Atharvaveda / 3 / 6 / 3
यथा॑श्वत्थ नि॒रभ॑नो॒ऽन्तर्म॑ह॒त्य॑र्ण॒वे। ए॒वा तान्त्सर्वा॒न्निर्भ॑ङ्ग्धि॒ यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम् ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 6 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : jagadbiija.m puruShaH | Devta : ashvatthaH (vanaspatiH) | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yathaashvattha nirabhano.antarmahatyarNave. evaa taantsarvaannirbha~Ngdhi yaanaha.m dveShmi ye cha maam . 3.
Component Words : yathaa . ashvattha . niH.aabhanaH . antaH . mahati . arNave . eva . taan . sarvaan . niH . bha~Ngdhi . yaan . aham . dveShmi . ye . cha . maam .6.3.
In Hindi:
ऋषि : जगद्बीजं पुरुषः | देवता : अश्वत्थः (वनस्पतिः) | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : उत्साह बढ़ाने के लिये उपदेश।
पदपाठ : यथा॑ । अ॒श्व॒त्थ॒ । नि॒:ऽअभ॑न: । अ॒न्त: । म॒ह॒ति । अ॒र्ण॒वे । ए॒व । तान् । सर्वा॑न् । नि: । भ॒ङ्ग्धि॒ । यान् । अ॒हम् । द्वेष्मि॑ । ये । च॒ । माम् ॥६.३॥
पदार्थ : (अश्वत्थ) हे वीरों में ठहरनेवाले राजन् ! [वा पीपलवृक्ष !] (यथा) जैसे (महति) बड़े (अर्णवे अन्तः) समुद्र के बीच में (निरभनः) निश्चय करके तू भद्र करनेवाला हुआ है। (एव) वैसे ही (तान् सर्वान्) उन सबको (निर्) निरन्तर (भङ्ग्धि) नष्ट कर दे, (यान्) जिन्हें (अहम्) मैं (द्वेष्मि) वैरी जानता हूँ, (च) और (ये) जो (माम्) मुझे [वैरी जानते हैं] ॥३॥ "
भावार्थ : मनुष्यों को शूरवीर और सद्वैद्य होकर दुःखसागर में डूबे हुए प्रजागणों के उभारने में प्रयत्न करना चाहिये ॥३॥
टिप्पणी :३−(यथा) येन प्रकारेण। (अश्वत्थ)। म० १। हे बलवत्सु स्थितिशील ! पिप्पलवृक्ष ! (निरभनः)। भदि कल्याणकरणे-लङि हल्ङ्यादिना सिपो लोपो दश्च। पा० ८।२।७५। इति धातुदकारस्य वैकल्पिकं रुत्वम्। निरन्तरं भद्रं कृतवानसि। (महति)। विशाले। (अर्णवे)। अ० १।१०।४। समुद्रे। (निर्)। निश्चयेन। निरन्तरम्। (भङ्ग्धि)। भञ्जो आमर्दने-लोट्। भञ्जय। विदारय। अन्यत् सुगमं व्याख्यातं च। म० १ ॥