Atharvaveda / 4 / 14 / 6
अ॒जम॑नज्मि॒ पय॑सा घृ॒तेन॑ दि॒व्यं सु॑प॒र्णं प॑य॒सं बृ॒हन्त॑म्। तेन॑ गेष्म सुकृ॒तस्य॑ लो॒कं स्व॑रा॒रोह॑न्तो अ॒भि नाक॑मुत्त॒मम् ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 14 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : bhRRiguH | Devta : aajyam, agniH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ajamanajmi payasaa ghRRitena divya.m suparNa.m payasa.m bRRihantam. tena geShma sukRRitasya loka.m svaraarohanto abhi naakamuttamam . 6.
Component Words : ajam . anajmi . payasaa . ghRRitena . divyam . su.aparNam . payasam . bRRihantam . tena . geShma . su.akRRitasya . lokam . sva᳡H . aa.arohantaH . abhi . naakam . ut.atamam .14.6.
In Hindi:
ऋषि : भृगुः | देवता : आज्यम्, अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।
पदपाठ : अ॒जम् । अ॒न॒ज्मि॒ । पय॑सा । घृ॒तेन॑ । दि॒व्यम् । सु॒ऽप॒र्णम् । प॒य॒सम् । बृ॒हन्त॑म् । तेन॑ । गे॒ष्म॒ । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । लो॒कम् । स्व᳡: । आ॒ऽरोह॑न्त: । अ॒भि । नाक॑म् । उ॒त्ऽत॒मम् ॥१४.६॥
पदार्थ : (दिव्यम्) दिव्य गुणवाले, (सुपर्णम्) बड़े पूर्ण शुभ लक्षणवाले (पयसम्) गतिवान् वा उद्योगी (बृहन्तम्) बड़े बली (अजम्) जीवात्मा को (घृतेन) प्रकाशमान (पयसा) ज्ञान से (अनज्मि) मैं [मनुष्य] संयुक्त करता हूँ। (तेन) उस [ज्ञान] से (उत्तमम्) उत्तम (नाकम्) दुःखरहित (स्वः) सुखस्वरूप परब्रह्म को (अभि= अभिलक्ष्य) लख कर (आरोहन्तः) चढ़ते हुए हम (सुकृतस्य लोकम्) पुण्य लोक को (गेष्म) खोजें ॥६॥"
भावार्थ : मनुष्य परमात्मा की दी हुई अद्भुत शक्तियों से अपना ज्ञान बढ़ावे, और उस आनन्दस्वरूप जगत्पति की अनन्त महिमा को खोजता हुआ निरन्तर उन्नति करके मोक्ष पद प्राप्त करे ॥६॥
टिप्पणी :६−(अजम्) म० १। अजनशीलम् जीवात्मानम् (अनज्मि) अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु। म्रक्षयामि। मिश्रयामि (पयसा) पय गतौ-असुन्। ज्ञानेन (घृतेन) घृ भासे, सेके च-क्त। प्रकाशमानेन (दिव्यम्) प्रकाशार्हम्। मनोहरम् (सुपर्णम्) पॄ पूर्तिपालनयोः-न। शोभनानि पर्णानि पूर्णानि शुभलक्षणानि यस्य तम्-यथा दयानन्दभाष्ये य० १७।७२। (पयसम्) अत्यविचमि०। उ० ३।११७। इति पय गतौ-असच्। गतिशीलम्। उद्योगिनम् (बृहन्तम्) महान्तं बलिनम् (तेन) उक्तप्रकारेण (गेष्म) अ० ४।११।६। अन्विच्छाम (सुकृतस्य) शुभकर्मणः (लोकम्) स्थानम् अ० ४।११।६। (स्वः) सुखस्वरूपं परब्रह्म (आरोहन्तः) रुह-शतृ। अधिरोहन्तः (अभि) अभिलक्ष्य (नाकम्) दुःखशून्यम् (उत्तमम्) सर्वोत्कृष्टम् ॥