Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 4 / 37 / 9

भी॒मा इन्द्र॑स्य हे॒तयः॑ श॒तं ऋ॒ष्टीर्हि॑र॒ण्ययीः॑। ताभि॑र्हविर॒दान्ग॑न्ध॒र्वान॑वका॒दान्व्यृ॑षतु ॥ 9॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 37 | Paryay : | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : बादरायणिः | देवता : अजशृङ्ग्योषधिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : गन्धर्व और अप्सराओं के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : भी॒मा: । इन्द्र॑स्य । हे॒तय॑: । श॒तम् । ऋ॒ष्टी: । हि॒र॒ण्ययी॑: ।ताभि॑: । ह॒वि॒:ऽअ॒दान् । ग॒न्ध॒र्वान् । अ॒व॒का॒ऽअ॒दान् । वि । ऋ॒ष॒तु॒ ॥३७.९॥

पदार्थ : (इन्द्रस्य) परमेश्वर की (शतम्) सौ (हेतयः) हनन शक्तियाँ (हिरण्ययीः) तेजोमयी (ऋष्टीः) तरवारों के समान (भीमाः) भयानक हैं। (ताभिः) उनके साथ [दुष्ट दमन के लिये] (हविरदान्) ग्राह्य अन्न के भोजन करनेवाले (अवकादान्) हिंसाओं के नाश करनेवाले (गन्धर्वान्) वेदवाणी और पृथिवी के धारण करनेवाले पुरुषों को [वह परमेश्वर] (वि ऋषतु) व्याप्त होवे ॥९॥"

भावार्थ : परमेश्वर दुराचारियों को अनेक प्रकार से दण्ड देकर सत्पुरुषों की रक्षा करता है ॥९॥

टिप्पणी :९−(हिरण्ययीः) हिरण्यः=हिरण्यमयः=निरु० १०।२३। हिरण्यमय्यः। तेजोमय्यः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ८ ॥