Atharvaveda / 4 / 17 / 4
यां ते॑ च॒क्रुरा॒मे पात्रे॒ यां च॒क्रुर्नी॑ललोहि॒ते। आ॒मे मां॒से कृ॒त्यां यां च॒क्रुस्तया॑ कृत्या॒कृतो॑ जहि ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 17 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : shukraH | Devta : apaamaargo vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yaa.m te chakruraame paatre yaa.m chakrurniilalohite. aame maa.mse kRRityaa.m yaa.m chakrustayaa kRRityaakRRito jahi . 4.
Component Words : yaam . te . chakruH . aame . paatre . yaam . chakruH . niila.alohite . aame . maa.mse . kRRityaam . yaam . chakruH . tayaa . kRRityaa.akRRitaH . jahi .17.4.
In Hindi:
ऋषि : शुक्रः | देवता : अपामार्गो वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा के लक्षणों का उपदेश।
पदपाठ : याम् । ते॒ । च॒क्रु: । आ॒मे । पात्रे॑ । याम् । च॒क्रु: । नी॒ल॒ऽलो॒हि॒ते । आ॒मे । मां॒से । कृ॒त्याम् । याम् । च॒क्रु: । तया॑ । कृ॒त्या॒ऽकृत॑: । ज॒हि॒ ॥१७.४॥
पदार्थ : [हे राजन् !] (याम्) जिस [हिंसा] को (ते) तेरे (आमे) भोजन में, वा (पात्रे) पानी में (चक्रुः) उन्होंने [हंसाकारियों ने] किया है, (याम्) जिसको [तेरे] (नीललोहिते=नीलरोहिते) नीलों अर्थात् निधियों की उत्पत्ति में (चक्रुः) उन्होंने किया है। (याम्) जिस (कृत्याम्) हिंसा को [तेरे] (यामे) चलने में वा (मांसे) ज्ञान वा काल वा मांस में (चक्रुः) उन्होंने किया है, (तया) उस [हिंसा] के कारण (कृत्याकृतः) हिंसाकारियों को (जहि) नाश करदे ॥४॥"
भावार्थ : जो दुष्कर्मी राजा के खान, पान, धनसंचय, मार्ग, वा सत्य-सत्य जानने, वा काल के सुप्रयोग वा शरीर में विपत्ति डालें, राजा उनको यथावत् दण्ड देकर नाश कर दे ॥४॥
टिप्पणी :४−(याम्) कृत्याम् (ते) तव (चक्रुः) कृतवन्तः ते कृत्याकृतः (आमे) अम गतिभोजनादिषु-घञ्। भोजने (पात्रे) दादिभ्यश्छन्दसि। उ० ४।१७०। इति पा पाने−त्रन्। पाने जलभाजने वा (नीललोहिते) नि नितराम् इलन्ति प्राप्नुवन्ति यं स नीलो निधिः कोशः। नि+इल गतौ-क। रुहेश्च लो वा। उ० ३।९४। इति रुह बीजजन्मनि, प्रादुर्भावे च-इतन्, रस्य लः। निधीनां प्रादुर्भावे, उत्पत्तौ (आमे) अम गतौ-घञ्। गमने (मांसे) मनेर्दीघश्च। उ० ३।६४। इति मन ज्ञाने, अर्च्चे, गर्वे, धृतौ-स प्रत्ययः, दीर्घश्च। मन्यते ज्ञायते ध्रियते वानेन तन्मांसम्। ज्ञाने। मांसः कालः, कीटः-इति शब्दकल्पद्रुमः। काले। यद्वा रक्तजधातुविशेषः (कृत्याम्) अ० ४।९।४। हिंसाक्रियाम्। विपत्तिम् (तथा) कृत्यया (कृत्याकृतः) कृत्या+डुकृञ्, करणे-क्विप्, तुक्। हिंसाकारिणः पुरुषान् हन्-लोट्। नाशय ॥