Atharvaveda / 2 / 27 / 2
सु॑प॒र्णस्त्वान्व॑विन्दत्सूक॒रस्त्वा॑खनन्न॒सा। प्राशं॒ प्रति॑प्राशो जह्यर॒सान्कृ॑ण्वोषधे ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 27 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : kapi~njalaH | Devta : oShadhiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : suparNastvaanvavindatsuukarastvaakhanannasaa. praasha.m pratipraasho jahyarasaankRRiNvoShadhe . 2.
Component Words : su.aparNaH . tvaa . anu . avindat . suukaraH . tvaa . akhanat . nasaa . praasham . prati.apraashaH . jahi . arasaan . kRRiNu . oShadhe .27.2.
In Hindi:
ऋषि : कपिञ्जलः | देवता : ओषधिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : बुद्धि से विवाद करे, इसका उपदेश।
पदपाठ : सु॒ऽप॒र्ण: । त्वा॒ । अनु॑ । अ॒वि॒न्द॒त् । सू॒क॒र: । त्वा॒ । अ॒ख॒न॒त् । न॒सा । प्राश॑म् । प्रति॑ऽप्राश: । ज॒हि॒ । अ॒र॒सान् । कृ॒णु॒ । ओ॒ष॒धे॒ ॥२७.२॥
पदार्थ : (सुपर्णः) सुन्दर पक्षवाले [गरुड़, गिद्ध आदि पक्षी के समान दूरदर्शी पुरुष] ने (त्या) तुझको (अनु=अन्विष्य) ढूँढकर (अविन्दत्) पाया है, (सूकरः) सूकर [सूअर पशु के समान तीव्रबुद्धि और बलवान् पुरुष] ने (त्वा) तुझको (नसा) नासिका से (अखनत्) खोदा है। (प्राशम्) मुझ प्रश्नकर्त्ता के (प्रतिप्राशः) प्रतिवादियों को (जहि) मिटा दे, (ओषधे) हे ताप को पी लेनेवाली [ओषधि के समान बुद्धि ! उन सबको] (अरसान्) फींका (कृणु) कर ॥२॥"
भावार्थ : (सुपर्णः) गिद्ध, मोर आदि पक्षी बड़े तीव्रदृष्टि होते हैं और सूकर एक बलवान् पशु अपनी नासिका से अपने खाद्य तृण को पृथिवी में से खोदकर खा जाता है। इसी प्रकार दूरदर्शी, परिश्रमी और बलवान् पुरुष बुद्धि की महिमा को साक्षात् करके यथायोग्य उसका प्रयोग करते हैं और सदा जय पाते हैं ॥२॥
टिप्पणी :२–सुपर्णः। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० २।६। इति सु+पॄ पालनपूरणयोः–न, यद्वा। पत गतौ–न प्रत्ययः, तकारस्य रेफः। सुपतनः शोभनगमनः। शीघ्रगामी। गरुडः। पक्षिमात्रम्। अनु। अन्विष्य। अविन्दत्। विद्लृ लाभे लङ्। शे मुचादीनाम्। पा० ७।१।५९। इति नुम्। अलभत। सूकरः। ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति सु+कृ विक्षेपे, वा कृञ् हिंसायाम्। वा कॄङ् विज्ञाने–अप्। अथवा, ट प्रत्ययः। उकारस्य दीर्घः। अथवा, सू इति शब्दं करोति, सू+कृ–टः। सुकिरति भूमिं सुकृणाति मनुष्यान् यद्वा सुकारयते विजानाति खाद्यपदार्थान्। वराहः। अखनत्। खनु विदारे–लङ्। विदारितवान्। उद्धृतवान्। नसा। णसङ् कौटिल्ये–क्विप्। नासिकया ॥