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Atharvaveda / 2 / 25 / 2

सह॑माने॒यं प्र॑थ॒मा पृ॑श्निप॒र्ण्य॑जायत। तया॒हं दु॒र्णाम्नां॒ शिरो॑ वृ॒श्चामि॑ श॒कुने॑रिव ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 25 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : चातनः | देवता : वनस्पतिः पृश्नपर्णी | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : शत्रुओं के नाश के लिये उपदेश।

पदपाठ : सह॑माना । इ॒यम् । प्र॒थ॒मा । पृ॒श्नि॒ऽप॒र्णी । अ॒जा॒य॒त॒ । तया॑ । अ॒हम् । दु॒:ऽनाम्ना॑म् । शिर॑: । वृ॒श्चा॒मि॒ । श॒कुने॑:ऽइव ॥२५.२॥

पदार्थ : (सहमाना) जीतनेवाली (इयम्) यह (पृश्निपर्णी) सूर्य वा पृथिवी की पालनेवाली [अथवा, सूर्य वा पृथिवी जैसे पत्तेवाली ओषधिरूप परमेश्वरशक्ति] (प्रथमा) सबसे पहिले (अजायत) प्रकट हुयी है। (तया) उस [शक्ति] से (अहम्) मैं (दुर्नाम्नाम्) बुरे नामवाले दोषों के (शिरः) शिर को (वृश्चामि) तोड़ डालूँ, (इव) जैसे (शकुनेः) पक्षी के [शिर के तोड़ डालते हैं] ॥२॥"

भावार्थ : मनुष्य आदिकारण परमेश्वर के विश्वास पर अपना शारीरिक और आत्मिकबल बढ़ाकर अपने शत्रुओं और दोषों का नाश करके आनन्द भोगे ॥२॥

टिप्पणी :टिप्पणी–(दुर्नाम) शब्दकल्पद्रुमकोष में (अर्श) अर्थात् बवासीर रोग का भी नाम है ॥ २–सहमाना। सहिर् अभिभवे–शानच्। दोषान् अभिभवन्ती। इयम्। समीपवर्त्तिनी प्रश्निपर्णी। प्रथमा। प्रथेरमच्। उ० ५।६८। इति प्रथ ख्यातौ–अमच्, टाप्। प्रख्याता। मुख्या। सृष्टेः प्राग्भवा। पृश्निपर्णी। म० १। अजायत। जनी प्रादुर्भावे–लङ्। ज्ञाजनोर्जा पा० ७।३।७९। इति जा इत्यादेशः। प्रादुरभवत्। दुर्णाम्नाम्। दुर्दुष्टं निन्दितं नाम येषाम्। दुष्टदोषाणाम्। दुर्नाम, अर्शो रोगः–इति शब्दकल्पद्रुमे। शिरः। श्रयतेः स्वाङ्गे शिरः किच्व। उ० ४।१९४। इति शृञ् सेवने–असुन्, स च कित्, धातोः शिरादेशश्च। मस्तकम्। वृश्चामि। व्रश्चू छेदे। छिनद्मि। शकुनेरिव। शकेरुनोन्तोन्त्युनयः। उ० ३।४९। इति शक्लृ शक्तौ–उनि। यथा पक्षिणः शिरः खङ्गादिकं विनापि छिद्यते ॥