Atharvaveda / 4 / 27 / 4
अ॒पः स॑मु॒द्राद्दिव॒मुद्व॑हन्ति दि॒वस्पृ॑थि॒वीम॒भि ये सृ॒जन्ति॑। ये अ॒द्भिरीशा॑ना म॒रुत॑श्चरन्ति॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 27 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : mRRigaaraH | Devta : marudgaNaH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : apaH samudraaddivamudvahanti divaspRRithiviimabhi ye sRRijanti. ye adbhiriishaanaa marutashcharanti te no mu~nchantva.mhasaH . 4.
Component Words : apaH . samudraat . divam . ut . vahanti . divaH . pRRithiviim . abhi . ye . sRRijanti . ye . at.abhiH . iishaanaaH . marutaH . charanti . te . naH . mu~nchantu . a.mhasaH .27.4.
In Hindi:
ऋषि : मृगारः | देवता : मरुद्गणः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : पवन के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : अ॒प: । स॒मु॒द्रात् । दिव॑म् । उत् । व॒ह॒न्ति॒ । दि॒व: । पृ॒थि॒वीम् । अ॒भि । ये । सृ॒जन्ति॑ । ये । अ॒त्ऽभि: । ईशा॑ना: । म॒रुत॑: । चर॑न्ति । ते । न॒: । मु॒ञ्च॒न्तु॒ । अंह॑स: ॥२७.४॥
पदार्थ : (ये) जो [वायुगण] (अपः) जलको (समुद्रात्) पार्थिव समुद्र से (दिवम्) आकाश में (उद्वहन्ति) उठाकर पहुँचाते हैं और (दिवः) आकाश से (पृथिवीम् अभि) पृथिवी पर (सृजन्ति) छोड़ देते हैं। और (ये) जो (ईशानाः) समर्थ (मरुतः) वायुगण (अद्भिः) जल के साथ (चरन्ति) चलते रहते हैं। (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥४॥"
भावार्थ : सूर्य की किरणों से मिलकर वायुगण जल आकाश में ले जाते और पृथिवी पर बरसाते हैं। उनके उपकारों को समझ कर मनुष्य आनन्द प्राप्त करें ॥४॥
टिप्पणी :४−(अपः) जलानि (समुद्रात्) पार्थिवसागरात् (दिवम्) अन्तरिक्षम् (उत्) ऊर्ध्वम् (वहन्ति) प्रापयन्ति (दिवः) अन्तरिक्षात् (पृथिवीम्) भूमिम् (अभि) अभिलक्ष्य (ये) मरुतः (सृजन्ति) त्यजन्ति (अद्भिः) जलैः (ईशानाः) ईश्वराः समर्थाः (मरुतः) दोषनाशका वायवः (चरन्ति) गच्छन्ति। अन्यद् गतम् ॥