Atharvaveda / 2 / 20 / 3
वायो॒ यत्ते॒ ऽर्चिस्तेन॒ तं प्रत्य॑र्च॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 20 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : atharvaa | Devta : vaayuH | Metre : ekaavasaanaanichRRidviShamaatripaadgaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : vaayo yatte .archistena ta.m pratyarcha yo3 .asmaandveShTi ya.m vaya.m dviShmaH . 3.
Component Words : vaayo iti . yat . te . archiH . tena . tam . prati . archa . yaH . asmaan . dveShTi . yam . vayam . dviShmaH .20.3.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : वायुः | छन्द : एकावसानानिचृद्विषमात्रिपाद्गायत्री | स्वर :
विषय : कुप्रयोग के त्याग के लिये उपदेश।
पदपाठ : वायो॒ इति॑ । यत् । ते॒ । अ॒र्चि: । तेन॑ । तम् । प्रति॑ । अ॒र्च॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: ॥२०.३॥
पदार्थ : (वायो) हे पवन [पवन तत्त्व] (यत्) जो (ते) तेरी (अर्चिः) दीपनशक्ति है, (तेन) उससे (तम् प्रति) उस [दोष] पर (अर्च) प्रदीप्त हो (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करता है, [अथवा] (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करते हैं ॥३॥"
भावार्थ : कुप्रयोग से वायु तत्त्व दुःख देता और सुप्रयोग से आनन्द बढ़ाता है। सू० १९ म० १ देखें ॥१॥
टिप्पणी :३–वायो। कृवापाजिमि०। उ० १।१। इति वा गतिगन्धनयोः–उण्। आतो युक् चिण्कृतोः। पा० ७।३।३३। इति युक्। वायुर्वातेर्वेतेर्वा स्याद् गतिकर्मणः–निरु० १०।१। हे पवन ! अन्यद् गतम्, सू० १९ ॥ २, ३, ४, ५–उपरि व्याख्याताः ॥