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Atharvaveda / 3 / 10 / 3

सं॑वत्स॒रस्य॑ प्रति॒मां यां त्वा॑ रात्र्यु॒पास्म॑हे। सा न॒ आयु॑ष्मतीं प्र॒जां रा॒यस्पोषे॑ण॒ सं सृ॑ज ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : रात्रिः, धेनुः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : पुष्टि बढ़ाने के लिये प्रकृति का वर्णन।

पदपाठ : स॒म्ऽव॒त्स॒रस्य॑ । प्र॒तिऽमाम् । याम् । त्वा॒ । रा॒त्रि॒ । उ॒प॒ऽआस्म॑हे । सा । न॒: । आयु॑ष्मतीम् । प्र॒ऽजाम् । रा॒य: । पोषेण॑ । सम् । सृ॒ज॒ ॥१०.३॥

पदार्थ : (रात्रि) हे सुखदात्री वा दुःखहर्त्री वा रात्रिरूप [प्रकृति] (संवत्सरस्य) यथावत् निवास देनेवाले परमेश्वर की (प्रतिमाम्) प्रतिमा [प्रतिरूप वा प्रतिनिधि] (याम्) सर्वत्र व्यापिनी (त्वा) तुझको (उपास्महे) हम भजते हैं। (सा) वह लक्ष्मी तू (नः) हमारेलिये (आयुष्मतीम्) चिरंजीविनी (प्रजाम्) प्रजा को (रायः) धन की (पोषेण) बढ़ती के साथ (संसृज) संयुक्त कर ॥३॥ "

भावार्थ : अनन्त परमेश्वरी प्रकृति के सूक्ष्म और स्थूलरूप के ज्ञान से उपकार लेकर हम अपनी सन्तान के सहित धनी, स्वस्थ और चिरंजीवी बने रहें ॥३॥

टिप्पणी :३−(संवत्सरस्य)। म० २। सम्यक् निवासकस्य परमेश्वरस्य। (प्रतिमाम्)। आतश्चोपसर्गे। पा० ६।३।१०६। इति प्रति+माङ् माने-अङ् टाप्। प्रतिनिधित्वेन निर्मीयत इति प्रतिमा। प्रतिरूपाम्। प्रतिमूर्त्तिम्। (या)। या गतौ-ड। यातीति यः-वायुः। स्त्रियां टाप्। सर्वत्रगन्त्रीम्। सर्वव्यापिनीम् त्वा। त्वाम्। (रात्रि)। म० २। विकल्पकत्वात् ङीप्। हे सुखदायिनि। हे रात्रिरूपे। अन्वेषणीये। (उपास्महे)। उप+आस उपवेशने। वयं सेवामहे। (सा)। म० १। ईश्वरी त्वम्। (नः)। अस्मदर्थम्। (आयुष्मतीम्)। चिरकालजीवनवतीम्। (प्रजाम्)। पुत्रपौत्रादिरूपाम्। (रायः)। अ० १।९।४। धनस्य। (पोषेण)। पुष्ट्या। वृद्ध्या। (सं सृज)। संयोजय ॥