Atharvaveda / 4 / 36 / 4
सहे॑ पिशा॒चान्त्सह॒सैषां॒ द्रवि॑णं ददे। सर्वा॑न्दुरस्य॒तो ह॑न्मि॒ सं म॒ आकू॑तिरृध्यताम् ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 36 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : chaatanaH | Devta : satyaujaa agniH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : sahe pishaachaantsahasaiShaa.m draviNa.m dade. sarvaandurasyato hanmi sa.m ma aakuutirRRidhyataam . 4.
Component Words : sahe . pishaachaan . sahasaa . aa . eShaam . draviNam . dade . sarvaan . durasyataH . hanmi . sam . me . aa.akuutiH . RRidhyataam .36.4.
In Hindi:
ऋषि : चातनः | देवता : सत्यौजा अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा के धर्म का उपदेश।
पदपाठ : सहे॑ । पि॒शा॒चान् । सह॑सा । आ । ए॒षा॒म् । द्रवि॑णम् । द॒दे॒ । सर्वा॑न् । दु॒र॒स्य॒त: । ह॒न्मि॒ । सम् । मे॒ । आऽकू॑ति: । ऋ॒ध्य॒ता॒म् ॥३६.४॥
पदार्थ : (पिशाचान्) मांसभक्षकों को (सहसा) बल से (सहे) मैं जीतता हूँ, और (एषाम्) इनका (द्रविणम्) धन [सुपात्रों को] (ददे) मैं देता हूँ। (दुरस्यतः) सतानेवाले (सर्वान्) सबों को (हन्मि) मैं मारता हूँ। (मे) मेरा (आकूतिः) शुभ संकल्प (सम् ऋध्यताम्) यथावत् सिद्ध होवे ॥४॥"
भावार्थ : राजा दुष्टों का हनन करके उनका धन सेनापति आदि योग्य पुरुषों को पारितोषिक देवे और प्रयत्नपूर्वक अपना शुभ संकल्प सिद्ध करे ॥४॥
टिप्पणी :४−(सहे) अभिभवामि (पिशाचान्) अ० १।१६।३। पिशिताशिनो राक्षसान् (सहसा) बलेन (एषाम्) (द्रविणम्) अ० २।२९।३। धनम् (ददे) ददामि पात्रेभ्यः (सर्वान्) (दुरस्यतः) हन्तुमिच्छून् (हन्मि) नाशयामि (मे) मम (आकूतिः) अ० ३।२।३। शुभसंकल्पः (सम् ऋध्यताम्) सम्यक् सिध्यतु ॥