Atharvaveda / 2 / 10 / 5
तासु॑ त्वा॒न्तर्ज॒रस्या द॒धामि॒ प्र यक्ष्म॑ एतु॒ निरृ॑तिः परा॒चैः। ए॒वाहं त्वां क्षे॑त्रि॒यान्निरृ॑त्या जामिशं॒साद्द्रु॒हो मु॑ञ्चामि॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॑त्। अ॑ना॒गसं॒ ब्रह्म॑णा त्वा कृणोमि शि॒वे ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी उ॒भे स्ता॑म् ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : bhRRigva~NgiraaH | Devta : suuryaH | Metre : saptaapadaa dhRRitiH | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : taasu tvaantarjarasyaa dadhaami pra yakShma etu nirRRitiH paraachaiH. evaaha.m tvaa.m kShetriyaannirRRityaa jaamisha.msaaddruho mu~nchaami varuNasya paashaat. anaagasa.m brahmaNaa tvaa kRRiNomi shive te dyaavaapRRithivii ubhe staam . 5.
Component Words : taasu . tvaa . antaH. jarasi . aa . dadhaami . pra . yakShmaH . etu . niHRRitiH. paraachaiH . eva . aham . tvaam . kShetriyaat . niHRRityaaH . jaami.asha.msaat . druhaH . mu~nchaami . varuNasya . paashaat . anaagasam . brahmaNaa . tvaa . kRRiNomi . shive iti . te . dyaavaapRRithivii iti . ubhe iti . staam .10.5.
In Hindi:
ऋषि : भृग्वङ्गिराः | देवता : सूर्यः | छन्द : सप्तापदा धृतिः | स्वर :
विषय : मुक्ति की प्राप्ति के लिये उपदेश।
पदपाठ : तासु॑ । त्वा॒ । अ॒न्त:। ज॒रसि॑ । आ । द॒धा॒मि॒ । प्र । यक्ष्म॑: । ए॒तु॒ । नि:ऋ॑ति:। प॒रा॒चै: । ए॒व । अ॒हम् । त्वाम् । क्षे॒त्रि॒यात् । नि:ऋ॑त्या: । जा॒मि॒ऽशं॒सात् । द्रु॒ह: । मु॒ञ्चा॒मि॒ । वरु॑णस्य । पाशा॑त् । अ॒ना॒गस॑म् । ब्रह्म॑णा । त्वा॒ । कृ॒णो॒मि॒ । शि॒वे इति॑ । ते॒ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । उ॒भे इति॑ । स्ता॒म् ॥१०.५॥
पदार्थ : (तासु) उन [दिशाओं] में (त्वा) तुझको (जरसि) स्तुति के (अन्तः) मध्य में (आ) भले प्रकार से (दधामि) धारण करता हूँ, (यक्ष्मः) राज रोग [क्षय आदि] और (निर्ऋतिः) अलक्ष्मी [महामारी दरिद्रता आदि] भी (पराचैः) ओंधे मुँह होकर (प्र+एतु) चली जावे। (एव) ऐसे ही (अहम्) मैं (त्वाम्) तुझको (क्षेत्रियात्) शारीरिक वा वंशागत रोग से, (निर्ऋत्याः) अलक्ष्मी [महामारी दरिद्रता आदि] से, (जामिशंसात्) भक्षणशील मूर्ख के सताने से, (द्रुहः) द्रोह [अनिष्ट चिन्ता] से और (वरुणस्य) दुष्कर्मों से रोकनेवाले न्यायाधीश के (पाशात्) दण्डपाश वा बन्ध से (मुञ्चामि) मैं छुड़ाता हूँ। (ब्रह्मणा) वेदज्ञान से (त्वा) तुमको (अनागसम्) निर्दोष (कृणोमि) करता हूँ, (ते) तेरेलिये (उभे) दोनों (द्यावापृथिवी=०–व्यौ) आकाश और पृथिवी (शिवे) मङ्गलमय (स्ताम्) होवें ॥५॥"
भावार्थ : मनुष्य को परमेश्वर ने सब प्राणियों में श्रेष्ठ बनाया है, इसलिये पुरुष पुरुषार्थ करके सब विघ्नों को हटावे और कीर्त्तिमान् होकर सदा आनन्द भोगे और अमर होवे ॥५॥
टिप्पणी :टिप्पणी–हमारे विचार में यहाँ भी (जरस्) पद का अर्थ निघण्टु और निरुक्त आदि के अनुसार स्तुति वा कीर्त्ति है [बुढ़ापे का अर्थ बेमेल है]। अथर्ववेद १।३०।२। और टिप्पणी देखिये और यजु० ३६।२४। भी विचारिये। तच्चक्षु॑र्देवहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रदः॑ शतं जीवेम श॒रदः॑ शत॒ शृणु॑याम श॒रदः श॒तं प्रब्रवाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः श॒तात् ॥१॥ (तत्) परब्रह्म (चक्षुः) सबका द्रष्टा, (देवहितम्) विद्वान् देवताओं का हितकारी, (शुक्रम्) वीर्यवान्, (पुरस्तात्) पहिले काल से वा सन्मुख होकर (उच्चरत्) ऊँचा चढ़ रहा है। [ऐसा ध्यान करते हुए] (शतम् शरदः) सौ शरद् ऋतु वा वर्ष तक (पश्येम) हम देखते रहें, (शतम् शरदः) सौ वर्ष तक (जीवेम) हम जीते रहें, (शतम् शरदः) सौ वर्ष तक (शृणुयाम) हम सुनते रहें, (शतम् शरदः) सौ वर्ष तक (प्रब्रवाम) हम बोलते रहें, (शतम् शरदः) सौ वर्ष तक (अदीनाः) दीनतारहित (स्याम) हम रहें, (च) और (शतात् शरदः) सौ वर्ष से (भूयः) अधिक। अर्थात् हम सर्वथा पुष्टाङ्ग रहें और कभी अङ्गहीन और धनहीन न हों ॥ ५–तासु। पूर्वोक्तासु दिक्षु। त्वा। त्वां मनुष्यम्। आत्मानम्। अन्तर्। मध्ये। जरसि। १।३०।२। जॄ स्तुतौ, यद्वा, गॄ शब्दे–असुन्। जरिता स्तोतृनाम–निघ० ३।१६। स्तुतौ। यशसि। आ। सम्यक्। यथाविधि। दधामि। अहं मनुष्यः स्वपौरुषेण धारयाम्यात्मानमित्यर्थः। यक्ष्मः। अर्त्तिस्तुसुहु०। उ० १।१४०। इति यक्ष पूजायाम्–मन्। पूज्यते वैद्यो रोगे। राजरोगः। क्षयः। प्र+एतु। प्रैतु। प्रगच्छतु। निर्गच्छतु। निर्ऋतिः। म० १। अलक्ष्मीः। दरिद्रतादिविपत्तिः। पराचैः। नौ दीर्घश्च। उ० ५।१३। इति बाहुलकात्, पर+चिञ् चयने–डैसि। अकारस्य दीर्घश्च। पराङ्मुखी ॥