Atharvaveda / 2 / 2 / 1
दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वो भुव॑नस्य॒ यस्पति॒रेक॑ ए॒व न॑म॒स्यो॑ वि॒क्ष्वीड्यः॑। तं त्वा॑ यौमि॒ ब्रह्म॑णा दिव्य देव॒ नम॑स्ते अस्तु दि॒वि ते॑ स॒धस्थ॑म् ॥ 1॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 1
In English:
Seer : maatRRinaamaa | Devta : gandharvaapsarasaH | Metre : viraaDjagatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : divyo gandharvo bhuvanasya yaspatireka eva namasyo vikShviiDyaH. ta.m tvaa yaumi brahmaNaa divya deva namaste astu divi te sadhastham . 1.
Component Words : divyaH . gandharvaH . bhuvanasya . yaH . patiH . ekaH . eva . namasya᳡H . vikShu . iiDyaH . tam . tvaa . yaumi . brahmaNaa . divya . deva . namaH . te . astu . divi . te . sadha.astham .2.1.
In Hindi:
ऋषि : मातृनामा | देवता : गन्धर्वाप्सरसः | छन्द : विराड्जगती | स्वर :
विषय : परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है, इसका उपदेश।
पदपाठ : दि॒व्य: । ग॒न्ध॒र्व: । भुव॑नस्य । य: । पति॑: । एक॑: । ए॒व । न॒म॒स्य᳡: । वि॒क्षु । ईड्य॑: । तम् । त्वा॒ । यौ॒मि॒ । ब्रह्म॑णा । दि॒व्य॒ । दे॒व॒ । नम॑: । ते॒ । अ॒स्तु॒ । दि॒वि । ते॒ । स॒धऽस्थ॑म् ॥२.१॥
पदार्थ : (यः) जो तू (दिव्यः) दिव्य [अद्भुतस्वभाव] (गन्धर्वः) गन्धर्व [भूमि, सूर्य, वेदवाणी वा गति का धारण करनेवाला] (भुवनस्य) सब ब्रह्माण्ड का (एकः) एक (एव) ही (पतिः) स्वामी, (विक्षु) सब प्रजाओं [वा मनुष्यों] में (नमस्यः) नमस्कारयोग्य और (ईड्यः) स्तुतियोग्य है। (तम्) उस (त्वा) तुझसे, (दिव्य) हे अद्भुतस्वभाव (देव) जयशील परमेश्वर ! (ब्रह्मणा) वेद द्वारा (यौमि) मैं मिलता हूँ, (ते) तेरे लिये (नमः) नमस्कार (अस्तु) हो, (दिवि) प्रत्येक व्यवहार में (ते) तेरा (सधस्थम्) सहवास है ॥१॥"
भावार्थ : धीर, वीर, ऋषि, मुनि पुरुष उस परम पिता जगदीश्वर की सत्ता को अपने में और प्रत्येक पदार्थ में वैदिकज्ञान की प्राप्ति से साक्षात् करके अभिमान छोड़कर आत्मबल बढ़ाते हुए आनन्द भोगते हैं ॥१॥ १–(गन्धर्व) परमेश्वर का नाम है, देखिये–ऋग्वेद मं० ९ सू० ८३ म० ४ ग॒न्ध॒र्व इ॒त्था प॒दम॑स्य रक्षति॒ पाति॑ दे॒वानां॒ जनि॑मा॒न्यद्भु॑तः। गृ॒भ्णाति॑ रि॒पुं नि॒धया॑ नि॒धाप॑तिः सु॒कृत्त॑मा॒ मधु॑नो भ॒क्षमाशत ॥१॥ (गन्धर्वः) पृथिवी आदि का धारण करनेवाला, गन्धर्व, (इत्था) सत्यपन से (अस्य) इस जगत् की (पदम्) स्थिति की (रक्षति) रक्षा करता है और वह (अद्भुतः) आश्चर्यस्वरूप (देवानाम्) दिव्य गुणवालों के (जनिमानि) जन्मों अर्थात् कुलों की (पाति) चौकसी रखता है। (निधापतिः) पाश [बन्धन] का स्वामी (निधया) पाश से (रिपुम्) वैरी को (गृभ्णाति) पकड़ता है, (सुकृत्तमाः) बड़े-बड़े सुकृती पुण्यात्मा लोगों ने (मधुनः) मधुर रस के (भक्षम्) भोग को (आशत) भोगा है ॥
टिप्पणी :१–दिव्यः। छन्दसि च। पा० ५।१।६७। इति दिव्–यः। दिवं प्रकाशं स्वर्गं वार्हतीति। द्योतनात्मकः। स्वर्गीयः। मनोज्ञः। गन्धर्वः। अ० २।१।२। गो+धृ–व। वाग्भूमिसूर्यस्वर्गाणां धारकः। परमेश्वरः। भुवनस्य। अ० २।१।३। जगतः। नमस्यः। तदर्हति। पा० ५।१।६३। इति नमस्–यत्। तित् स्वरितम्। पा० ६।१।१८५। इति स्वरितत्वम्। नमस्कारयोग्यः। विक्षु। विश प्रवेशने–क्विप्। विशः=मनुष्याः–निघ० २।३। प्रजासु। मनुष्येषु। ईड्यः। ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। इति ईड स्तुतौ–ण्यत्। स्तुत्यः। यौमि। उतो वृद्धिर्लुकि हलि। पा० ७।३।८९। इति यु मिश्रणे–वृद्धिः। संयोजयामि। ब्रह्मणा। अ० १।८।४। वेदज्ञाने। ते। तुभ्यम्। नमःस्वस्तिस्वाहा०। पा० २।३।१६। इति चतुर्थी। अनुदात्तं सर्वमपादादौ। पा० ८।१।१८। इत्यनुदात्तः। दिवि। दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुति०–क्विप्। स्वर्गे। प्रकाशे। व्यवहारे। सधस्थम्। सह तिष्ठन्त्येनेति। सह+ष्ठा गतिनिवृत्तौ–अधिकरणे क प्रत्ययः। सधमाधस्थयोश्छन्दसि। पा० ६।३।९६। इति सहस्य सधादेशः। सहस्थानम्। निवासस्थानम्। अन्यत् सुगमं व्याख्यातं च ॥