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Atharvaveda / 4 / 7 / 4

वि ते॒ मदं॑ मदावति श॒रमि॑व पातयामसि। प्र त्वा॑ च॒रुमि॑व॒ येष॑न्तं॒ वच॑सा स्थापयामसि ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 7 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गरुत्मान् | देवता : वनस्पतिः | छन्द : स्वराडनुष्टुप् | स्वर :

विषय : विष नाश करने का उपदेश।

पदपाठ : वि । ते॒ । मद॑म् । म॒द॒ऽव॒ति॒ । श॒रम्ऽइ॑व । पा॒त॒या॒म॒सि॒ । प्र । त्वा॒ । च॒रुम्ऽइ॑व । येष॑न्तम् । वच॑सा । स्था॒प॒या॒म॒सि॒ ॥७.४॥

पदार्थ : (मदावति) हे मूर्छा करनेवाली [विष पीड़ा] (ते) तेरे (मदम्) मद्यपन को (शरमिव) तीर के समान (वि) अलग (पातयामसि=०-मः) हम फेंक देते हैं। और (येषन्तम्) खदबदाते हुए (चरुमिव) चरुए [वासन] के समान (त्वा) तुझको (वचसा) वचन मात्र को [शीघ्र] (प्रस्थापयामसि=०-मः) हम हटाते हैं ॥४॥ "

भावार्थ : वैद्य लोग विषैली, मदकरी पीड़ाओंको बहुत शीघ्र प्रयत्न करके हटावें, जैसे धनुष से तीर को फेंकते अथवा अतितप्त बरतन को आग पर से हटाते हैं ॥४॥

टिप्पणी :४−(वि) वियोगे (ते) त्वदीयम् (मदम्) मदी स्वप्ने, जाड्ये, मदे-अच्। मद्यम्। मत्तताम्। विकलताम् (मदावति) शरादीनां च। पा० ६।३।१२०। इति मतौ दीर्घः। हे मूर्छाकरगुणयुक्ते विषपीडे (शरमिव) शॄ हिंसायाम्-अप्। चापाद् विमुक्तं तीरमिव (वि पातयामसि) शरीराद् विश्लेषयामः (त्वा) त्वाम् (चरुमिव) भृमृशीङ्तॄचरि० उ० १।७। इति चर गमने, अदने, आचारे-उ। चर्यते भक्ष्यते अग्निना, अन्नपाकभाण्डं यथा (येषन्तम्) जॄविशिभ्यां झच्। उ० ३।१२६। इति येषृ प्रयत्ने-झच्। येषमाणम्। प्रयतमानम् अङ्गप्रत्यङ्गानि व्याप्नुवन्तम् प्रतप्तं वा (वचसा) वचनमात्रेण (प्र स्थापयामसि) दूरी कुर्मः ॥