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Atharvaveda / 4 / 2 / 4

यस्य॒ द्यौरु॒र्वी पृ॑थि॒वी च॑ म॒ही यस्या॒द उ॒र्व॒न्तरि॑क्षम्। यस्या॒सौ सूरो॒ वित॑तो महि॒त्वा कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वेनः | देवता : आत्मा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्म विद्या का उपदेश।

पदपाठ : यस्य॑ । द्यौ: । उ॒र्वी । पृ॒थि॒वी । च॒ । म॒ही । यस्य॑ । अ॒द: । उ॒रु । अ॒न्तरि॑क्षम् । यस्य॑ । अ॒सौ । सूर॑: । विऽत॑त: । म॒हि॒ऽत्वा । कस्मै॑ । दे॒वाय॑ । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ ॥२.४॥

पदार्थ : (यस्य) जिसकी (महित्वा=०-त्वेन) महिमा से (उर्वी) विस्तीर्ण (द्यौः) सूर्य (च) और (मही) विशाल (पृथिवी) पृथिवी है, (यस्य) जिसकी [महिमा से] (अदः) यह (उरु) चौड़ा (अन्तरिक्षम्) मध्य लोक है। (यस्य) जिसकी [महिमा से] (असौ) यह (सूरः) धर्मप्रचारक विद्वान् मनुष्य (विततः) विस्तारवाला है, उस (कस्मै) प्रजापति सुखदाता परमेश्वर की (देवाय) दिव्य गुण के लिये (हविषा) भक्ति के साथ (विधेम) हम सेवा किया करें ॥४॥ "

भावार्थ : जिस परमात्मा ने सूर्य आदि अनेक लोकों को रचकर परस्पर आकर्षण द्वारा स्थिर किया है, और जिसने मनुष्य को अद्भुत शक्तियाँ देकर ऐश्वर्यवान् और प्रतापी बनाया है, उसकी भक्ति करके हम पुरुषार्थ के साथ अपनी उन्नति करें ॥४॥

टिप्पणी :४−(यस्य) कस्य। प्रजापतेः (द्यौः) अ० २।१२।६। द्योतमानः सूर्यः (उर्वी) अ० ३।२०।९। विस्तीर्णा (पृथवी) भूलोकः (मही) महती। विशाला (अदः) एतत्। दृश्यमानम् (उरु) अ० २।१२।१। विस्तीर्णम् (अन्तरिक्षम्) अ० १।३०।३। मध्यलोकः (असौ) प्रत्यक्षं दृश्यमानः (सूरः) सुसूधाञ्गृधिभ्यः क्रन्। उ० २।४। इति षू प्रेरणे वा षूङ् प्राणिगर्भविमोचने, क्रन्। सुवति प्रेरयति, यद्वा, सूते उत्पादयति लोकं घर्मं वा। सूर्यः। पण्डितः (महित्वा) म० २। महित्वेन। अन्यद् गतम्-म० १ ॥