Atharvaveda / 4 / 20 / 9
यो अ॒न्तरि॑क्षेण॒ पत॑ति॒ दिवं॒ यश्चा॑ति॒सर्प॑ति। भूमिं॒ यो मन्य॑ते ना॒थं तं पि॑शा॒चं प्र द॑र्शय ॥9॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 20 | Paryay : | Mantra No : 9
In English:
Seer : maatRRinaamaa | Devta : maatRRinaamauShadhiH | Metre : bhuriganuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yo antarikSheNa patati diva.m yashchaatisarpati. bhuumi.m yo manyate naatha.m ta.m pishaacha.m pra darshaya .9.
Component Words : yaH . antarikSheNa . patati . divam . yaH . cha . ati.asarpati . bhuumim . yaH . manyate . naatham . tam . pishaacham . pra . darshaya .20.9.
In Hindi:
ऋषि : मातृनामा | देवता : मातृनामौषधिः | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पदपाठ : य: । अ॒न्तरि॑क्षेण । पत॑ति । दिव॑म् । य: । च॒ । अ॒ति॒ऽसर्प॑ति । भूमि॑म् । य: । मन्य॑ते । ना॒थम् । तम् । पि॒शा॒चम् । प्र । द॒र्श॒य॒ ॥२०.९॥
पदार्थ : (यः) जो [उपद्रवी] (अन्तरिक्षेण) मध्यवर्ती हृदय अवकाश द्वारा (पतति) नीचे गिरता है, (च) और (यः) जो (दिवम्) व्यवहार वा प्रकाश को (अतिसर्पति) लाँघकर रेंगता है, और (यः) जो (भूमिम्) अपनी सत्ता को [अहंकार से] (नाथम्) ईश्वर (मन्यते) मानता है, (तम्) उस (पिशाचम्) मांसभक्षक, दुःखदायक, आत्मा को (प्रदर्शय) तू दिखा दे ॥९॥"
भावार्थ : जो मनुष्य मनोविकार से वेद मर्यादा छोड़ कुकर्मी बन जाता है, वह मनुष्य ईश्वरभक्ति से अपने अविद्यादि दोषों को छोड़कर सुखी होवे ॥९॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥ इति सप्तमः प्रपाठकः ॥
टिप्पणी :९−(यः) आत्मदोषः। उपद्रवी जनो वा (अन्तरिक्षेण) मध्यवर्त्तिना हृदयावकाशेन, तत्सहायेन (पतति) अधोगच्छति (दिवम्) इगुपधज्ञा०। पा० ३।१।१३५। इति दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारादिषु-क प्रत्ययः। व्यवहारम्। प्रकाशम् (यः) (च) (अतिसर्पति) (अतीत्य, उल्लङ्ध्य गच्छति (भूमिम्) अ० १।११।२। भू सत्तायाम्-मि। सत्ताम् (यः) (मन्यते) अहंकारेण जानाति (नाथम्) नाथ याच्ञोपतापैश्वर्याशीःषु-अच्। प्रभुम्। ईश्वरम् (तम्) (पिशाचम्) पिशिताशिनम्। दुःखदायकमात्मानम् (प्रदर्शय) अवगमय ॥