Atharvaveda / 4 / 35 / 3
यो दा॒धार॑ पृथि॒वीं वि॒श्वभो॑जसं॒ यो अ॒न्तरि॑क्ष॒मापृ॑णा॒द्रसे॑न। यो अस्त॑भ्ना॒द्दिव॑मू॒र्ध्वो म॑हि॒म्ना ते॑नौद॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 35 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : prajaapatiH | Devta : atimRRityuH | Metre : bhuriktriShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yo daadhaara pRRithivii.m vishvabhojasa.m yo antarikShamaapRRiNaadrasena. yo astabhnaaddivamuurdhvo mahimnaa tenaudanenaati taraaNi mRRityum . 3.
Component Words : yaH . daadhaara . pRRithiviim . vishva.abhojasam . yaH . antarikSham . aa.aapRRiNaat . rasena . yaH . astabhnaat . divam . uurdhvaH . mahimnaa . tena . odanena . ati . taraaNi . mRRityum .35.3.
In Hindi:
ऋषि : प्रजापतिः | देवता : अतिमृत्युः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदपाठ : य: । दा॒धार॑ । पृ॒थि॒वीम् । वि॒श्वऽभो॑जसम् । य: । अ॒न्तरि॑क्षम् । आ॒ऽअपृ॑णात् । रसे॑न । य: । अस्त॑भ्नात् । दिव॑म् । ऊ॒र्ध्व: । म॒हि॒म्ना । तेन॑ । ओ॒द॒नेन॑ । अति॑ । त॒रा॒णि॒ । मृ॒त्युम् ॥३५.३॥
पदार्थ : (यः) जिस परमेश्वर ने (विश्वभोजसम्) सबका पालन करनेवाली (पृथिवीम्) पृथिवी को (दाधार) धारण किया था, (यः) जिसने (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को (रसेन) रस अर्थात् अन्न वा जल से (आ अपृणात्) भर दिया है। (यः) जिसने (महिम्ना) अपनी महिमा से (ऊर्ध्वः) ऊँचा होकर (दिवम्) प्रकाशमान सूर्य को (अस्तभ्नात्) ठहराया है। (तेन) उस (ओदनेन) बढ़ानेवाले वा अन्नरूप परमात्मा के साथ (मृत्युम्) मृत्यु के कारण [निरुत्साह आदि दोष] को (अति=अतीत्य) लाँघकर (तराणि) मैं तर जाऊँ ॥३॥"
भावार्थ : परमात्मा ने पृथिवी आदि लोकों और सब चराचर जगत् को रचकर धारण किया है और जो सबसे ऊपर विराजमान है, उसकी महिमा को विचार कर हम अपनी उन्नति करें ॥३॥
टिप्पणी :३−(यः) ओदनः (दाधार) धृतवान् (पृथिवीम्) भूमिम् (विश्वभोजसम्) भुज पालनाभ्यवहारयोः-असुन्। सर्वस्य पालयित्रीम् (अन्तरिक्षम्) मध्यलोकम् (आ-अपृणात्) पॄ पालनपूरणयोः-लङ्। सम्यक् पूरितवान् (रसेन) अन्नेन-निघ० २।७। उदकेन-निघ० १।१२। (अस्तभ्नात्) स्तन्भु रोधने-लङ्। अवरुद्धवान्। दृढीकृतवान् (दिवम्) प्रकाशमानं सूर्यम् (ऊर्ध्वः) उपरि वर्तमानः सन् (महिम्ना) महत्त्वेन। प्रभावेण। अन्यत् पूर्ववत् म० १ ॥