Atharvaveda / 2 / 15 / 2
यथाह॑श्च॒ रात्री॑ च॒ न बि॑भी॒तो न रिष्य॑तः। ए॒वा मे॑ प्राण॒ मा बि॑भेः ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : brahmaa | Devta : praaNaH, apaanaH, aayuH | Metre : tripaadgaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yathaahashcha raatrii cha na bibhiito na riShyataH. evaa me praaNa maa bibheH . 2.
Component Words : yathaa . ahaH . cha . raatrii . cha . na . bibhiitaH . na . riShyataH . eva . me . praaNa . maa . bibheH .15.2.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : प्राणः, अपानः, आयुः | छन्द : त्रिपाद्गायत्री | स्वर :
विषय : मनुष्य धर्म के पालन में निर्भय रहे।
पदपाठ : यथा॑ । अह॑: । च॒ । रात्री॑ । च॒ । न । बि॒भी॒त: । न । रिष्य॑त: । ए॒व । मे॒ । प्रा॒ण॒ । मा । बि॒भे॒: ॥१५.२॥
पदार्थ : (यथा) जैसे (च) निश्चय करके (अहः) दिन (च) और (रात्री) रात दोनों (न) न (रिष्यतः) दुःख देते हैं और (न) न (बिभीतः) डरते हैं, (एव) वैसे ही (मे) मेरे (प्राण) प्राण ! तू (मा बिभेः) मत डर ॥२॥"
भावार्थ : जो मनुष्य अपने कालप्रयोग में नहीं चूकते, वे अपने सुप्रबन्ध से सदा निर्भय रहते हैं ॥२॥
टिप्पणी :२–अहः। नञि जहातेः। उ० १।१५८। इति नञ्+ओहाक् त्यागे–कनिन्। न जहाति न त्यजति सर्वथा परिवर्त्तमानत्वात् तद् अहः। दिनम्। रात्री। अ० २।८।२। रात्रिः कस्मात् प्ररमयति भूतानि नक्तञ्चारीण्युपरमयतीतराणि ध्रुवीकरोति रातेर्वा स्याद् दानकर्मणः प्रदीयन्तेऽस्यामवश्यायाः, निरु० २।१८। क्षपा। निशा ॥