Atharvaveda / 4 / 4 / 6
अ॒द्याग्ने॑ अ॒द्य स॑वितर॒द्य दे॑वि सरस्वति। अ॒द्यास्य ब्र॑ह्मणस्पते॒ धनु॑रि॒वा ता॑नया॒ पसः॑ ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : atharvaa | Devta : vanaspatiH | Metre : bhuriganuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : adyaagne adya savitaradya devi sarasvati. adyaasya brahmaNaspate dhanurivaa taanayaa pasaH . 6.
Component Words : adya . agne . adya . savitaH . adya . devi . sarasvati . adya . asya . brahmaNaH . pate . dhanuH.aiva . aa . taanaya . pasaH .4.6.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : वनस्पतिः | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर :
विषय : मनुष्य बल को बढ़ावे।
पदपाठ : अ॒द्य । अ॒ग्ने॒ । अ॒द्य । स॒वि॒त॒: । अ॒द्य । दे॒वि॒ । स॒र॒स्व॒ति॒ । अ॒द्य । अ॒स्य । ब्र॒ह्म॒ण॒: । प॒ते॒ । धनु॑:ऽइव । आ । ता॒न॒य॒ । पस॑: ॥४.६॥
पदार्थ : (अद्य) आज (अग्ने) हे भौतिक अग्नि ! (अद्य) आज (सवितः) हे लोकप्रेरक सूर्य ! (अद्य) आज (देवि) दिव्य गुणवाली (सरस्वति) विज्ञानवति विद्या ! (अद्य) आज (ब्रह्मणस्पते) हे अन्न, वा धन, वा वेद, वा ब्राह्मण के रक्षक परमेश्वर ! (अस्य) इसके (पसः) राज्य को (धनुः इव) धनुष के समान (आ) भले प्रकार (तानय) फैला ॥६॥ "
भावार्थ : मनुष्य यथावत् ओषधिसेवन से अपना शारीरिक और मानसिक बल बढ़ाकर अग्नि, सूर्य आदि पदार्थों और अनेक उत्तम विद्याओं से नित्य उपकार करता हुआ, ईश्वर के आश्रय से अन्न आदि प्राप्त करके अपना राज्य और सुख फैलावे, जैसे धनुष को लक्ष्य के लिये दृढ़ तानते हैं ॥६॥
टिप्पणी :६−(अद्य) वर्तमानदिने। (अग्ने) भौतिकाग्ने (सवितः) हे लोकप्रेरक सूर्य (देवि) हे दिव्यगुणे (सरस्वति) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति सृ गतौ-असुन्, मतुप्, मस्य वः, ङीप्। सरो नीरं विज्ञानं वा विद्यतेऽस्यां सा सरस्वती। वाक्-निघ० १।१।१। सरस्वतीत्येतस्य नदीवद्देवतावच्च निगमा भवन्ति-निरु० २।२३। हे विज्ञानवति विद्ये (अस्य) शूर पुरुषस्य (ब्रह्मणस्पते) अ० १।२९।२। ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मणः पाता वा पालयिता वा। ब्रह्म, अन्नम्-निघ० २।८। धनम्-निघ० २।११। हे ब्रह्मणोऽन्नस्य, धनस्य, वेदस्य विप्रस्य वा पालक परमेश्वर (धनुरिव) अर्त्तिपॄवपियजि०। उ० २।११७। इति धन धान्ये-उसि। चापं यथा (आ) समन्तात् (तानय) तनु विस्तारे-णिच्। विस्तारय (पसः) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति पस बन्धे, बाधे च-असुन्। राज्यप्रबन्धम्। राष्ट्रम्-इति दयानन्दभाष्ये, यजु० २३।२२ ॥