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Atharvaveda / 4 / 19 / 8

श॒तेन॑ मा॒ परि॑ पाहि स॒हस्रे॑णा॒भि र॑क्ष मा। इन्द्र॑स्ते वीरुधां पत उ॒ग्र ओ॒ज्मान॒मा द॑धत् ॥8॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 19 | Paryay : | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : शुक्रः | देवता : अपामार्गो वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : राजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : श॒तेन॑ । मा॒ । परि॑। पा॒हि॒ । स॒हस्रे॑ण । अ॒भि । र॒क्ष॒ । मा॒ । इन्द्र॑: । ते॒ । वी॒रु॒धा॒म् । प॒ते॒ । उ॒ग्र: । ओ॒ज्मान॑म् । आ । द॒ध॒त् ॥१९.८॥

पदार्थ : [हे राजन् !] (शतेन) सौ [उपाय] से (मा) मेरा (परि पाहि) सब प्रकार पालन कर, (सहस्रेण) सहस्र साधन से (मा) मेरी (अभि) सब ओर से (रक्ष) रक्षा कर। (वीरुधां पते) हे विविध प्रकार बढ़नेवाली प्रजाओं के पालक ! (उग्रः) महाबली (इन्द्रः) परमेश्वर (ते) तुझको (ओज्मानम्) पराक्रम (आ) यथावत् (दधत्) देता हुआ वर्तमान है ॥८॥"

भावार्थ : राजा अपनी प्रजा की सदा रक्षा करे। वह पुरुषार्थी पुरुष परमेश्वर की न्यायव्यवस्था से सब बल पाता रहता है ॥८॥

टिप्पणी :८−(शतेन) शतसंख्याकेन रक्षणोपायेन (मा) माम् (परि) परितः (पाहि) रक्ष (सहस्रेण) सहस्रसंख्याकेन, साधनेन (अभिरक्ष) सर्वतः पालय (इन्द्रः) परमेश्वरः (ते) तुभ्यम् (वीरुधाम्) विरोहणशीलानां लतारूपाणां वा प्रजानाम् (पते) अधिपते (उग्रः) उद्गूर्णबलः। महाबली (ओज्मानम्) सर्वधातुभ्यो मनिन् उ० ४।१४५। इति ओज बले-मनिन्। बलम्। पराक्रमम् (आ) समन्तात् (दधत्) डुधाञ् दाने-शतृ। ददत् प्रयच्छन् वर्तते ॥