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Atharvaveda / 4 / 15 / 14

उ॑प॒प्रव॑द मण्डूकि व॒र्षमा आ व॑द तादुरि। मध्ये॑ ह्र॒दस्य॑ प्लवस्व वि॒गृह्य॑ च॒तुरः॑ प॒दः ॥ 14॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : मण्डूकसमूहः, पितरगणः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : वृष्टि की प्रार्थना और गुणों का उपदेश।

पदपाठ : उ॒प॒ऽप्रव॑द । म॒ण्डू॒कि॒ । व॒र्षम् । आ । व॒द॒ । ता॒दु॒रि॒ । मध्ये॑ । हृ॒दस्य॑ । प्ल॒व॒स्व॒ । वि॒ऽगृह्य॑ । च॒तुर॑: । प॒द: ॥१५.१४॥

पदार्थ : (मण्डूकि) हे शोभा बढ़ानेवाली वा डुबकी लगानेवाली मेंडुकी ! (उप प्रवद) पास आकर बोल, (तदुरि) हे तैरनेवाली वा उतने [शरीर जितना] उदरवाली (वर्षम्) वर्षा को (आवद) बुला (ह्रदस्य) पोखर के (मध्ये) बीच में (चतुरः) चारों (पदः) पदों को (विगृह्य) फैलाकर (प्लवस्व) तैर ॥१४॥"

भावार्थ : जैसे मेंडुकी वर्षा होने पर आनन्द से जल के भीतर तैरती फिरती है, ऐसे ही ब्रह्मज्ञानी लोग ब्रह्मविद्या में मग्न होकर विचरते हैं ॥१४॥ यह मन्त्र निरुक्त ९।७। में उदाहृत है ॥

टिप्पणी :१४−(उपप्रवद) उपेत्य प्रकृष्टं घोषं कुरु (मण्डूकि) मण्डूक, म० १२। स्त्रियां ङीप्। हे मण्डनशीले। निमज्जनस्वभावे। भेकि (वर्षम्) वृष्टिम् (आ वद) आभाषय (तदुरि) तरणशीले ! अथवा तावत् उदरि ! यावच्छरीरं तावदेवोदरं तस्याः-इति दुर्गाचार्यो निरुक्तटीकायाम्−९।७। दर्दुरि इत्यस्यैव छान्दसं रूपम्। मकुरदर्दुरौ। उ० १।४०। इति दॄ विदारणे-उरच्, निपातनात् साधुः। दृणाति भूमिं करणौ वा स दर्दुरः। ङीप्। हे दर्दुरि ! मण्डूकि ! (मध्ये) मध्यदेशे (ह्रदस्य) ह्राद अव्यक्तशब्दे-अच्। पृषोदरादि ह्रस्वत्वम्। जलाशयस्य (प्लवस्व) प्रतर (विगृह्य) प्रसार्य (चतुरः) (पद) पादान् ॥