Atharvaveda / 3 / 2 / 4
व्या॑कूतय एषामि॒ताथो॑ चि॒त्तानि॑ मुह्यत। अथो॒ यद॒द्यैषां॑ हृ॒दि तदे॑षां॒ परि॒ निर्ज॑हि ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : atharvaa | Devta : indraH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : vyaakuutaya eShaamitaatho chittaani muhyata. atho yadadyaiShaa.m hRRidi tadeShaa.m pari nirjahi . 4.
Component Words : vi . aa.akuutayaH . eShaam . ita . atho iti . chittaani . muhyata . atho iti . yat . adya . eShaam . hRRidi . tat . eShaam . pari . niH . jahi .2.4.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।
पदपाठ : वि । आ॒ऽकू॒त॒य॒: । ए॒षा॒म् । इ॒त॒ । अथो॒ इति॑ । चि॒त्तानि॑ । मु॒ह्य॒त॒ । अथो॒ इति॑ । यत् । अ॒द्य । ए॒षा॒म् । हृ॒दि । तत् । ए॒षा॒म् । परि॑ । नि: । ज॒हि॒ ॥२.४॥
पदार्थ : हे (एषाम्) इन [शत्रुओं] के (आकूतयः) विचारो ! (वि) उलट-पलट होकर (इत) चले जाओ, (अथो) और हे (चित्तानि) इनके चित्तो ! (मुह्यत) व्याकुल हो जाओ। (अथो) और [हे राजन्] (यत्) जो कुछ [मनोरथ] (अद्य) अब (एषाम्) इनके (हृदि) हृदय में है, (एषाम्) इनके (तत्) उस [मनोरथ] को (परि) सर्वथा (निर्जहि) नाश कर दे ॥४॥ "
भावार्थ : नीतिकुशल राजा दुराचारियों में परस्पर मतभेद करा दे और उनका मनोरथ सिद्ध न होने दे ॥४॥
टिप्पणी :४−(आकूतयः)। म० ३। हे सङ्कल्पाः। मनोरथाः। (एषाम्)। शत्रूणाम्। (वि, इत्)। विरोधेन गच्छत। (अथो)। अपि च। (चित्तानि)। मनांसि। (मुह्यत)। व्याकुलानि भवत। (यत्)। प्रयोजनम्। (अद्य)। इदानीम्। (हृदि)। मनसि। (तत्)। प्रयोजनम्। (परि)। परितः। सर्वतः। (निः)। नितराम्। (जहि)। नाशय ॥