Atharvaveda / 4 / 17 / 7
तृ॑ष्णामा॒रं क्षु॑धामा॒रं अथो॑ अक्षपराज॒यम्। अपा॑मार्ग॒ त्वया॑ व॒यं सर्वं॒ तदप॑ मृज्महे ॥ 7॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 17 | Paryay : | Mantra No : 7
In English:
Seer : shukraH | Devta : apaamaargo vanaspatiH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : tRRiShNaamaara.m kShudhaamaara.m atho akShaparaajayam. apaamaarga tvayaa vaya.m sarva.m tadapa mRRijmahe . 7.
Component Words : tRRiShNaa.amaaram . kShudhaa.amaaram . atho iti . akSha.aparaajayam . apaamaarga . tvayaa . vayam . sarvam . tat . apa . mRRijmahe .17.7.
In Hindi:
ऋषि : शुक्रः | देवता : अपामार्गो वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा के लक्षणों का उपदेश।
पदपाठ : तृ॒ष्णा॒ऽमा॒रम् । क्षु॒धा॒ऽमा॒रम् । अथो॒ इति॑ । अ॒क्ष॒ऽप॒रा॒ज॒यम् । अपा॑मार्ग । त्वया॑ । व॒यम् । सर्व॑म् । तत् । अप॑ । मृ॒ज्म॒हे॒ ॥१७.७॥
पदार्थ : (तृष्णामारम्) पियास से मरना, (क्षुधामारम्) भूख से मरना, (अथो) और भी (अक्षपराजयम्) व्यवहारों वा इन्द्रियों की हार, (तत् सर्वम्) इस सबको, (अपामार्ग) हे सर्वसंशोधक राजन् ! (त्वया) तेरे साथ (वयम् अपमृज्महे) हम शोधते हैं ॥७॥"
भावार्थ : राजा के उत्तम प्रबन्ध से न तो जल, अन्न और दैनिक काम काज की हानि, और न शरीर और आत्मा की दुर्बलता होती है ॥७॥
टिप्पणी :७−(अथो) अपि च (अक्षपराजयम्) अक्षू व्याप्तौ-पचाद्यच् घञ् वा। यद्वा। अशेर्देवने। उ० ३।६५। इति अशू व्याप्तौ स प्रत्ययः। अक्षाणां व्यवहाराणाम् इन्द्रियाणां वा पराजयं पराभवम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥