Atharvaveda / 3 / 25 / 5
आजा॑मि॒ त्वाज॑न्या॒ परि॑ मा॒तुरथो॑ पि॒तुः। यथा॒ मम॒ क्रता॒वसो॒ मम॑ चि॒त्तमु॒पाय॑सि ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 25 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : bhRRigu | Devta : mitraavaruNau, kaamabaaNaH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aajaami tvaajanyaa pari maaturatho pituH. yathaa mama krataavaso mama chittamupaayasi . 5.
Component Words : aa . ajaami . tvaa . aa.aajanyaa . pari . maatuH . atho iti . pituH . yathaa . mama . kratau . asaH . mama . chittam . upa.aaayasi .25.5.
In Hindi:
ऋषि : भृगु | देवता : मित्रावरुणौ, कामबाणः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : अविद्या के नाश से विद्या की प्राप्ति का उपदेश।
पदपाठ : आ । अ॒जा॒मि॒ । त्वा॒ । आ॒ऽअज॑न्या । परि॑ । मा॒तु: । अथो॒ इति॑ । पि॒तु: । यथा॑ । मम॑ । क्रतौ॑ । अस॑: । मम॑ । चि॒त्तम् । उ॒प॒ऽआय॑सि ॥२५.५॥
पदार्थ : [हे विद्या !] (त्वा) तुझको (आजन्या) पूरे उपाय से [अपनी] (मातुः) माता से (अथो) और (पितुः) पिता से (परि) सब ओर (आ) यथानियम (अजामि) प्राप्त करता हूँ, (यथा) जिससे (मम) मेरे (क्रतौ) कर्म वा बुद्धि में (असः) तू रहे, (मम चित्तम्) मेरे चित्त में (उपायसि) तू पहुँचती है ॥५॥"
भावार्थ : सब स्त्री पुरुष माता-पिता आदि से विद्या पाकर परीक्षा द्वारा साक्षात् करके हृदय में दृढ़ करें ॥५॥ इस मन्त्र का उत्तरार्ध कुछ भेद से अथर्व० १।३४।२ में आया है ॥
टिप्पणी :५−(आ) समन्तात् (अजामि) अज गतिक्षेपणयोः। गच्छामि। प्राप्नोमि (आजन्या) आ+अज गतौ-ल्युट्, ङीप्। समन्ताद् गत्या। पूर्णोपायेन (परि) सर्वतः (मातुः) जनन्याः सकाशात् (अथो) अपि च (पितुः) पालकात्। जनकात् (यथा) येन प्रकारेण। अन्यद् व्याख्यातम्-अ० १।३४।२ ॥