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Atharvaveda / 4 / 38 / 4

या अ॒क्षेषु॑ प्र॒मोद॑न्ते॒ शुचं॒ क्रोधं॑ च॒ बिभ्र॑ती। आ॑न॒न्दिनीं॑ प्रमो॒दिनी॑मप्स॒रां तामि॒ह हु॑वे ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 38 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : बादरायणिः | देवता : अप्सराः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : या: । अ॒क्षेषु॑ । प्र॒ऽमोद॑न्ते । शुच॑म् । क्रोध॑म् । च॒ । बिभ्र॑ती । आ॒ऽन॒न्दिनी॑म् । प्र॒ऽमो॒दिनी॑म् । अ॒प्स॒राम् । ताम् । इ॒ह । हु॒वे॒ ॥३८.४॥

पदार्थ : (याः=या) जो शक्ति (शुचम्) शुद्धि (च) और (क्रोधम्) क्रोध (बिभ्रती) धारण करती हुई (अक्षेषु) सब व्यवहारों में (प्रमोदन्ते=०-दते) हर्ष पाती है। (आनन्दिनीम्) आनन्ददायिनी, (प्रमोदिनीम्) हर्षकारिणी (ताम्) उस (अप्सराम्) आकाश आदि में व्यापक शक्ति को (इह) यहाँ पर (हुवे) मैं बुलाता हूँ ॥४॥"

भावार्थ : न्यायस्वरूप परमात्मा की महिमा जानकर मनुष्य सब व्यवहारों में आनन्द प्राप्त करें ॥४॥ पण्डित सेवकलाल कृष्णदास की संहिता में (बिभ्रती) के स्थान पर (बिभ्रति) पद है ॥

टिप्पणी :४−(याः) एकवचने बहुवचनम्। या। अप्सरा (अक्षेषु) अक्षू व्याप्तौ संघाते च-अच्, घञ् वा। यद्वा। अशेर्देवने। उ० ३।६५। इति अशू व्याप्तौ-स। व्यवहारेषु (प्रमोदन्ते) प्रमोदते। प्रहृष्यति (शुचम्) शुचिर् शौचे-क्विप्। शुद्धिम् (क्रोधम्) कोपम् (च) (बिभ्रती) धारयन्ती (आनन्दिनीम्) सुखवतीम् (प्रमोदिनीम्) प्रहर्षयित्रीम्। अन्यद् यथा म० १ ॥