Atharvaveda / 3 / 18 / 5
अ॒हम॑स्मि॒ सह॑मा॒नाथो॒ त्वम॑सि सास॒हिः। उ॒भे सह॑स्वती भू॒त्वा स॒पत्नीं॑ मे सहावहै ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 18 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : atharvaa | Devta : vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ahamasmi sahamaanaatho tvamasi saasahiH. ubhe sahasvatii bhuutvaa sapatnii.m me sahaavahai . 5.
Component Words : aham . asmi . sahamaanaa . atho iti . tvam . asi . sasahiH . ubhe iti . sahasvatii iti . bhuutvaa . sa.apatniim . me . sahaavahai .18.5.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्मविद्या की सपत्नी अविद्या के नाश का उपदेश।
पदपाठ : अ॒हम् । अ॒स्मि॒ । सह॑माना । अथो॒ इति॑ । त्वम् । अ॒सि॒ । स॒स॒हि: । उ॒भे इति॑ । सह॑स्वती॒ इति॑ । भू॒त्वा । स॒ऽपत्नी॑म् । मे॒ । स॒हा॒व॒है॒ ॥१८.५॥
पदार्थ : [हे विद्या] (अहम्) मैं (सहमाना) जयशील [प्रजा] (अस्मि) हूँ, (अथो) और (त्वम्) तू भी (सासहिः=ससहिः) जयशील (असि) है। (उभे) दोनों हम [तू और मैं] (सहस्वती=०-त्यौ) जयशील (भूत्वा) होकर (मे) मेरी (सपत्नीम्) विरोधिनी [अविद्या] को (सहावहै) जीत लें ॥५॥"
भावार्थ : योगी जन ब्रह्मविद्या में एकवृत्ति होकर अविद्या को जीतकर आनन्द भोगते हैं ॥५॥
टिप्पणी :५−(सहमाना) षह अभिभवे-शानच्। अभिभवित्री प्रजा। (अथो) अपि च। (सासहिः) किकिनावुत्सर्गश्छन्दसि सदादिभ्यो दर्शनात्। वा० पा० ३।२।१७१। इति षह अभिभवे-कि, लिड्वद्भावः। छान्दसो दीर्घः। अभिभवित्री। (उभे) त्वं च अहं च, आवाम्। (सहस्वती) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेः पूर्वसवर्णदीर्घः। अभिभवनवत्यौ। जयशीले। (सपत्नीम्) म० १। विरोधिनीम्, अविद्याम्। (सहावहै) षह अभिभवे-लोट्। आवाम् अभिभवाव ॥