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Atharvaveda / 2 / 32 / 2

वि॒श्वरू॑पं चतुर॒क्षं क्रिमिं॑ सा॒रङ्ग॒मर्जु॑नम्। शृ॒णाम्य॑स्य पृ॒ष्टीरपि॑ वृश्चामि॒ यच्छिरः॑ ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 32 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : काण्वः | देवता : आदित्यगणः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : कीड़ों के समान दोषों का नाश करे, इसका उपदेश।

पदपाठ : वि॒श्वऽरू॑पम् । च॒तु॒:ऽअ॒क्षम् । क्रिमि॑म् । सा॒रङ्ग॑म् । अर्जु॑नम् । शृ॒णामि॑ । अ॒स्य॒ । पृ॒ष्टी: । अपि॑ । वृ॒श्चा॒मि॒ । यत् । शिर॑: ॥३२.२॥

पदार्थ : (विश्वरूपम्) नाना आकारवाले (चतुरक्षम्) [चार दिशाओं में] नेत्रवाले, (सारङ्गम्) रींगनेवाले [वा चितकबरे] और (अर्जुनम्) संचयशील [वा श्वेतवर्ण] (क्रिमिम्) कीड़े को (शृणामि) मैं मारता हूँ, (अस्य) इसकी (पृष्टीः) पसलियों को (अपि) भी और (यत्) जो (शिरः) शिर है [उसको भी] (वृश्चामि) तोड़े डालता हूँ ॥२॥"

भावार्थ : पृथिवी और अन्तरिक्ष के नाना आकार और नाना वर्णवाले मकड़ी माँखी आदि क्षुद्र जन्तुओं को शुद्धि आदि द्वारा पृथक् रखने से शरीर स्वस्थ रहता है, इसी प्रकार आत्मिक दोषों की निवृत्ति से आत्मिक शान्ति होती है ॥२॥

टिप्पणी :टिप्पणी–(चतुरक्ष) चार आँखवाला–ऐसा प्रयोग वेद में अन्यत्र भी आया है, वहाँ भी चारों दिशाओं का ही ग्रहण है ॥ क॒श्यप॑स्य॒ चक्षु॑रसि शकु॒न्याश्च॑तुर॒क्ष्याः ॥१॥ अथर्ववेद ४।२०।७। [और ऋ० १०।१४।१०, ११ भी देखिये।] तू (कश्यपस्य) सूर्य की और (चतुरक्ष्याः) चार आँखवाली (शकुन्याः) व्याप्तिवाली दिशा की (चक्षुः) आँख है ॥ २–विश्वरूपम्। नानाकारम्। चतुरक्षम्। बहुव्रीहौ। सक्थ्यक्ष्णिः स्वाङ्गात् षच्। पा० ५।४।११३। इति षच्। चतुर्नेत्रम्। चतुर्दिक्षु नेत्रयुक्तम्। सारङ्गम्। सृवृञोर्वृद्धिश्च। उ० १।१२२। इति सृ गतौ–अङ्गच्, धातोर्वृद्धिश्च। सरणशीलम्। शबलवर्णम्। अर्जुनम्। अर्जेर्णिलुक् च। उ० ३।५८। इति अर्ज सम्पादने–उनन्। संचयशीलम्। श्वेतवर्णम्। शृणामि। शॄ हिंसायाम्। हन्मि। पृष्टीः। अ० २।७।५। पार्श्वस्थीनि। वृश्चामि। छिनद्मि। शिरः। अ० २।२५।२। मस्तकम् ॥