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Atharvaveda / 2 / 24 / 6

उप॑ब्दे॒ पुन॑र्वो यन्तु या॒तवः॒ पुन॑र्हे॒तिः कि॑मीदिनीः। यस्य॒ स्थ तम॑त्त॒ यो वः॒ प्राहै॒त्तम॑त्त॒ स्वा मां॒सान्य॑त्त ॥ 6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 24 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : आयुः | छन्द : चतुष्पदा भुरिग्बृहती | स्वर :

विषय : म० १–४ कुसंस्कारों के और ५–८ कुवासनाओं के नाश का उपदेश।

पदपाठ : उप॑ब्दे । पुन॑: । व॒: । य॒न्तु॒ । या॒तव॑: । पुन॑: । हे॒ति: । कि॒मी॒दि॒नी॒: । यस्य॑ । स्थ । तम् । अ॒त्त॒ । य: । व॒: । प्र॒ऽअहै॑त् । तम् । अ॒त्त॒ । स्वा । मां॒सानि॑ । अ॒त्त॒ ॥२४.६॥

पदार्थ : (उपब्दे) अरी चिंघारनेवाली ! और (किमीदिनीः=०–न्यः) अरी तुम लुतरियों ! [कुवासनाओं !] (वः) तुम्हारी (यातवः) पीड़ाएँ और (हेतिः) चोट (पुनः-पुनः) लौट-लौट कर (यन्तु) चली जावें। तुम (यस्य) जिसके [साथी] (स्थ) हो, (तम्) उस [पुरुष] को (अत्त) खाओ, (यः) जिस [पुरुष] ने (वः) तुमको (प्राहैत्=प्राहैषीत्) भेजा है, (तम्) उसको (अत्त) खाओ, (स्वा=स्वानि) अपने ही (मांसानि) माँस की बोटियाँ (अत्त) खाओ ॥६॥"

भावार्थ : कुवासनाओं और कुचिन्ताओं से मनुष्य कठोरवादी हो जाता है ॥६॥

टिप्पणी :६–उपब्दे। सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति उपपूर्वात् पद गतौ, वा वद वाचि–इन्। यद्वा, कृत्यल्युटो बहुलम्। पा० ३।३।१३३। इति बहुलवचनात्। उपसर्गे घोः किः। पा० ३।३।९२। इति अवखण्डने–कि। पृषोदरादित्वाद् रूपसिद्धिः। उपब्दिः, वाङ्नाम–निघ० १।११। उपेत्य द्यति खण्डयतीति। हे क्रूरशब्दकारिणि ॥