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Atharvaveda / 3 / 29 / 8

भूमि॑ष्ट्वा॒ प्रति॑ गृह्णात्व॒न्तरि॑क्षमि॒दं म॒हत्। माहं प्रा॒णेन॒ मात्मना॒ मा प्र॒जया॑ प्रति॒गृह्य॒ वि रा॑धिषि ॥ 8॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 29 | Paryay : | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : उद्दालकः | देवता : भूमिः | छन्द : उपरिष्टाद्बृहती | स्वर :

विषय : मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से सुख पाता है।

पदपाठ : भूमि॑: । त्वा॒ । प्रति॑ । गृ॒ह्णा॒तु॒ । अ॒न्तरि॑क्षम् । इ॒दम् । म॒हत् । मा । अ॒हम् । प्रा॒णेन॑ । मा । आ॒त्मना॑ । मा । प्र॒ऽजया॑ । प्र॒ति॒ऽगृह्य॑ । वि । रा॒धि॒षि॒ ॥२९.८॥

पदार्थ : (हे) काम (भूमिः) भूमि और (इदम्) यह (महत्) बड़ा (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष भी (त्वा) तुझको (प्रति गृह्णातु) स्वीकार करे। (अहम्) मैं जीव, (प्रतिगृह्य) पाकर, (मा) न (प्राणेन) प्राण [शरीर बल] से, (मा) न (आत्मना) आत्मबल से, और (मा) न (प्रजया) प्रजा से, (वि राधिषि) अलग हो जाऊँ ॥८॥"

भावार्थ : पुरुषार्थी मनुष्य सत्य कामना से भूमि और आकाश का राज्य हस्तगत कर लेता है, और शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक बल दृढ़ करके संसार में सुखी रहता है ॥८॥

टिप्पणी :८−(भूमिः) भूमिस्थपदार्थाः, इत्यर्थं (त्वा) कामम् (प्रतिगृह्णातु) अङ्गीकरोतु (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्षस्थपदार्थाः। (मा) निषेधे (प्राणेन) मुखनासिकाभ्यां संचरता जीवस्थितिलिङ्गेन वायुना, शारीरिकबलेन। (आत्मना) आत्मिकबलेन। (प्रजया) सामाजिकबलेन। (मा+वि+राधिषि) अ० १।१।४। अहं विराद्धो वर्जितो वियुक्तो मा भूवम् ॥