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Atharvaveda / 4 / 2 / 2

यः प्रा॑ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैको॒ राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑। यस्य॑ छा॒यामृतं॒ यस्य॑ मृ॒त्युः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वेनः | देवता : आत्मा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्म विद्या का उपदेश।

पदपाठ : य: । प्रा॒ण॒त: । नि॒ऽमि॒ष॒त: । म॒हि॒ऽत्वा । एक॑: । राजा॑ । जग॑त: । ब॒भूव॑ । यस्य॑ । छा॒या । अ॒मृत॑म् । यस्य॑ । मृ॒त्यु: । कस्मै॑ । दे॒वाय॑ । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ ॥२.२॥

पदार्थ : (यः) जो (महित्वा=०-त्वेन) अपनी महिमा से (प्राणतः) श्वास लेते हुए, चेतन और (निमिषतः) आँख मूदे हुए, अचेतन (जगतः) जगत् का (एकः) एक (राजा) राजा (बभूव) हुआ है। (यस्य) जिसकी (छाया) छाया [छाया समान अनुगामी अथवा आश्रय वा कान्ति अर्थात् ज्ञान] (अमृतम्) अमरपन [जीवन वा पुरुषार्थ वा जीवन की सफलता, मोक्ष पद] है और (यस्य=यस्यच्छाया) जिसकी [छाया अर्थात् छाया समान अनुगामी अथवा अनाश्रय, वा प्रकाश का ढकना, अज्ञान] (मृत्युः) मरण [शरीर त्याग वा निरुत्साह, वा जीवन की विफलता, नरक] है, उस (कस्मै) प्रजापति सुखदाता परमेश्वर की (देवाय) श्रेष्ठ गुण के लिये (हविषा) भक्ति के साथ (विधेम) सेवा किया करें ॥२॥ "

भावार्थ : जो मनुष्य सब चेतन और अचेतन जगत् के एक स्वामी परमेश्वर की आज्ञा में चलता है, वह जीते जागते हृदयवाला पुरुष पुरुषार्थ करके अमर [यशस्वी वा मुक्त] हो जाता है और इसके विपरीत मरे मन-वाला निरुत्साही मृतक सा होकर नरक भोगता है ॥२॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० १०।१२१।३, २ और यजु० २५।११, १३ में है ॥

टिप्पणी :२−(यः) प्रजापतिः कः (प्राणतः) अन प्राणने-शतृ। प्रश्वसतः। चेतनस्य (निमिषतः) मिष स्पर्धायाम्-शतृ। तुदादित्वात् शः। निमेषणं निमीलनं चक्षुर्मुद्रणं कुर्वतः। अचेतनस्य (महित्वा) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति मह पूजायाम्-इन्। महेर्महतो भावो महित्वम्। यद्वा। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। उ० ४।१०५। इति मह-भावे इत्वन्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति तृतीयाया आकारः। महित्वेन। महत्त्वेन (एकः) अद्वितीयः (राजा) शासकः अधिपतिः (जगतः) संसारस्य (बभूव) (यस्य) कस्य। प्रजापतेः (छाया) माछाशसिभ्यो यः। उ० ४।१०९। इति छो छेदने-य, टाप्। गृहनाम-निघ० ३।४। आश्रयः, इत्यर्थः। कान्तिः प्रकाशः। प्रतिबिम्बम्। प्रकाशावरणम् अज्ञानमित्यर्थः। यद्वा। छायेव अनुगामी वशीभूतः (अमृतम्) भावे-क्त। अमरणम्। जीवनम्। जीवनसाफल्यम् (यस्य) यस्यच्छाया (मृत्युः) मरणम्। जीवनवैफल्यम्। अन्यद् गतम्। म० १ ॥