Atharvaveda / 4 / 27 / 7
ति॒ग्ममनी॑कं विदि॒तं सह॑स्व॒न्मारु॑तं॒ शर्धः॒ पृत॑नासू॒ग्रम्। स्तौमि॑ म॒रुतो॑ नाथि॒तो जो॑हवीमि॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ 7॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 27 | Paryay : | Mantra No : 7
In English:
Seer : mRRigaaraH | Devta : marudgaNaH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : tigmamaniika.m vidita.m sahasvanmaaruta.m shardhaH pRRitanaasuugram. staumi maruto naathito johaviimi te no mu~nchantva.mhasaH . 7.
Component Words : tigmam . aniikam . viditam . sahasvat . maarutam . shardhaH . pRRitanaasu . ugram . staumi . marutaH . naathitaH . johaviimi . te . naH . mu~nchantu . a.mhasaH .27.7.
In Hindi:
ऋषि : मृगारः | देवता : मरुद्गणः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : पवन के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : ति॒ग्मम् । अनी॑कम् । वि॒दि॒तम् । सह॑स्वत् । मारु॑तम् । शर्ध॑: । पृत॑नासु । उ॒ग्रम् । स्तौमि॑ । म॒रुत॑: । ना॒थि॒त: । जो॒ह॒वी॒मि॒ । ते । न॒: । मु॒ञ्च॒न्तु॒ । अंह॑स: ॥२७.७॥
पदार्थ : (मारुतम्) दोषनाशक वायुगणों का (अनीकम्) सेनादल और (शर्धः) बल (पृतनासु) संग्रामों में (तिग्मम्) तीक्ष्ण, (सहस्वत्) बड़ा साहसी और (उग्रम्) बड़ा प्रचण्ड (विदितम्) विदित है (नाथितः) अधीन मैं (मरुतः) वायुगणों को (स्तौमि) सराहता हूँ और (जोहवीमि) बारंबार पुकारता हूँ। (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥७॥"
भावार्थ : जो साहसी शूरवीर संग्रामों में अपने श्वास-प्रश्वास को सावधान रखके वायु का यथावत् प्रयोग करते हैं, वे विजयी होकर आनन्द भोगते हैं ॥७॥
टिप्पणी :७−(तिग्मम्) युजिरुजितिजां कुश्च। उ० १।१४६। इति तिज निशाने-मक्, कुत्वं च। तीक्ष्णम् (अनीकम्) अनिहृषिभ्यां किच्च। उ० ४।१७। इति अन प्राणने-ईकन्। सैन्यम् (विदितम्) प्रख्यातम् (सहस्वत्) बलवत् (मारुतम्) मरुतां सम्बन्धि (शर्धः) शर्द्धतिरुत्साहार्थः-असुन्। इति देवराजयज्वा निघण्टुटीकायाम्। बलम् निघ० २।९। (पृतनासु) अ० ३।२१।३। संग्रामेषु (उग्रम्) प्रचण्डम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥