Atharvaveda / 3 / 4 / 4
अ॒श्विना॒ त्वाग्रे॑ मि॒त्रावरु॑णो॒भा विश्वे दे॒वा म॒रुत॒स्त्वा ह्व॑यन्तु। अधा॒ मनो॑ वसु॒देया॑य कृणुष्व॒ ततो॑ न उ॒ग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : atharvaa | Devta : indraH | Metre : bhuriktriShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ashvinaa tvaagre mitraavaruNobhaa vishve devaa marutastvaa hvayantu. adhaa mano vasudeyaaya kRRiNuShva tato na ugro vi bhajaa vasuuni . 4.
Component Words : ashvinaa . tvaa . agre . mitraavaruNaa . ubhaa . vishve . devaaH . marutaH . tvaa . hvayantu . adha . manaH . vasu.adeyaaya . kRRiNuShva . tataH . naH . ugraH . vi . bhaja . vasuuni .4.4.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : राजतिलक का उत्सव।
पदपाठ : अ॒श्विना॑ । त्वा॒ । अग्रे॑ । मि॒त्रावरु॑णा । उ॒भा । विश्वे॑ । दे॒वा: । म॒रुत॑: । त्वा॒ । ह्व॒य॒न्तु॒ । अध॑ । मन॑: । व॒सु॒ऽदेया॑य । कृ॒णु॒ष्व॒ । तत॑: । न॒: । उ॒ग्र: । वि । भ॒ज॒ । वसू॑नि ॥४.४॥
पदार्थ : (अग्रे) अगले वा मुख्य पद पर [विराजमान] (त्वा) तुझको (अश्विना=०−नौ) सूर्य और चन्द्र और (उभा=उभौ) दोनों (मित्रावरुणा=०−णौ) प्राण और अपान वा दिन और रात और (विश्वे देवाः) सब व्यवहारकुशल (मरुतः) शूर पुरुष (त्वा) तुझको (ह्वयन्तु) पुकारें [मार्गदर्शक हों]। (अधा) और तू (मनः) अपने मन को (वसुदेयाय) धन का दान करने के लिये (कृणुष्व) स्थिर कर। (ततः) फिर (उग्रः) तेजस्वी तू (नः) हमारेलिये (वसूनि) धनों का (वि, भज) विभाग कर ॥४॥ "
भावार्थ : जैसे सूर्य और चन्द्र परस्पर आकर्षण से, दिन और रात, प्राण और अपान अपने-२ क्रम से और शूर विद्वान् पुरुष नियम पर चलने से संसार का उपकार करते हैं, इसी प्रकार ऐश्वर्यवान् राजा विचारपूर्वक सुपात्रों को दान देकर प्रजा की उन्नति करें ॥४॥ इस मन्त्र का अन्तिम पाद (ततो न उग्रो....) मन्त्र २ में आ चुका है। ऋ० म० ५ सू० १५ म० १५ का भी मिलान करें ॥ स्व॒स्ति पन्था॒मनु॑चरेम सूर्याचन्द्र॒मसा॑विव ॥ (सूर्याचन्द्रमसौ इव) सूर्य और चन्द्रमा के समान (स्वस्ति) कल्याणयुक्त (पन्थाम्) मार्ग पर (अनुचरेम) हम चलते रहें ॥
टिप्पणी :४−(अश्विना)। अ० २।२९।६। सूर्याचन्द्रमसावित्येके-निरु० १२।१। सूर्यचन्द्रौ। (अग्रे)। मुख्यपदे वर्त्तमानम्। (मित्रावरुणा)। अ० १।२०।२। प्राणापानौ। अहोरात्रौ। (उभा)। उभौ। (विश्वेदेवाः)। सर्वे व्यवहारिणः। (मरुतः)। अ० १।२०।१। शूराः पुरुषाः। (ह्वयन्तु)। आह्वयन्तु। (अधा)।=अथ। पुनः। (मनः)। चित्तम्। (वसुदेयाय)। अचो यत्। पा० ३।१।९७। इति वसु+दाञ् दाने-भावे यत्। ईद्यति। पा० ६।४।६५। ईकारादेशः। वसुनो धनस्य प्रदानाय। अन्यत् सुगमम्। (ततो न) इत्यादि व्याख्यातं म० २ ॥