पत्न॒क्षय॑णो म॒णिः। रा॒ष्ट्राय॒ मह्यं॑ बध्यतां स॒पत्ने॑भ्यः परा॒भुवे॑ ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 1 | Sukta : 29 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अभीवर्तमणिः, ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : राजतिलकयज्ञ के लिये उपदेश।

पदपाठ : अ॒भि॒ऽव॒र्त: । अ॒भि॒ऽभ॒व: । स॒प॒त्न॒ऽक्षय॑ण: । म॒णि: । रा॒ष्ट्रा॒य॑ । मह्य॑म् । ब॒ध्य॒ता॒म् । स॒ऽपत्ने॑भ्य: । प॒रा॒ऽभुवे॑ ॥

पदार्थ : (अभिवर्तः) शत्रुओं का जीतनेवाला और (अभिभवः) हरानेवाला और (सपत्नक्षयणः) प्रतिपक्षियों का नाश करनेवाला (मणिः) मणि [प्रशंसनीय सामर्थ्य] रत्न आदि राज्य चिह्न (मह्यम्) मुझपर (राष्ट्राय) राज्य की वृद्धि के लिये और (सपत्नेभ्यः) वैरियों को (पराभुवे) दबाने के लिये (बध्यताम्) बाँधा जावे ॥४॥"

भावार्थ : राज्यलक्ष्मी का प्रभाव जताने के लिये राजा मणि रत्न आदि को धारण करके अपना सामर्थ्य बढ़ावे और राजसभा में राजसिंहासन पर विराजे कि जिससे शत्रुदल भयभीत होकर आज्ञाकारी बने रहें और राज्य में ऐश्वर्य की सदा वृद्धि होवे ॥४॥

टिप्पणी :४−अभिवर्तः। म० १। जयशीलः। अभिभवः। अभि+भू−अप् अभिभविता। सपत्न−क्षयणः। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। पा० ३।१।१३४। इति सपत्नपूर्वात् क्षि क्षये−कर्तरि ल्यु। शत्रूणां क्षयकरः। मणिः। म० १। रत्नम्। प्रशस्तं सामर्थ्यम्। राष्ट्राय। म० १। राज्यवर्धनाय। मह्यम्। मदर्थम्। बध्यताम्। बन्ध बन्धने, कर्मणि लोट्। धार्यताम्। सपत्नेभ्यः। शत्रुभ्यः। पराभुवे। परा+भू−भावे क्विप्। पराभवनाय ॥