Atharvaveda / 3 / 17 / 6
शु॒नं वा॒हाः शु॒नं नरः॑ शु॒नं कृ॑षतु॒ लाङ्ग॑लम्। शु॒नं व॑र॒त्रा ब॑ध्यन्तां शु॒नमष्ट्रा॒मुदि॑ङ्गय ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 17 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : vishvaamitr | Devta : siitaa | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : shuna.m vaahaaH shuna.m naraH shuna.m kRRiShatu laa~Ngalam. shuna.m varatraa badhyantaa.m shunamaShTraamudi~Ngaya . 6.
Component Words : shunam . vaahaaH . shunam . naraH . shunam . kRRiShatu . laa~Ngalam . shunam . varatraaH . badhyantaam . shunam . aShTraam . ut . i~Ngaya .17.6.
In Hindi:
ऋषि : विश्वामित्र | देवता : सीता | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : खेती की विद्या का उपदेश।
पदपाठ : शु॒नम् । वा॒हा: । शु॒नम् । नर॑: । शु॒नम् । कृ॒ष॒तु॒ । लाङ्ग॑लम् । शु॒नम् । व॒र॒त्रा: । ब॒ध्य॒न्ता॒म् । शु॒नम् । अष्ट्रा॑म् । उत् । इ॒ङ्ग॒य॒ ॥१७.६॥
पदार्थ : (वाहाः) बैल आदि पशु (शुनम्) सुख से रहें। (नरः) हाँकनेवाले किसान (शुनम्) सुख से रहें। (लाङ्गलम्) हल (शुनम्) सुख से (कृषतु) जोते। (वरत्राः) हल की रस्सियाँ (शुनम्) सुख से (बध्यन्ताम्) बाँधी जावें। (अष्ट्राम्) पैना [आर वा काँटे] को (शुनम्) सुख से (उत् इङ्गय) ऊपर चला ॥६॥"
भावार्थ : किसान लोग सब सामग्री उत्तम रीति से बनाकर रखने से अपने सब काम सुख से चलावें ॥६॥ यह मन्त्र ६-८ कुछ भेद से ऋ० ४।५७।४-६ में है ॥
टिप्पणी :६−(शुनम्) सुखेन। (वाहाः) वृषभादयः। (नरः) अ० ३।१६।३। नयतीति ना। नेतारः कर्षकाः। (कृषतु) विलिखतु। (लाङ्गलम्) हलम्। (वरत्राः) वृञश्चित्। उ० ३।१०७। इति वृञ् संवरणे-अत्रन्। टाप्। बन्धन-रज्जवः। (बध्यन्ताम्) बद्धा भवन्तु। (अष्ट्राम्) अमिचिमिशसिभ्यः क्त्रः। उ० ४।१६४। इति अशूङ् व्याप्तौ-क्त, टाप्। प्रतोदम्। ताडनीम्। (उत् इङ्गय) उपरि गमय। प्रेरय ॥