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Atharvaveda / 2 / 22 / 2

चन्द्र॒ यत्ते॒ हर॒स्तेन॒ तं प्रति॑ हर॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 22 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : चन्द्रः | छन्द : एकावसानानिचृद्विषमात्रिपाद्गायत्री | स्वर :

विषय : कुप्रयोग के त्याग के लिये उपदेश।

पदपाठ : चन्द्र॑ । यत् । ते॒ । हर॑: । तेन॑ । तम् । प्रति॑ । ह॒र॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: ॥२२.२॥

पदार्थ : (चन्द्र) हे चन्द्र [चन्द्रलोक !] (यत्) जो (ते) तेरी (हरः) नाशनशक्ति है, (तेन) उससे (तम्) उस [दोष] का (प्रति हर) नाश कर डाल, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करे, (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करें ॥२॥"

भावार्थ : शीतलस्वभाव चन्द्रमा स्वभावतः अपनी किरणों से अनिष्टों को हटाकर अन्न आदि ओषधियों को पुष्ट करके प्राणियों को आनन्द देता है। परन्तु उसी चन्द्रमा के कुप्रयोग से मनुष्य पागल [Lunatic] और घोड़े आदि पशु रोगी हो जाते हैं। इस कुप्रयोग का त्याग करके सुप्रयोग से आनन्द प्राप्त करना चाहिये ॥१॥