Atharvaveda / 4 / 26 / 5
ये उ॒स्रिया॑ बिभृ॒थो ये वन॒स्पती॒न्ययो॑र्वां॒ विश्वा॒ भुव॑नान्य॒न्तः। द्यावा॑पृथिवी॒ भव॑तं मे स्यो॒ने ते नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : mRRigaaraH | Devta : dyaavaapRRithivii | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ye usriyaa bibhRRitho ye vanaspatiinyayorvaa.m vishvaa bhuvanaanyantaH. dyaavaapRRithivii bhavata.m me syone te no mu~nchatama.mhasaH . 5.
Component Words : ye iti . usriyaaH . bibhRRithaH . ye iti . vanaspatiin . yayoH . vaam . vishvaa . bhuvanaani . antaH . dyaavaapRRithivii iti . bhavatam . me . syone iti . te iti . naH . mu~nchatam . a.mhasaH .26.5.
In Hindi:
ऋषि : मृगारः | देवता : द्यावापृथिवी | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : सूर्य और पृथिवी के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : ये इति॑ । उ॒स्रिया॑: । बि॒भृ॒थ: । ये इति॑ । वन॒स्पती॑न् । ययो॑: । वा॒म् । विश्वा॑ । भुव॑नानि । अ॒न्त: । द्यावा॑पृथिवी॒ इति॑ । भव॑तम् । मे॒ । स्यो॒ने इति॑ । ते इति॑ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२६.५॥
पदार्थ : (ये) जो तुम दोनों (उस्रियाः) गौओं को और (ये) जो तुम दोनों (वनस्पतीन्) वनस्पतियों को (बिभृथः) धारण करती हो, (ययोः वाम्) जिन तुम दोनों के (अन्तः) भीतर (विश्वा) सब (भुवनानि) लोक हैं। (द्यावापृथिवी) हे सूर्य और पृथिवी ! तुम दोनों (मे) मेरे लिये (स्योने) सुखवती (भवतम्) होओ। (ते) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥५॥"
भावार्थ : सूर्य के ताप और पृथिवी के संयोग से किरण द्वारा वृष्टि होकर गौ आदि सब पशु और सब वृक्ष पुष्ट होते हैं और सब लोक उनके ही प्रभाव में ठहरे हैं ॥५॥
टिप्पणी :५−(ये) युवाम् (उस्रियाः) स्फायितञ्चिवञ्चि०। उ० २।१३। इति वस निवासे-रक्, सम्प्रसारणं च। वसति क्षीरादिहविरस्याम्-इति उस्रा। ततः पृषोदरादित्वात्स्वार्थे घ। उस्रियेति गोनामोत्स्राविणोऽस्यां भोगाः। उस्रेति च, निरु० ४।१९। गाः (बिभृथः) धारयथः (वनस्पतीन्) अ० १।१२।३। वनानां सेवकानां पालकान्। वृक्षान् (ययोः) (वाम्) युवयोः (विश्वा) विश्वानि सर्वाणि (भुवनानि) अ० २।१।३। लोकान्। (अन्तः) मध्ये। अन्यत् पूर्ववत्-म० २ ॥