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Atharvaveda / 2 / 24 / 4

सर्पानु॑सर्प॒ पुन॑र्वो यन्तु या॒तवः॒ पुन॑र्हे॒तिः कि॑मीदिनः। यस्य॒ स्थ तम॑त्त॒ यो वः॒ प्राहै॒त्तम॑त्त॒ स्वा मां॒सान्य॑त्त ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 24 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : आयुः | छन्द : वैराजपरा पञ्चपदा पथ्यापङ्क्तिः, निचृत्पुरोदेवत्यापङ्क्तिः | स्वर :

विषय : म० १–४ कुसंस्कारों के और ५–८ कुवासनाओं के नाश का उपदेश।

पदपाठ : सर्प॑ । अनु॑ऽसर्प । पुन॑: । व॒: । य॒न्तु॒ । या॒तव॑: । पुन॑: । हे॒ति: । कि॒मी॒दि॒न: । यस्य॑ । स्थ । तम् । अ॒त्त॒ । य: । व॒: । प्र॒ऽअहै॑त् । तम् । अ॒त्त॒ । स्वा । मां॒सानि॑ । अ॒त्त॒ ॥२४.४॥

पदार्थ : (सर्प) अरे साँप [क्रूरस्वभाव !] (अनुसर्प) अरे साँपों के साथी ! (किमीदिनः) अरे तुम लुतरे लोगों ! (वः) तुम्हारी (यातवः) पीड़ाएँ और (हेतिः) चोट (पुनः-पुनः) लौट-लौट कर (यन्तु) चली जावें। तुम (यस्य) जिसके [साथी] (स्थ) हो, (तम्) उस [पुरुष] को (अत्त) खाओ, (यः) जिस [पुरुष] ने (वः) तुमको (प्राहैत्=प्राहैषीत्) भेजा है, (तम्) उसको (अत्त) खाओ, (स्वा=स्वानि) अपने ही (मांसानि) माँस की बोटियाँ (अत्त) खाओ ॥४॥"

भावार्थ : जैसे नीतिनिपुण राजा अपने बुद्धिबल से ऐसा प्रबन्ध करता है कि शत्रु जो कुछ छल-बल करे, वह उसी को ही उलटा दुःखदायी हो और उसके मनुष्य उसकी कुनीतियों को जानकर उसका ही नाश कर दें और वे लोग आपस में विरोध करके परस्पर मार डालें। इसी प्रकार आत्मजिज्ञासु पुरुष अपने शरीर और आत्मा की निर्बलता और दोषों और उनसे उत्पन्न दुष्ट फलों को समझकर बुद्धिपूर्वक उन्हें एक-एक करके नाश कर दे और जितेन्द्रिय होकर आनन्द भोगे ॥१॥ सायणभाष्य में (स्वा) पद के स्थान में (सा) पद है और उसका अर्थ [तस्य शत्रोः यद्वा सा हेतिः] ऐसा किया है, हमारी समझ में बहुवचनान्त (स्वा) पद ही ठीक है ॥ इस सूक्त के पहिले चार मन्त्रों में पुंल्लिङ्ग शब्दों का और पिछले पाँच मन्त्रों में स्त्रीलिङ्गों का संबोधन है ॥

टिप्पणी :४–सर्प–सृप्लृ गतौ पचाद्यच्। सर्पति इतस्ततो गच्छतीति सर्पः। हे हिंस्रजन्तुविशेष ! तद्वत् क्रूरस्वभाव पुरुष ! अनुसर्प। सर्पान् अनुसृत्य सह व्याप्य गच्छतीति अनुसर्पः। हे सर्पानुसारिन्। हिंस्रसहायक ॥