Atharvaveda / 3 / 14 / 3
सं॑जग्मा॒ना अबि॑भ्युषीर॒स्मिन्गो॒ष्ठे क॑री॒षिणीः॑।बिभ्र॑तीः सो॒म्यं मध्व॑नमी॒वा उ॒पेत॑न ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 14 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : brahmaa | Devta : gauH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : sa.mjagmaanaa abibhyuShiirasmingoShThe kariiShiNiiH.bibhratiiH somya.m madhvanamiivaa upetana . 3.
Component Words : sam.ajagmaanaaH . abibhyuShiiH . asmin . go.asthe . kariiShiNiiH . bibhratiiH . somyam . madhu . anamiivaaH . upa.aetana .14.3.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : गौः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : गोरक्षा का उपदेश।
पदपाठ : स॒म्ऽज॒ग्मा॒ना: । अबि॑भ्युषी: । अ॒स्मिन् । गो॒ऽस्थे । क॒री॒षिणी॑: । बिभ्र॑ती: । सो॒म्यम् । मधु॑ । अ॒न॒मी॒वा: । उ॒प॒ऽएत॑न ॥१४.३॥
पदार्थ : (अस्मिन् गोष्ठे) इस गोशाला में (संजग्मानाः) मिलकर चलती हुई, (अबिभ्युषीः=०−ष्यः) निर्भय रहती हुई, (करीषिणीः=०−ण्यः) गोबर करनेवाली, (सोम्यम्) अमृतमय (मधु) रस (बिभ्रतीः=०−त्यः) धारण करती हुई, (अनमीवाः) नीरोग तुम (उपेतन=उप, आ, इत) चली आओ ॥३॥ "
भावार्थ : मनुष्य गौओं को हिंसक जीवों से बचाकर नीरोग रक्खें जिससे वे रोगनाशक, अमृतमय दूध, घृत आदि पदार्थ देती रहें। गौ के मूत्र, गोबर, दूध आदि के गुण और प्रयोग बहुत हैं ॥३॥ शब्दकल्पद्रुम कोष में गौ के गुण वर्णन करते हुए कहा है−गोमूत्रं गोमयं क्षीरं सर्पिर्दधि च रोचना। षडङ्गमेतन्मङ्गल्यं पवित्रं सर्वदा गवाम् ॥ गोमूत्र, गोबर, दूध, घी, दही और गोरोचना, गौओं के यह छह प्रकार के सर्वदा मङ्गलकारी शुद्ध पदार्थ हैं ॥ मनु भगवान् का वचन है-गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्। एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥ मनु० ११।२१२ ॥ गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुशा का पानी, एक दिन [खावे] फिर एक दिन-रात उपवास करे। यह कृच्छ्र सान्तपन कहाता है ॥
टिप्पणी :३−(संजग्मानाः)। समो गम्यृच्छिभ्याम्। पा० १।३।२९। इति संपूर्वाद् गमेरात्मनेपदत्वात् लिटः कानच्। संगच्छमानाः। (अबिभ्युषीः)। ञिभी भये-लिटः क्वसुः, ङीप्। वसोः संप्रसारणम्। पा० ६।४।३१। इति संप्रसारणम्। जसः पूर्वसवर्णदीर्घः। अबिभ्यत्यः। (करीषिणीः)। कॄतॄभ्यामीषन्। उ० ४।२६। इति कॄ विक्षेपे, विज्ञाने-ईषन्। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति इनि। करीषिण्यः करीषेण गोमयेन युक्ताः। (बिभ्रतीः)। भृञ् भरणे-शतृ। बिभ्रत्यः। धारयन्त्यः। (सोम्यम्)। मये च पा० ४।४।१३८। इति सोम-य प्रत्ययः। अमृतमयम्। (मधु)। मधुरं दुग्धघृतादि। (अनमीवाः)। अ० २।३०।३। रोगरहिताः। (उपेतन)। इण् गतौ-लोट्। तस्य तनादेशः। उपागच्छत ॥